रांची/ झारखंड ( डॉ अजय ओझा,वरिष्ठ पत्रकार)23 मई।वैशाख पूर्णिमा भगवान बुद्ध के जीवन की तीन अहम बातें – बुद्ध का जन्म, बुद्ध को ज्ञान प्राप्ति एवं बुद्ध का निर्वाण के कारण भी विशेष तिथि मानी जाती है। गौतम बुद्ध ने चार सूत्र दिए उन्हें ‘चार आर्य सत्य ‘के नाम से जाना जाता है।
हर वर्ष वैशाख महीने की पूर्णिमा तिथि पर भगवान बुद्ध का जन्मोत्सव का पर्व बड़े ही उत्साह के साथ मनाया जाता है। बौद्ध धर्म के अनुसार भगवान बुद्ध का जन्म वैशाख पूर्णिमा की तिथि पर हुआ था। हिंदू धर्म में भगवान बुद्ध को विष्णुजी का अवतार माना जाता है इसलिए इस तिथि को हिंदू और बौद्ध धर्म के दोनों अनुयायी बहुत ही श्रद्धा भाव से इस त्योहार मनाते हैं। इस वर्ष बौद्ध पूर्णिमा का त्योहार 16 मई को मनाई जाएगा। इस दिन साल का पहला चंद्र ग्रहण भी लगेगा। ऐसे में इस दिन भगवान विष्णु के साथ भगवान बुद्ध और चंद्रदेव की भी पूजा की जाएगी।
बुद्ध पूर्णिमा का महत्व
वैशाख मास की पूर्णिमा को वैशाखी पूर्णिमा,पीपल पूर्णिमा या बुद्ध पूर्णिमा के नाम से जाना जाता है। शास्त्रों के अनुसार वैशाख पूर्णिमा सभी में श्रेष्ठ मानी गई है। प्रत्येक माह की पूर्णिमा जगत के पालनकर्ता श्री हरि विष्णु भगवान को समर्पित होती है। भगवान बुद्ध को भगवान विष्णु का नौवां अवतार माना गया है। जिन्हें इसी पावन तिथि के दिन बिहार के पवित्र तीर्थ स्थान बोधगया में बोधि वृक्ष के नीचे बुद्धत्व की प्राप्ति हुई थी। वैशाख माह को पवित्र माह माना गया है। इसके चलते हज़ारों श्रद्धालु पवित्र तीर्थ स्थलों में स्नान,दान कर पुण्य अर्जित करते हैं। पूर्णिमा के दिन पवित्र नदियों में स्नान करने का विशेष महत्त्व माना गया है।
भगवान बुद्ध के चार आर्य सत्य
वैशाख पूर्णिमा भगवान बुद्ध के जीवन की तीन अहम बातें-बुद्ध का जन्म,बुद्ध को ज्ञान प्राप्ति एवं बुद्ध का निर्वाण के कारण भी विशेष तिथि मानी जाती है। गौतम बुद्ध ने चार सूत्र दिए उन्हें ‘चार आर्य सत्य ‘के नाम से जाना जाता है। पहला दुःख है दूसरा दुःख का कारण तीसरा दुःख का निदान और चौथा मार्ग वह है जिससे दुःख का निवारण होता है। भगवान बुद्ध का अष्टांगिक मार्ग वह माध्यम है जो दुःख के निदान का मार्ग बताता है। उनका यह अष्टांगिक मार्ग ज्ञान, संकल्प, वचन, कर्म, आजीव, व्यायाम, स्मृति और समाधि के सन्दर्भ में सम्यकता से साक्षात्कार कराता है। गौतम बुद्ध ने मनुष्य के बहुत से दुखों का कारण उसके स्वयं का अज्ञान और मिथ्या दृष्टि बताया है।
बुद्ध पूर्णिमा के दिन बोधगया में दुनियाभर से बौद्ध धर्म मानने वाले यहाँ आते हैं। बोधि वृक्ष की पूजा की जाती है। मान्यता है की इसी वृक्ष के नीचे गौतम बुद्ध को ज्ञान प्राप्त हुआ था। इस दिन बौद्ध मतावलंबी बौद्ध विहारों और मठों में इकट्ठा होकर एक साथ उपासना करते हैं। दीप प्रज्जवलित कर बुद्ध की शिक्षाओं का अनुसरण करने का संकल्प लेते हैं। महात्मा बुद्ध ने अपने ज्ञान के प्रकाश से पूरी दुनिया में एक नई रोशनी पैदा की और पूरी दुनिया को सत्य एवं सच्ची मानवता का पाठ पढ़ाया।
बुद्ध चिंतन
देह शूद्र है।
मन वैश्य है।
आत्मा क्षत्रीय है।
परमात्मा ब्राह्मण।
इसलिए ब्रह्म परमात्मा का नाम है।
ब्रह्म से ही ब्राह्मण बना है।
देह शूद्र क्यों।
क्योंकि देह में कुछ और है भी नहीं।
देह की दौड़ कितनी है…
खा लो, पी लो, भोग कर लो, सो जाओ।
जियो और मर जाओ।
शूद्र की सीमा है यही।
जो देह में जीता है वो शूद्र।
शूद्र का अर्थ हुआ…
देह के साथ तादात्म।
मैं देह हूं।
ऐसी भावदशा… शूद्र।
मन .. वैश्य।
मन खाने पीने से ही राजी नहीं होता।
कुछ और चाहिए।
मन यानी और चाहिए
शूद्र में एक तरह की सरलता है।
देह ज्यादा मांगे नहीं करती।
दो रोटी मिल जाएं,
सोने के लिए छप्पर मिल जाएं,बिस्तर मिल जाएं।
जल मिल जाए।
कोई प्रेम करने को मिल जाए।
या प्रेम लेने देने को मिल जाएं
बस देह की मांगे सीधी साफ है,थोड़ी है, सीमित हैं। देह की मांगे सीमित है।
देह कुछ ऐसी बातें नही मांगती जो असंभव है।
देह को असंभव में रस नही है।
देह बिलकुल प्राकृतिक है।
इसलिए मैं कहता हूं कि सभी शूद्र की तरह पैदा होते हैं, क्योंकि सभी देह की तरह पैदा होते हैं।
जब और …और की वासना उठती है..
तो वैश्य।
वैश्य का मतलब है कि और धन चाहिए।
हेनरी फोर्ड अपने बुढ़ापे तक और नए धंधे खोलता चला गया। किसी ने उसकी अत्यंत वृद्धावस्था में कुछ दिन पहले ही पूछा उस से… कि आप अभी भी धंधे खोलते चले जा रहे हैं। इतना है।
इतने और नए धंधे खोलने का क्या कारण….?
वो नए उद्योग खोलने की योजना बना रहा था।
बिस्तर पे पड़ा हुआ था।
मरता हुआ था।
हेनरी फोर्ड ने क्या कहा मालूम…..!
हेनरी फोर्ड ने कहा कि मैं नही जानता कि कैसे रूकू? मैं रुकना नही जानता।
मैं जब तक मर ही ना जाऊ…
मैं रुक नही सकता।
ये वैश्य की दशा है।
वो कहता है … और, इतना है तो और।
ऐसा मकान ही तो … और थोड़ा बड़ा।
उतना धन है तो और थोड़ा ज्यादा धन।
देह शूद्र है और सरल।
शूद्र सदा ही सरल होते हैं।
मन बहुत चालबाज, चालाक, होशियार, हिसाब बिठाने वाला।
मन की सब दौड़े हैं।
मन किसी चीज़ से राज़ी नहीं।
मन व्यवसाई है ।
वो फैलाए चला जाता है।
वो जानता ही नहीं, कहा रुकना।
वह अपनी दुकान बड़ी किए चला जाता है।
बड़ी करते करते ही मर जाता है।
आत्मा क्षत्रीय है।
क्यों… क्योंकि क्षत्रीय को ना तो इस बात की बहुत चिंता है कि शरीर की जरूरत पूरी हो जाए।
जरूरत पड़े तो वो शरीर की सब जरूरते छोड़ने को राज़ी है।
और क्षत्रीय को इस बात की भी चिंता नहीं कि और. . और!
अगर क्षत्रीय को इस बात की चिंता है तो जानना कि वो वैश्य है, क्षत्रीय नही है।
क्षत्रीय का मतलब ही ये होता है ..
संकल्प का आविर्भाव ।
प्रबल संकल्प का आविर्भाव।
महासंकल्प का आविर्भाव
और महासंकल्प और प्रबल संकल्प की एक ही चुनौती है कि…
मैं कौन हूं!
इसे जान लूं।
शूद्र शरीर को जानना चाहता, उतने में ही जो लेता।
वैश्य मन के साथ दौड़ता।
मन को पहचानना चाहता है।
क्षत्रीय मैं कौन हूं …
इसे जानना चाहता है।
जिस दिन तुम्हारे भीतर ये सवाल उठ आए कि मैं कौन हूं…
तुम क्षत्रीय होने लगे।
अब तुम्हारी धन में, पद में इत्यादि दौड़ो में कोई उत्सुकता नहीं रहती।
एक नई यात्रा शुरू हुई।
अंतरयात्रा शुरू हुई।
तुम ये जानते हो, इस देश में जो बड़े से बड़े ज्ञानी हुए ,सब क्षत्रीय थे।
बुद्ध, जैनों के चौबीस तीर्थंकर , राम, कृष्ण ।
सब क्षत्रीय थे …क्यो !
होना चाहिए ब्राह्मण लेकिन थे क्षत्रीय।
क्यूंकि ब्राह्मण होने से पहले क्षत्रीय होना चाहिए।
जिसने जन्म से अपने को ब्राह्मण समझ लिया वो चूक गया। उसे पता ही नही चलेगा की बात क्या है?
संकल्प यानी क्षत्रीय।
भोग यानी शूद्र।
तृष्णा यानी वैश्य
संकल्प यानी क्षत्रीय
और जब संकल्प पूरा जो जाए तभी समर्पण की संभावना है।
तब समर्पण यानी ब्राह्मण।
जब तुम अपना सब कर लो… तभी तुम झुकोगे।
उसी झुकने मे असलियत होगी।
जब तुम्हे लगता है मेरे लिए हो जाएगा, तब तक तुम झुक नही सकते।
तुम्हारा झुकना धोखे का होगा, मिथ्या होगा।
अपना सारा दौड़ना दौड़ लिए। अपना करना सब कर लिए और पाया कि अंतिम चीज हाथ नही आती, नही आती… चूकती चली जाती है,
तब एक असहाय अवस्था में आदमी गिर पड़ता है।
जब तुम घुटने टेक के प्रार्थना करते हो तब…
असली प्रार्थना नहीं!
जब एक दिन ऐसे आता है कि तुम अचानक पाते हो की घुटने टिके जा रहें हैं पृथ्वी से….
अब कोई और उपाय नहीं रहा।
जिस दिन झुकना सहज फलित होता है… समर्पण
समर्पण यानी ब्राह्मण।
समर्पण यानी ब्राह्म।
जो मिटा उसने ब्रह्म को जाना।
ये चारों परते तुम्हारे भीतर हैं। ये तुम्हारे ऊपर है कि तुम किसके ध्यान देते हो?
ऐसा ही समझो कि तुम्हारे रेडियों में चार स्टेशन हैं।
तुम कहां अपने रेडियो की कुंजी को लगा देते हो!
किस स्टेशन पर रेडियो को कांटे पर ठहरा देते हो, ये तुमपे निर्भर हैं।
ये चारों तुम्हारे भीतर है।
देह तुम्हारे भीतर है।
मन तुम्हारे भीतर हैं।
आत्मा तुम्हारे भीतर है।
परमात्मा तुम्हारे भीतर है।
अगर तुमने अपने ध्यान को देह पर लगा दिया तो तुम शूद्र हो गए।
बच्चे सभी शूद्र होते है।
बूढ़े अगर शूद्र की तरह मरे
तो अपमान जनक है।
अगर तुमने अपने रेडियो को वैश्य के स्टेशन पर लगा दिया।
तुमने अपने ध्यान को वासना, तृष्णा, लोभ में लगा दिया तो तुम वैश्य हो जाओगे।
तुमने अपने ध्यान को संकल्प पर लगा दिया तो क्षत्रीय हो जाओगे।
तुमने अपने ध्यान को अगर समर्पण में डुबा दिया तो तुम ब्राह्मण हो जाओगे।
ध्यान कुंजी हैं।
जन्म तो शूद्र की तरह हुआ…
मरते वक्त तक कोशिश करो की ब्राह्मण हो जाओ।
इसलिए तैयारी करो।
साधते रहो।
वही आनंद की चरमसीमा है…!!!
बुद्धं शरणं गच्छामि ! संघं शरणं गच्छामि !! धम्मं शरणं गच्छामि !!!
आप सभी को बुद्ध पूर्णिमा की हार्दिक बधाई एवं ढेर सारी शुभकामनाएं !
