
पटना/बिहार (राकेश मंगल सिन्हा) 30 अक्टूबर। दीपावली को दीपों का त्योहार कहा जाता है। इस दिन लोग घरों में तथा मंदिरों में दीप जलाते हैं। रात में लोग घरों को दीपों से सजाते हैं। कार्तिक महीने की अमावस्या के दिन दीपावली मनाई जाती है। दीपावली पर्व से जुड़ी हैं कई मान्यतायें। प्रभु श्री राम, माता सीता और लक्ष्मण जी के 14 वर्षों के वनवास के बाद अयोध्या वापस आने की खुशी में दीपावली का त्यौहार मनाया जाता है। त्रेता युग में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम द्वारा रावण वध के बाद लंका पर विजय प्राप्त करने तथा 14 वर्षों के वनवास के बाद अयोध्या आगमन पर पूरी अयोध्या नगरी को दीप मालिकाओं से सजाया गया था। ऐसी भी मान्यता है कि सतयुग में समुद्र मंथन के दौरान प्रकट हुई माता महालक्ष्मी के स्वागत में दीपावली मनाई जाती है। दीपावली के दिन लक्ष्मी जी की पूजा विशेष रूप से की जाती है। माँ लक्ष्मी को धन और समृद्धि की देवी के रूप में पूजा जाता है। दीपावली के दिन धन प्राप्ति की कामना हेतू माॅ लक्ष्मी की पूजा की जाती है। लोगों का ऐसा मानना मानना है कि दीपावली के दिन माॅ लक्ष्मी का आगमन घर में होता है। लोग दीपावली के पहले घरों की साफ-सफाई एवं रंग रोगन करते हैं ताकि माॅ लक्ष्मी खुश होकर घरों में प्रवेश करें। माॅ लक्ष्मी के आगमन की खुशी में लोग घरों को दीपों से सजाते हैं। मिट्टी के बने दीयों में तेल डालकर लोग दीपों को जलाते हैं। जबकि मंदिरों और पूजा स्थलों में घी के दीये जलाये जाते हैं। कुम्हार मिट्टी के दीयों को बनाते हैं। इससे कुम्हारों को अच्छी खासी आमदनी होती है। समय के बदलाव के साथ ही दीपावली मनाने के तरीकों में भी बदलाव आने लगा है। धीरे-धीरे दीया मे बत्ती लगाने और तेल डालने के झंझट से लोग मोमबत्ती और सीरोज बल्ब की तरफ मुखातिब हो गये। आधुनिकता के इस दौर में लोग घरों में तरह-तरह के आकर्षक लाइट और सीरीज बल्ब लगा रहे हैं। इससे घरों पर दीपक जलाने का प्रचलन अब खतम होते जा रहा है। धनतेरस और उसके पहले से ही लोग घरों पर सीरीज बल्ब लगा दे रहे हैं जो देखने में भी काफी आकर्षक लग रहा है। तरह-तरह के चाइनीज लाइटों ने भी रही सही कसर पूरी कर दी है। शहर की कौन कहे गाँवों में भी यही प्रचलन शुरू हो गया है। अब लोग घरों में और मंदिरों में पूजा करने के लिए ही दीया का उपयोग कर रहे हैं। पुराने सोच वाले लोग ही घरों पर दीया जला रहे हैं। इससे दीया की बिक्री कम हो गई है। मिट्टी के खिलौनों का भी प्रचलन समय के साथ-साथ काम होते जा रहा है। तरह-तरह के आकर्षण खिलौने बाजार में उपलब्ध हैं। कुल मिलाकर देखा जाय तो इससे कुम्हारों की आमदनी भी घट गई है। दीयों के जलने के साथ ही कुम्हारों के दिल भी जल रहे हैं।
