
स्त्री की पीर…!
पीर स्त्री की…..
भला कब तक कुरेदोगे,
वो बिखरी थी,वो बिखरी है,
उसकी किरचें …..
भला कब तक बटोरोगे।
छिटककर जो इधर-उधर,
बिखरे हैं शब्द उसके,
उसके मौन को …..
भला कब तक समेटोगे।
परम्परा-रीत की चूनर,
जो उसके सर पर डाली है,
इस पाखंड को ….
भला कब तक संजोओगे ।
उम्र की दहलीज़ पर,
धुंधलका छा रहा इसकी,
उसके दीप संयम का …..
भला कब तक जलाओगे।
उजली भोर जो है वो,
ढलती सांझ भी है वो,
सुलह धीरता और आकुलता की ….
भला कब तक कराओगे।
जो कहते हो समझते हो,
बांच रखा है जन्मों से,
तो यदि कभी समझे…..
इसकी/स्त्री कथा,इसकी व्यथा,
तो……
जब देखोगे आइना….वो चटकेगा,
और खुद को …..
हद तक टटोलोगे……..


