
अंतर्मन..!
छोड़ दो द्वंद को,
गगनभेदी हुन्कार दो l
मत डरो बदजुबानी से,
अपनी आवाज़ को पहचान दो ll
कहने वाले कहते रहें,
तरकश में तीर भरते रहें l
न झुके हैं, न झुकेंगे,
अपनी मंजिल को आयाम दो ll
किसने कहा, कब कहा, क्यों कहा,
लोंगों का क्या, तन्हा करेंगें l
समझो, उठो, सामना करो,
बुलंद अपनी तकदीर करो ll
शूल, शैल, शंका, बिसात,
चहुँदिशि मिलेंगे l
परवाह नहीं तंगदिल की,
कल्पना को यथार्थ करो ll
रण-छोड़, अकर्मण्य, अंध,
शून्यता का भाव भरेंगे l
जलजले- सा उठते हुए,
अपने भवभंगिमा को मूर्त करो ll
बंदिशें, सलाखें, कट्टरता,
चढ़ी त्योरियाँ दंभ भरेंगे l
चिंतन नहीं घात- प्रतिघात का,
लक्ष्य- भेदी प्रहार करो l



