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भोपाल:श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी का शहीदी गुरु पर्व मनाया गया!शहीदी पर्व पर कवि दरबार , कीर्तन , प्रवचन , गुरु की कुर्बानियों को सुनकर भाव विभोर हो गई।

भोपाल/ मध्यप्रदेश 17 दिसंबर।बोले सो निहाल सत श्री अकाल के कई बार जयकारे लगे। श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी का शहीदी गुरपुरब पर्व रविवार को गुरुद्वारा गुरु नानक पुरा रायसेन रोड भोपाल में श्रद्धा भक्ति के साथ हजारों श्रद्धालुओं ने श्री गुरु ग्रंथ साहब का चरणों में माथा टेका और गुरु तेग बहादुर जी को स्मरण किया भव्य कवि दरबार में इंटरनेशनल पंथक कवि करमजीत सिंह नूर जालंधर पंजाब , एवं कवि गुरचरण सिंह चरण पंथक कवि दिल्ली , पंथक कवि राशपाल सिंह जालंधर , कीर्तन दरबार में रागी जत्था भाई हरमिंदर सिंह जी, जो उपस्थित हजारों श्रद्धालुओं को गुरु तेग बहादुर की जीवनी सुनाई सुनकर संगत भाव विभोर हो गई।
गुरुद्वारा के ग्रंथी कमलजीत सिंह ने शहीदी पर्व पर कहा कि आज ही के दिन नोवे श्री गुरु तेगबहादुर जी को शहीदी प्राप्त हुई थी। गुरु साहिब जी को ‘हिंद दी चादर’ कहा जाता है, क्योंकि आप जी ने हिंदू धर्म की रक्षा के लिए अपना बलिदान दे दिया था।
श्री गुरु गोबिंद सिंह जी ने पिता साहिब के लिए लिखा है :
तिलक जंझू राखा प्रभु ताका।
कीनो बडो कलू महि साका।
साधनि हेति इति जिनि करी।
सीसु दिया पर सी न उचरी।
धर्म हेतु साका जिनि किया।
सीसु दिया पर सिररु न दिया।
तथा प्रकट भए गुरु तेग बहादुर।
सगल स्रिस्ट पै ढापी चादर।
गुरु जी का प्रकाश श्री गुरु हरगोबिंद साहिब के घर 1621 ई. को माता नानकी जी की कोख से हुआ। गुरु जी बचपन से ही वैराग्य की तस्वीर थे, परंतु करतारपुर साहिब में गुरु हरगोबिंद साहिब जी के साथ मुगलों की हुई लड़ाई में आपने अपनी तलवार के ऐसे जौहर दिखाए कि गुरु हरगोबिंद साहिब जी ने खुश होकर आप जी का नाम त्याग मल्ल जी से बदलकर (गुरु) तेग बहादुर (साहिब जी) रख दिया।
आप जी ने कई वर्ष तक बाबा बकाला नगर में घोर तपस्या की। आप जी की माता नानकी जी तथा पत्नी माता गुजरी भी आपके संग रहे। गुरु तेग बहादुर जी के घर एक पुत्र श्री गुरु गोबिंद राय (सिंह जी) का प्रकाश हुआ। गुरु जी ने आनंदपुर साहिब नामक नगर बसाया तथा वहीं पर औरंगजेब के जुल्मों के सताए हुए कुछ कश्मीरी ब्राह्मण पंडित कृपा राम जी के नेतृत्व में प्रार्थी बनकर उपस्थित हुए। दरअसल, औरंगजेब हिंदुओं को मुसलमान बनने के लिए विवश कर रहा था तथा अपना धर्म बचाने के लिए कश्मीरी ब्राह्मण गुरु जी के पास आए। इनके निवेदन को स्वीकार करते हुए गुरु जी ने अपना बलिदान देने का निश्चय कर लिया।
यह बहुत ही विलक्ष्ण बात है कि गुरु जी अपने हत्यारे के पास स्वयं चलकर पहुंचे। गुरु जी के साथ गए भाई मतीदास जी को औरंगजेब के आदेश पर आरे से जिंदा चीर दिया गया, भाई सतीदास जी को कपास में जिंदा लपेटकर आग लगा दी गई तथा भाई दयाला जी को देग (वलटोही) में पानी डालकर उसमें उबाल दिया गया। गुरु जी को भी करामात दिखाने को कहा गया, परंतु गुरु जी ने इंकार कर दिया। आखिर 1675 ई. में आप जी को चांदनी चौक में शहीद कर दिया गया। श्री गुरु गोबिंद सिंह जी ने गुरु जी की शहीदी के बारे में इस तरह लिखा है।आपने हिंद धर्म की रक्षा के लिए अपने प्राण न्यौछावर किए, इसलिए आप जी को ‘हिंद की चादर’ कहा जाता है।
ऐसे दीन दयाल सतगुरु श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी के शहीदी दिवस पर चरणों में कोटन कोट नमन।बादशाह औरंगजेब ने श्री गुरु तेग बहादुर साहब जी को दिल्ली में लाल किले के सामने चांदनी चौक पर सिर धड़ से अलग कर , शहीद कर दिया था।
बादशाह औरंगजेब के आदेश से लाल किले के सामने भाई सती दास जी को रूई में बांधकर जलाया गया और भाई मती दास जी को जिंदा बांधकर उनको आरे से चीर कर शरीर के दो टुकड़े कर शहीद कर दिया।
उनकी शहादत को याद करने के लिए गुरुद्वारा गुरु नानक पुरा में शहीदी पर्व में ” वीर रस , शौर्य की कविताएं के द्वारा ,, ” कीर्तन ,, ” प्रवचन ,, के द्वारा समूह संगत में ” जोश ,, जोश भर दियाहजारों श्रद्धालु श्री गुरु ग्रंथ साहब जी के चरणो में माथा टेक कर अपनी श्रद्धा सुमन उनको भेंट।
श्री गुरु गोविंद सिंह जी ने कहा ही
*”सूरा सो पहचानिए, जो लरै दीन के हेत, पुरजा-पुरजा कट मरै कबहू ना छाडे खेत”*
इस अवसर पर गुरुद्वारा गुरु नानक पुरा रायसेन रोड के अध्यक्ष कुलदीप सिंह गुलाटी , जनरल सेक्रेटरी जसबीर सिंह भीमरा , रछपाल सिंह समाजसेवी गुरुचरण सिंह अरोरा सहित हजारों श्रद्धालु उपस्थित थे।

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