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पटना:ओज और राष्ट्रीय चेतना के ही नहीं प्रेम और ऋंगार के भी कवि हैं दिनकर : डॉ अनिल सुलभ

जयंती पर साहित्य सम्मेलन में कवयित्री रंजीता सिंह के काव्य-पुस्तक ‘चुप्पी’ पर हुई चर्चा, हुआ कवि-सम्मेलन।

RKTV NEWS/पटना(बिहार)23 सितम्बर। प्रत्येक कवि हृदयवान और संवेदनशील होता है। उसके कोमल हृदय में प्रेम और करुणा का सागर लहराता है। इसीलिए प्रत्येक मौलिक कवि में प्रेम, प्रकृति और ऋंगार की प्रधानता होती है। क्योंकि वह समाज की पीड़ा को भी अंतर्मन से समझता है, इसलिए वह जन-पीड़ा और संघर्ष को भी काव्य का विषय बनाता है। उसमें लोक-मंगल की भावना होती है और राष्ट्रीय चेतना भी। समय-समय पर वह ओज और आक्रोश के रूप में भी प्रकट होती है। कवि अपने सामाजिक दायित्व को भी समझता है। इसलिए उसकी रचनाओं में जीवन के प्रति उत्साह और संघर्षों से जूझने की अपार शक्ति भी होती है। महान राष्ट्रकवि दिनकर में एक समग्र काव्य-चेतना है। वे ओज और राष्ट्रीयता के कवि तो हैं ही, प्रेम और ऋंगार के भी कवि हैं।
यह बातें राष्ट्र्कवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की जयंती पर, बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन में आयोजित कवि-सम्मेलन और देहरादून की कवयित्री रंजीता सिंह “फलक” की काव्य-पुस्तक ‘चुप्पी प्रेम की भाषा है’ पर चर्चा गोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए, सम्मेलन अध्यक्ष डा अनिल सुलभ ने कही। उन्होंने कहा कि रंजीता जी एक सजग और संवेदनशील कवयित्री हैं। उनकी नूतन पुस्तक प्रेम को केंद्र में रख कर लिखी गयी कविताओं का संग्रह है, जिसमें प्रेम के शाश्वत स्वरूप को अनेक दृष्टियों से परखने की चेष्टा हुई है और चुप्पी को इसकी अभिव्यक्ति की श्रेष्ठ भाषा के रूप में स्थापना प्राप्त हुई है।
कवयित्री रंजीता सिंह ने अपनी पुस्तक से पाँच प्रतिनिधि रचनाओं का पाठ भी किया तथा कहा कि चुप्पी अपने आप में एक वार्तालाप है। प्रेम में किसी शब्द की आवश्यकता नहीं होती। ये आपकी आँखों से अभिव्यक्त हो जाता है। वैसे भी यह प्रेम बहुत व्यापक है। ये कविताएँ और कुछ नहीं, ईश्वर को लिखे उलाहना-पत्र है। इसे मेरा आत्मालाप भी कहा जा सकता है। मैं दुःख देने वाले सबको क्षमा कर चुकी हूँ। मैं मानती हूँ कि मुझे मिले दुःख ही मेरी कविताओं के पाथेय हैं। मैं अपने चारों ओर एक चाहरिदिवारी रखती हूँ, जो मेरी रक्षा करती रहती है।
राँची विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के पूर्व अध्यक्ष डा जंग बाहादुर पाण्डेय, सम्मेलन की उपाध्यक्ष डा मधु वर्मा, डा रत्नेश्वर सिंह तथा विभा रानी श्रीवास्तव ने भी अपने विचार व्यक्त किए।
इस अवसर पर आयोजित कवि-सम्मेलन का आरंभ चंदा मिश्र ने वाणी-वंदना से किया। वरिष्ठ कवि प्रो समरेंद्र नारायण आर्य, शायरा शमा ‘कौसर ‘शमा’, सिद्धेश्वर, अरुण कुमार श्रीवास्तव, इन्दु भूषण सहाय, स्वर्ग सुमन, सुनीता रंजन, सूर्य प्रकाश उपाध्याय आदि कवियों और कवयित्रियों ने भी अपनी रचनाओं का पाठ किया। मंच का संचालन कवि ब्रह्मानन्द पाण्डेय ने तथा धन्यवाद-ज्ञापन सम्मेलन के भवन अभिरक्षक प्रवीर कुमार पंकज ने किया।
डा चंद्रशेखर आज़ाद, सच्चिदानन्द शर्मा, राज आनन्द, दुःख दमन सिंह, नन्दन कुमार मीत, सूरज कुमार, रूबी झा, डौली कुमारी आदि सुधीजन उपस्थित थे।

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