
दास्तान–ए–ख़राबहाल!
उसे यारों ने समझाया था
रिश्तेदारों ने मनाया था
शुभेच्छुओं ने दी थी सीख
और प्रेमिका ने कसमें
तब उसके पैरों में विश्वास के जूते थे
सिर पर पुरखों का छोड़ा छाता
और हाथ में
किताबों में पढ़े सबक का टॉर्च
सो बाएं ही चलता रहा सड़क के
कर सारी हांकों को अनसुना
जब घिस गए जूते
टॉर्च के सेल खत्म हो गए
छाता फट गया
सफ़र आधा ही कटा था
अब उसके पास थे
दो थके पांव
एक टूटा दिल
और लंबी दूरी
शिकायतों की लू झुलसाने लगी थी देह
सवालों के नुकीले पत्थर चुभने लगे थे पैरों में
उलाहनाएं डंक मारती थीं
बुझती उम्मीदों के धुएं में दम घुटता था
और खूब तलाशने पर भी नहीं मिला
उसकी जेब में सफलता का कोई कण
हालांकि मौसम अब भी बदल सकता था
अब भी सही हो सकती थीं
ज्योतिषियों की घोषणाएं
सफल हो सकता था
गुरुओं का आशीष
शुभकामनाएं रंग बिखेर सकती थीं
सफ़र आधा बाक़ी था
अभी बाक़ी थी हिम्मत भी
और उम्मीद के दिए अब भी
जल रहे थे दो नयनो में
लेकिन क्या करता वह
मन ही न हुआ सड़क की
दूसरी तरफ़ जाने का।
