RK TV News
खबरें
Breaking Newsआलेख

जलते पुतले, बढ़ते रावण: दशहरे का बदलता अर्थ।

पुतलों का दहन नहीं, मन और समाज के भीतर छिपी बुराइयों का संहार ही दशहरे का असली संदेश है।
डॉ सत्यवान सौरभ

RKTV NEWS/डॉ सत्यवान सौरभ,01 अक्टूबर।दशहरे पर रावण के पुतले जलाना केवल परंपरा नहीं, बल्कि बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। लेकिन आज पुतले केवल मनोरंजन बनकर रह गए हैं, जबकि समाज में अहंकार, हिंसा, वासना और अन्य बुराइयाँ लगातार बढ़ रही हैं। असली रावण हमारे भीतर और समाज में मौजूद हैं। यही समय है कि हम अपने मन के रावणों की पहचान करें, उन्हें त्यागें और समाज से अपराध, छल-कपट और अन्य अधर्म को मिटाने का संकल्प लें। तभी दशहरा वास्तव में विजयादशमी बन सकता है।
हर साल जब दशहरे की शाम को रावण के विशाल पुतले धू-धू कर जलते हैं, तो दर्शकों की आँखों में उत्सव का रोमांच दिखाई देता है। पटाखों की गड़गड़ाहट, आतिशबाज़ी की चमक और भीड़ का शोर इस पर्व को एक रंगीन उत्सव में बदल देता है। लेकिन सवाल यह है कि क्या इस पूरे आयोजन का संदेश—बुराई पर अच्छाई की जीत—हमारे जीवन और समाज में कहीं उतर पाता है?
आज दशहरा एक मनोरंजन का ट्रेंड बनकर रह गया है। लोग पुतले जलाते हैं, फोटो और वीडियो बनाते हैं, सोशल मीडिया पर साझा करते हैं। लेकिन यह सोचने का समय शायद ही निकालते हैं कि यह रावण दहन केवल परंपरा निभाने के लिए नहीं, बल्कि हमें आत्ममंथन और सामाजिक सुधार का अवसर देने के लिए शुरू हुआ था।
रामायण की कथा में रावण केवल एक पात्र नहीं था, बल्कि वह उन बुराइयों का प्रतीक था जो इंसान को पतन की ओर ले जाती हैं—अहंकार, वासना, छल, क्रोध और अधर्म। रावण जैसा महाज्ञानी, शिवभक्त और शूरवीर भी अपनी एक गलती—वासना और अहंकार—के कारण विनाश को प्राप्त हुआ। दशहरा हमें यही याद दिलाने आता है कि यदि बुराई चाहे कितनी ही शक्तिशाली क्यों न हो, अंततः उसका नाश निश्चित है।
लेकिन आज दशहरे का स्वरूप बदल चुका है। अब रावण दहन व्यावसायिक और दिखावटी उत्सव में बदल गया है। हर साल पुतले और बड़े बनाए जाते हैं, पटाखों पर लाखों रुपये खर्च किए जाते हैं। रिपोर्टें बताती हैं कि पिछले कुछ वर्षों में रावण पुतलों की संख्या कई गुना बढ़ी है, पर समाज में अपराध और बुराइयों का ग्राफ घटने की बजाय बढ़ा ही है।
आज के दौर में रावण केवल पुतलों तक सीमित नहीं है। वह हमारे बीच, हमारे आस-पास, हमारे भीतर मौजूद है। समाज में अपराध, बलात्कार, हत्या, दहेज हिंसा, रिश्वतखोरी, भ्रष्टाचार और नशे की लत जैसी घटनाएँ लगातार बढ़ रही हैं। रिश्तों का पतन भी चिंता का विषय है—मां-बाप, भाई-बहन, यहाँ तक कि बच्चों तक की हत्या की खबरें आए दिन सामने आती हैं। आज का इंसान ज्यादा पढ़ा-लिखा और आधुनिक है, लेकिन बुराइयाँ भी उतनी ही तेज़ी से पनप रही हैं।
विडंबना यह है कि जिस रावण को हम हर साल जलाते हैं, वह अकेला था। विद्वान था, नीतिज्ञ था, अपने परिवार और राज्य के प्रति कर्तव्यनिष्ठ था। उसकी एक गलती उसे विनाश की ओर ले गई। लेकिन आज का रावण—यानी आज का अपराधी और बुराई का प्रतीक—उससे कहीं अधिक क्रूर, धूर्त और निर्लज्ज है।
दशहरे का पर्व हमें यह याद दिलाने के लिए है कि बुराइयाँ कितनी भी ताकतवर क्यों न हों, उन्हें मिटाना ही होगा। लेकिन केवल पुतले जलाने से बुराइयाँ खत्म नहीं होंगी। हमें यह समझना होगा कि आज का रावण बाहर ही नहीं, भीतर भी है। हर इंसान के भीतर अहंकार, क्रोध, वासना, ईर्ष्या और लालच जैसे रावण मौजूद हैं। जब तक इनका दहन नहीं होगा, तब तक समाज में शांति और न्याय संभव नहीं।
पुतला जलाने के साथ हमें यह संकल्प लेना चाहिए कि हम अपने जीवन से कम-से-कम एक बुराई को अवश्य दूर करेंगे। दशहरे का संदेश तभी सार्थक होगा जब समाज सामूहिक रूप से भ्रष्टाचार, हिंसा, नशाखोरी, दहेज और महिला शोषण जैसी बुराइयों के खिलाफ खड़ा होगा।
आज के दौर का सबसे बड़ा संकट यह है कि समाज बुराइयों के प्रति संवेदनहीन होता जा रहा है। हर दिन अख़बारों में दुष्कर्म, हत्या और भ्रष्टाचार की खबरें छपती हैं, लेकिन हम उन्हें सामान्य मानकर टाल देते हैं। पुतला जलाने के बाद हम चैन से घर लौट आते हैं, मानो बुराई का अंत हो चुका हो। हकीकत यह है कि आज के रावण सर्वव्यापी हैं। वे महलों में भी रहते हैं और झोपड़ियों में भी। वे पढ़े-लिखे भी हैं और अशिक्षित भी। वे राजनीति, व्यापार, शिक्षा और समाज के हर क्षेत्र में फैले हुए हैं।
राम केवल एक ऐतिहासिक या धार्मिक पात्र नहीं, बल्कि आदर्श और मूल्यों का प्रतीक हैं। राम का अर्थ है धर्म का पालन। राम का अर्थ है सत्य और न्याय के लिए संघर्ष। राम का अर्थ है मर्यादा और कर्तव्यनिष्ठा। लेकिन आज का समाज राम के गुणों को अपनाने के बजाय केवल राम के नाम का राजनीतिक और धार्मिक उपयोग कर रहा है। परिणाम यह है कि रावण जलते तो हैं, पर मन के रावण और समाज के रावण और अधिक शक्तिशाली होकर खड़े हो जाते हैं।
दशहरा हमें अवसर देता है कि हम रुककर सोचें—क्या हम अपने भीतर के रावण को पहचान पा रहे हैं? क्या हम अपने जीवन से एक भी बुराई कम कर पाए हैं? क्या हम समाज को बेहतर बनाने के लिए कोई ठोस कदम उठा रहे हैं? यदि इन सवालों का जवाब “नहीं” है, तो हमें स्वीकार करना होगा कि रावण दहन केवल एक परंपरा बनकर रह गया है।
सबसे बड़ी ज़रूरत यह है कि हम केवल पुतले जलाने की रस्म न निभाएँ, बल्कि अपने भीतर और समाज में मौजूद रावणों को पहचानें और उनका संहार करने का साहस दिखाएँ। तभी दशहरा एक सच्चे अर्थ में विजयादशमी बन पाएगा। जब-जब हम अपने भीतर के अहंकार, वासना और लोभ को परास्त करेंगे, तब-तब हमारे भीतर का राम जीवित होगा। और तभी हम कह सकेंगे कि रावण सचमुच मरा है।

Related posts

ज़ी सिनेमा शानदार अंदाज़ में लेकर आ रहा ‘गदर 2’ का वर्ल्ड टेलीविजन प्रीमियर

rktvnews

बक्सर: बिहार के मुख्य सचिव की विडियो कांफ्रेंसिंग के माध्यम से आयोजित समीक्षात्मक बैठक में जिलाधिकारी रहे शामिल।

rktvnews

शरत कुमार बनाये गये बिहार राज्य शतरंज प्रतियोगिता आयोजन कमिटी क़े चेयरमैन!राज्य स्तरीय प्रतियोगिता 4 से 6 अगस्त तक।

rktvnews

मनीगाछी के नेहरा ग्राम में श्रीरामपुर वितरणी लम्बाई 08 कि.मी के पुनर्स्थापन कार्य का एवं बेनीपुर प्रखण्ड के तरौनी ग्राम में सकरी शाखा नहर स्थल का मंत्री ने किया निरीक्षण।

rktvnews

रायपुर : मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय से कार्टूनिस्ट त्रयंबकम शर्मा ने की सौजन्य मुलाकात।

rktvnews

चतरा:राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के क्रियान्वयन की समीक्षा हेतु झारखण्ड राज्य खाद्य आयोग की प्रभारी अध्यक्ष का चतरा दौरा।

rktvnews

Leave a Comment