
गौ दान
एक ग्राम में
रघू झग्गू
सगा थे भाई
दोनों अपढ़ रह
करते थे खेती ।
द्वार पर
कास के फूल सा
शोभ रहे थे
दो बैल दो गायें
घर में
बह रही थी
दूध घी की नदी ।
दोनों की पत्नियाँ
बड़ी थीं मेहनती
घर का सारा काम
दिनभर रहतीं पीटती ।
उसी गाँव में
एक थे प्रकाण्ड पंडित
गाँव में
व्रत कथा से लेकर
विवाह श्राद्ध तक
इन्हीं से सब थे कराते
इसी कर्म से पंडितजी
चलाते थे निज कुटुंब ।
एक दिन
उन दोनों के
बीमार तात
अचानक गए मर
पूरा कुटुंब
शोक में गया डूब।
श्राद्ध के समय
तात् की आत्मा को
शाँति प्राप्तार्थ
पंडित जी को
दोनों भाईयों ने
दिया द्रव्य से लेकर
वसन तक दान।
पंडित जी बोले अंततः
यजमान !आपके तात
यहाँ बिन दूध नहीं थे खाते
स्वर्ग में
मिलता नहीं उन्हें दूध
अतः उनके लिए
एक गाय कीजिये दान ।
पंडितजी की बात मान
दोनों ने मिल किया गौ दान
अब पाँच पाँच लीटर दूध
पंडितजी का परिवार
खाने लगा सुबह शाम।
रघु झग्गु के तात के लिए
बचता ही नहीं एक चम्मच दुग्ध ।
एक रात सपना में वे बोले
बेटा रघु झग्गु
दूध खाये हो गए बहुत दिन
क्या मेरे लिए बचता नहीं दूध?
तातश्री
आपके लिए
हम दोनों भाईयों ने
कर दिया है गौ दान ।
पंडितजी ने अभी तक
पहुँचाई नहीं आप तक गाय?
नहीं बेटा
अच्छा, कल उनसे पूछते हैं ।
सुबह सुबह दोनों भाई
गए पंडितजी के द्वार
देखते हैं कि
पंडितजी गाय दुहकर
पिला रहे अपने पोती पोतों को
भर भर गिलास ।
गुस्सा से भर
एक ने कहा
पंडितजी मेरे स्वर्गवासी पिता तक
क्यों नहीं पहुँची अभी तक गाय
जबकि महीनाभर हो गया
किया हुआ गौ दान ।
दूसरा बोला
अरे! कहाँ से मिलेगा पिता जी को दूध!
सब दुग्ध तो
पी जा रहा पंडितजी का कुटुंब ।
सुनो झग्गु
अब एक काम करो तुम
गाय खोलकर ले चलो अपने घर
गौ दान करने से क्या लाभ
जब पिता को
स्वर्ग में
मिलता ही नहीं दुग्ध ।
पंडितजी बोले
बात यह है कि
एक गाय स्वर्ग पहुँचाने में
पड़ता बहुत खर्च यजमान
मिलने दीजिए गौ दान में
चार छः और गायें
सबको ट्रक में भर
पहुँचा दूँगा स्वर्ग
कुछ दिन और कीजिए इंतजार।
पंडितजी की बात न मान
दोनों भाई खोलकर गाय
ले आये अपने द्वार ।

