
नारी…!
वह समर्थ है,अबला का मत
नाम उसे दो।
अन्नपूर्णा उदर पूर्ति करती है सबकी।
घर के कोने-कोने में है छाप
उसीके मृदुल करों की।
वर्तमान में जीवन के आयाम हैं जितने,
नहीं अछूता कोई क्षेत्र है उससे।
गगन चूमती, वायुयान को गति देती है।
जलपोतों का संचालन कर
मथती सागर।
शिक्षक बनकर ज्ञान बाँटती।
करती शोध नवीन प्रखर वैज्ञानिक होकर।
बनी चिकित्सक असहायों के
प्राण बचाए,अपनी सुख दुःख
की परवाह नहीं करती है।
काया से ऊपर उठकर तो ध्यान दीजिए,वह सबला है।
विपदा में भी धैर्य बँधाती,
पति के साथ ही करती रक्षा
सम्बन्धों की,
चाहे जितना कष्ट उठाना पड़ जाए ,
पर नहीं पराजित होती है वह।
अपने त्याग, तपस्या ममता के कारण ही,
पूजित वह युग युग से ही होती आई है।
माँ, अर्द्धांगिनी ,देवी हैं पुकारते मानव उसको ।
सीता, सावित्री,शांडिल्य
का नाम अमर है शुचि शास्त्रों में।
वर्तमान में भी अनेक का नाम लोक में अमर हुआ इतिहास
पृष्ठ पर।
नारी नर से नहीं कहीं कम है
पुरुषों से।
है आधार सृष्टि की संरचना का।
इसीलिए तो परमात्मा भी
उसके सम्मुख नत है होता।

