भोपाल/मध्यप्रदेश 03 जनवरी। जो भी लघुकथा लिखी जाए उससे पाठक के हृदय में जिज्ञासा और रोचकता का भाव जागृत होना आवश्यक है।लघुकथा विधा में लघुकथा सृजन के साथ -साथ आलोचना का गंभीर कार्य भी बहुत आवश्यक है क्योंकि स्वस्थ्य आलोचना से सृजन निखरता है | यह उद्ग़ार हैं वरिष्ठ लघुकथाकर और आलोचक डॉ.बलराम अग्रवाल के जो लघुकथा शोध केंद्र समिति भोपाल द्वारा ऑन-लाइन आयोजित ‘पुस्तक पखवाड़े ‘ के द्वितीय सत्र मैं वरिष्ठ लघुकथाकर डॉ.शील कौशिक की लघुकथा केंद्रित दो आलोचना कृतियों ‘हिन्दी लघुकथा विश्लेषण में खुलते विविध आयाम ‘ और ‘समीक्षा के दायरे में महिला लघुकथाकर ‘ पर आयोजित समीक्षा गोष्ठी में अध्य्क्षयीय उद्बोधन दे रहे थे |
कार्यक्रम का संचालन करते हुए वरिष्ठ साहित्यकार गोकुल सोनी में मंचस्थ अतिथियों का स्वागत करते हुए पुस्तक संस्कृति को विकसित करने के उद्देश्य से प्रारंभ किए गए पुस्तक पखवाड़े के आयोजन की उपादेयता पर प्रकाश डाला और विस्तार से पखवाड़े की उपदेयता से उपस्थित जनों परिचित करवाया |
कार्यक्रम में वरिष्ठ समीक्षक और साहित्यकार डॉ.पुरुषोत्तम दुबे नें ‘ हिन्दी लघुकथा विश्लेषण में खुलते विविध आयाम ‘ पुस्तक पर अपनी बात रखते हुए विस्तार से अपनी बात में इस कृति को लघुकथा विधा के सृजनात्मक और सैद्धांतिक पक्ष को प्रस्तुत करने वाला सारगर्भित और शोधपरक महत्वपूर्ण कार्य बताया।वहीं डॉ. शील कौशिक की दूसरी आलोच्य कृति ‘समीक्षा के दायरे में महिला लघुकथाकर ‘ पुस्तक पर अपनी बात रखते हुए समीक्षक घनश्याम मैथिल अमृत ने कहा की शील जी ने इस कृति के माध्यम से समकालीन महत्वपूर्ण महिला लघुकथाकरों के विविध पक्षों को प्रभावी ढंग से रेखांकित किया है | उन्होंने इस कृति में हिन्दी में महिला लघुकथकारों की प्रभावी उपस्थिति , समय के साथ उनके सृजन कथ्य -शिल्प में होने वाले परिवर्तनों की भी पड़ताल की है |
कार्यक्रम के अंत में लघुकथाकार मुज़फ़्फ़र इक़बाल सिद्दीक़ी ने सभी उपस्थितजनों का आभार प्रकट किया कार्यक्रम में देश प्रदेश के अनेक लघुकथा प्रेमी पाठक और लेखक उपस्थित थे।
