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डा भीम सिंह भवेश रचित “कलकत्ता से कोलकाता”पुस्तक का हुआ लोकार्पण।

*सामाजिक बदलाव की उम्मीद है कलकता से कोलकाता- डॉ ज्योतिष जोशी
*साहित्य से भी है आरा की पहचान-अजय कुमार

आरा/भोजपुर डॉ (दिनेश प्रसाद सिन्हा) 14 मई। आरा के स्थानीय विद्या भवन सभागार में पत्रकार भीम सिंह भवेश द्वारा लिखित चौथी पुस्तक “कलकत्ता से कोलकाता” का लोकार्पण समारोह आयोजित हुआ। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए डॉ ज्योतिष जोशी ने कहा कि रचनाएं खुद ब खुद अपना आकार ले लेती हैं। कहानीकार की भाषा से मानक भाषा नहीं आती है। उन्होंने पुस्तक के बारे में जिक्र करते हुए कहा कि संस्मरण लेखन भारत की विधा नहीं थी, लेकिन 1905 से भारत में हिंदी लेखन में संस्मरण भी लिखा जाने लगा। कलकत्ता से कोलकाता का जिक्र करते हुए डॉ जोशी ने कहा कि समाज के बिखराव की रोजाना खबरें आ रही हैं। समाज कहां जा रहा है, लोगों को पता नहीं है। ऐसे में यह संस्मरण एक सामाजिक बदलाव की उम्मीद है। उन्होंने कहा कि बिहार की भूमि लेखक-कवियों की धरती है। उन्होंने कहा कि संस्मरण में पत्रकारिता को आधार बनाकर जिस तरह से उन्होंने तथ्य सहित घटनाओं का समावेश किया है, वह अपने आप में काबिले तारीफ है। उनकी इस विधा में अनेक कलाओं का मिश्रण है। वरीय पत्रकार और संपादक अजय कुमार ने कहा कि आरा की पहचान सभ्यता-संस्कृति के साथ साहित्य में भी रही है। नागरी प्रचारिणी और वहां का पुस्तकालय इसका परिचायक है। उन्होंने कहा कि स्मृतियों में ताकत होती हैं। उनसे कुछ चीजें भी निकलकर आती हैं। उन्होंने आरा से जुड़ेे ऐतिहासिक चीजों पर शोध की आवश्यकता जताते हुए कहा कि एक ऐसा संगठन बनना चाहिए, जो इतिहास के गर्भ में छिपे अहम चीजों को निकाल सकें। भीम सिंह की चारों पुस्तके अलग-अलग क्षेत्रों केे अलग-अलग विधाओं से ताल्लुक रखती हैं, जो पठनीय हैं। विषय प्रवर्तन करते हुए प्रो दिवाकर पाण्डेय ने कहा कि संस्मरणों में कल्पना नहीं लेकिन कलात्मकता जरूर होती है,भवेश जी ने संस्मरणों को न केवल लिपिवद्ध किया है बल्कि उन्हें किताब का रूप देकर रोचक अंदाज में परोसा है। छोटे-छोटे संस्मरणों को पुस्तक का आकार देना एक बड़ी उपलब्धि है। डॉ विजयलक्ष्मी शर्मा ने कहा कि संस्मरण रुपी पुस्तक का पाठक समाज पर गहरा प्रभाव पड़ता है। इससे अपनापन का एहसास होता है। साहित्यकार जितेंद्र कुमार ने कहा कि पुस्तक की भाषा में विविधताएं हैं। नए शब्दों का साहित्य में रोज समावेश हो रहा है। ऐसे में पुस्तक के 18 संस्मरणों को पढ़कर कुलदीप नैयर याद आ जाते हैं। डॉ नंद जी दुबे ने कहा कि भोजपुर की धरती संघर्ष की धरती रही है। यहां साहित्य और संस्कृति का लगातार विकास और उद्भव होता रहा है। आरा के लोगों ने साहित्य में नई शैली प्रदान की है। ऐसे में यह संस्मरण रूपी पुस्तक अपने आप में इनसाइक्लोपीडिया है। स्वागत भाषण डॉ भीम सिंह भवेश संचालन प्रो केके सिंह एवं धन्यवाद ज्ञापन वीर कुंवर सिंह विवि के पूर्व डीन प्रो कृष्ण कांत सिंह ने किया मौके पर प्रो पषुपति नाथ सिंह, पूर्व प्रचार्य बलिराज ठाकुर, प्रो सत्यनारायण सिंह, राम गोविंद सिंह, अवधेष पाण्डेय, पूर्व प्राचार्य डॉ कमल कुमारी, जनार्दन मिश्र, ममता मिश्र, गुंजन सिन्हा, राम कुमार सिंह, देवेन्द्र प्रसाद, कंचन किषोर , मिथिलेष कुमार, कृष्ण कुमार, अमरेन्द्र कुमार, कंचन कामिनी, निषी जैन आदि प्रमुख थे।

 

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