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ब्रह्मांड की बेटी : अजय गुप्ता”अज्ञानी”

साहित्यकार अजय गुप्ता “अज्ञानी”

ब्रह्मांड की बेटी!

पहाड़ो के चिथड़े कर,
यूँ खुशियाँ मना रहे ।
यें मानव भी अजीब है,
मौत को करीब ला रहे।

पहाड़ों के दिल में कर सुराख,
नयापन देख रहे।
गिरता पहाड़ सड़को पर,
कुदरत को बेरुखा बता रहे।

सोख ली नमी घाटी की,
पहाड़ो को क्या कहे?
मरते हुए जंगल,
दावानल को क्या कहे?

कौन बचाए प्रकृति को?
मानव जो रार करे।
उफनता हुआ समंदर पर,
कभी थोड़ा विचार करे।

रेत होने लगे दोआब,
नदियां मिट रही।
धान की खेतो में,
नागफनियाँ उग रही।

मानव की पिपासा में,
प्रतियोगिता होने लगे।
प्रकृति की अस्मत,
सरेआम लुटने लगे।

कौन है बचाए?
चीर बताओ अबला के।
सैयादो के हाथों में,
जो बुलबुल पलने लगे।

कहाँ बचा आकाश,
पाताल इस ब्रह्मांड में।
क़हर इंसानो के,
अब सरेआम दिखने लगे।

ज़ार-ज़ार होने लगी,
अब ब्रह्मांड की बेटी।
मिट जायेगी अबला,
गर पिपासा ना रोकी।

हो सके तो रुक जाओ,
अभी वक्त बाकी है।
वरना कुदरत के प्रकोप का,
कभी मिलता ना माफी है।
मिलता ना—————।

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