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व्यंग्य🤪 तेरा दर्द न जाने कोय!

RKTVNEWS/रवींद्र पांडेय,16 जून।केवल दाग अच्छे नहीं होते। दर्द भी अच्छे होते हैं। दर्द में विस्फोटक ऊर्जा होती है। हर सफलता के पीछे एक कहानी होती है। कहानी छोटी हो सकती है। बड़ी हो सकती है। मझोली भी होती है। पर जैसी भी हो, वह पलती तो दर्द की कोख में ही है। इसलिए दर्द की जमीन तैयार करने वाले को सम्मान और इज्जत पाने का पूरा हक है। कहते हैं – आवश्यकता आविष्कार की जननी है। यह भी कहना चाहिए – दर्द सफलता की जननी होती है। जितना दर्द, उतनी सफलता। जितनी सफलता, उतने दर्द। जितने दर्द, उतनी कहानियां। मगर जरुरी नहीं कि दर्द की कहानियां भी दर्दनाक हों। कुछ मजेदार भी हो सकती हैं।
अब नेताजी जी के दर्द को ही ले लीजिए। सुबह-सुबह कमोड पर बैठे, तो ज्ञान चक्षु खुल गए। कमोड जगह ही ऐसी है। और कुछ खुले न खुले, ज्ञान चक्षु अवश्य खुल जाते हैं। बड़े से बड़े आविष्कार के बीज यहीं अंकुरित होते हैं। एक से बढ़कर एक आइडियाज के पल्लवित-पुष्पित होने में यहां की आबोहवा बहुत सहायक होती है। नेताजी के मन में भी आइडियाज की बाढ़ आने लगी। नई सरकार को कुछ नया करना चाहिए। ये सीट वाले ट्वायलेट बदलवाने होंगे। हर घर में कमोड लगना चाहिए। जो बात कमोड में है, वह सीट में आ ही नहीं सकती। सीट आदमी को एकदम से पुअर माइंडसेट में लेकर चला जाता है। अब पंचायत वाले बेचारे बिनोद को ही देख लीजिए। सीट के सपने देखता रहता है। खैनी और चुनौटी से आगे सोच ही नहीं बढ़ती। और चुनौटी भी कौन… तो प्लास्टिक वाली‌। विधायक जी दूरदर्शी हैं। इस दूरदर्शिता के पीछे कमोड ही होगा। वे झोपड़ी में नहीं रहते। महल में रहते हैं। महल के मर्यादा की रक्षा तो कमोड ही कर सकता है। नया वाला आइडिया नई सरकार के सामने लाना होगा। मनुष्य को मनुष्य जैसा सम्मानजनक अधिकार तो मिलना ही चाहिए। खाने-पीने का क्या है? कुछ भी खा लेगा। खा ही रहा है। देश भर में अर्थशास्त्री भरे पड़े हैं। लेकिन व्यावहारिक अर्थशास्त्र की मानें, तो खाने का इंतजाम करना बड़ा काम है। हर जिंदा इंसान खाता है। भर दिन में तीन-चार बार खाता है। जब तक जिंदा रहता है खाता ही रहता है। जो कुछ नहीं करता, वह भी खाता है। कहते भी तो हैं – काम का न काज का‌… नौ मन अनाज का। इतना बड़ा देश है। इतनी बड़ी आबादी है। कहां से लाएंगे इतना अनाज‌? बहुत खर्चा है भाई! सबके लिए खाने का बेहतर इंतजाम करने में तो सरकार का दिवाला निकल जाएगा। खाने का इंतजाम खुद कीजिए। हां, निबटने की उच्चस्तरीय व्यवस्था सरकार करेगी। हर किसी के लिए करेगी। यह बजट में है।

रवींद्र पांडेय

एक बार वर्ल्ड क्लास ट्वायलेट बना दिया, तो जीवन भर की छुट्टी। एक ही खर्च में पूरा परिवार निबट लेगा। जिनको कमोड यूज करना नहीं आता, वे सीख भी लेंगे। हम दुनिया की तीसरी अर्थव्यवस्था बनने वाले हैं। तीसरी अर्थव्यवस्था के लोगों को इतना सउर तो होना ही चाहिए। नए आइडिया में दम है। नेताजी का मन झूम उठा। मगर यह खुशी पल भर में गायब हो गई। दिल में दर्द बढ़ने लगा। खुद का दर्द सामने आ जाए, तो आदमी दुनिया का दर्द भूल ही जाता है। बताइए भला। नेताजी कितनी मेहनत से चुनाव जीते हैं। उनकी पार्टी भी जीती है। उनके पार्टी की सरकार भी बनी है। लेकिन उनको मंत्री नहीं बनाया। मंत्री बन जाते तो नए वाले आइडिया से दुनिया में अपने नाम का डंका बजवा लेते। ओह! ये दर्द तो बढ़ता ही जा रहा है। आधे घंटे पहले खुल चुके ज्ञान चक्षु अब चौड़े होने लगे थे। दिव्य ज्ञान की बारिश हो रही थी – ठीक है! सपने बड़े होने चाहिए। सोच बड़ी होनी चाहिए। दिल बड़ा होना चाहिए। लेकिन दल तो छोटे ही होने चाहिए। छोटे दल होने से मंत्री बनने के चांसेज बढ़ जाते हैं। आदमी किसी भी सरकार में चिपक सकता है। लोकतंत्र की ब्यूटी भी यही है। इस ब्यूटी के आनंद से वंचित रहना ही इस मायावी संसार का सबसे बड़ा दर्द है।

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