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नई दिल्ली:”राष्ट्र, राष्ट्रीयता और राष्ट्रवाद’ विषय पर परिचर्चा आयोजित।

नई दिल्ली/10 अक्टूबर। राष्ट्र और देश दोनों के अलग-अलग अर्थ होते हैं। उसी तरह राष्ट्रवाद और देशभक्ति में भी अंतर है। आज के नौजवानों को देशभक्त बनने की जरूरत है न कि एक राष्ट्रवादी। आज का राष्ट्रवाद संकीर्ण है, उसमें विविधता नहीं है। जिस उपनिवेश विरोधी राष्ट्रवाद ने हमें आज़ादी दिलाई थी, उसमें और वर्तमान प्रचलित राष्ट्रवाद में बहुत फ़र्क है। आज का उग्र राष्ट्रवाद सिर्फ मुसलमानों के ही नहीं बल्कि दलितों, पिछड़ों और आदिवासियों के भी खिलाफ है। राष्ट्रवाद के बारे में अगर हमें अपनी समझ बनानी हो तो इसे ऐसे समझें कि देश की विविधिता ही असली राष्ट्रवाद है। ये बातें इंडिया हैबिटैट सेंटर और राजकमल प्रकाशन समूह की साझा पहल विचार-बैठकी की मासिक शृंखला ‘सभा’ की दूसरी कड़ी में आयोजित परिचर्चा के दौरान वक्ताओं ने कही।
‘सभा’ की परिचर्चा का विषय ‘राष्ट्र, राष्ट्रीयता और राष्ट्रवाद’ था जिस पर आधुनिक इतिहासकार एस. इरफान हबीब, लेखक-विचारक प्रो. अपूर्वानंद, राजनीति विज्ञानी प्रो. ज़ोया हसन, समाजशास्त्री प्रो. बद्रीनारायण, इतिहासविद और सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. रतनलाल ने अपने विचार रखे। वहीं परिचर्चा का संचालन युवा इतिहासकार रमाशंकर सिंह ने किया। परिचर्चा की शुरुआत में रमाशंकर सिंह ने एस. इरफान हबीब द्वारा संपादित किताब ‘भारतीय राष्ट्रवाद : एक अनिवार्य पाठ’ का परिचय दिया। यह किताब हाल ही में राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित हुई है जो हमें बताती है कि आज की परिस्थितियों में राष्ट्रवाद को कैसे समझें और कैसे उसे आगे बढ़ायें ताकि एक सर्वसमावेशी, स्वतंत्र और मानवीय राष्ट्र के निर्माण की प्रक्रिया बिना किसी अवरोध के जारी रह सके।
विषय प्रवेश करते हुए कार्यक्रम की पहली वक्ता प्रो. ज़ोया हसन ने कहा, “आज जो राष्ट्रवाद प्रचलन में है उसमें और उपनिवेश विरोधी राष्ट्रवाद जिसने हमें आज़ादी दिलाई थी, उसमें बहुत फ़र्क है। इस समय के राष्ट्रवाद में दूसरों के लिए जगह ही नहीं है बल्कि उपनिवेश विरोधी राष्ट्रवाद में ऐसा नहीं था। इस वक्त का राष्ट्रवाद दूसरे नागरिकों से उम्मीद करता है कि वह देश के लिए बलिदान दे।” आगे उन्होंने कहा, “यह राष्ट्रवाद सिर्फ़ भारत में ही नहीं बल्कि दूसरे देशों में भी प्रचलन में है। इसे आप सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, बहुसंख्यकवादी राष्ट्रवाद या दक्षिणपंथी राष्ट्रवाद कह सकते हैं।”
अगले वक्ता प्रो. बद्रीनारायण ने कहा, “आज़ादी से पहले लोगों के मन में जो भावना थी उसे हम राष्ट्रवाद नहीं बल्कि देशभक्ति कह सकते हैं। देशभक्ति राष्ट्रवाद नहीं है।” उन्होंने कहा, “राष्ट्र और देश दोनों के अलग-अलग अर्थ होते हैं। देश वह है जहाँ तक हमें दिखता है। देश का मतलब है माँ, माटी और मानुष यानी हमारे आसपास का परिवेश ही देश है।”
इसके बाद डॉ. रतनलाल ने ‘भारतीय राष्ट्रवाद : एक अनिवार्य पाठ’ किताब पर बात करते हुए कहा, “इस किताब में संकलित लेख बहुत दुर्लभ हैं और इन्हें एक जगह पर इकट्ठा करना बहुत श्रमसाध्य काम रहा होगा। उससे भी बड़ा काम उन सभी विचारों को इसकी भूमिका में समाहित करने का था। इसे एस. इरफान हबीब ने बेहतरी से पूरा किया जिसके लिए वे बधाई के पात्र हैं।” आगे उन्होंने कहा, “वर्तमान में जिस तरह का उग्र राष्ट्रवाद देश में प्रचलित है वह धर्म आधारित राष्ट्रवाद नहीं, बल्कि वर्णाश्रम धर्मशास्त्र आधारित राष्ट्रवाद है। ऊपरी तौर पर देखने में यह राष्ट्रवाद सिर्फ मुसलमानों के खिलाफ लगता है लेकिन यह उससे कहीं ज्यादा दलितों, पिछड़ों और आदिवासियों के खिलाफ है।” उन्होंने कहा, “डॉ. अम्बेडकर 1930 से पहले जो सवाल उठा रहे थे वे आज भी प्रासंगिक हैं। देश आज भी उसी द्वंद में है, उस समय एक समूह था जो अपने आप को बहिष्कृत महसूस कर रहा था और वह आज भी खुद को उपेक्षित महसूस कर रहा है।”
रमाशंकर सिंह के सवाल का जवाब देते हुए प्रो. अपूर्वानंद ने कहा कि अल्पसंख्यक क्या सोचते हैं इसका जवाब खुद उन्हीं को देना चाहिए। लेकिन देश में अल्पसंख्यकों को अपने बारे में बोलने का अधिकार नहीं दिया जाता है। अगर वो बोलते हैं तो उन्हें सांप्रदायिक कहा जाता है और उनके पक्ष में बोलने वाले को धर्मनिरपेक्ष कहा जाता है। आज हर वर्ग राजनीतिक रूप से इतना सचेत हैं कि वह अपना प्रतिनिधित्व खुद कर सकता है लेकिन अल्पसंख्यकों को यह अधिकार नहीं दिया जा रहा है। आगे उन्होंने कहा, “पंडित जवाहरलाल नेहरू राष्ट्रवाद की ताकत और नुकसान दोनों से भलीभांति परिचित थे। यह उनके विपुल लेखन में देखा जा सकता है। वे जानते थे कि राष्ट्रवाद की परिभाषा को बहुसंख्यक ही निर्धारित करेंगे। वे राष्ट्रवाद के दोनों रूपों से परिचित थे। एक इसकी भयावहता से जो देश के लोगों को दो हिस्सों में बांट सकता है और दूसरा जो लोगों को जोड़कर एकजुट कर सकता है।”
देश के नौजवानों को अगर राष्ट्रवाद के बारे में अपनी समझ बनानी हो तो उनको किस बात का ध्यान रखना चाहिए, इस सवाल का जवाब देते हुए एस. इरफान हबीब ने कहा, “राष्ट्रवाद हमारे लिए बहुत नई अवधारणा है जिसे हमने उन्नीसवीं सदी में यूरोप से अपनाया। लेकिन जिस तरह से यूरोपीय सेकुलरिज्म को हमने अपने अनुसार ढाला उसी तरह राष्ट्रवाद का भी हमने भारतीयकरण किया है। राष्ट्रवाद की परिभाषा हमारे लिए वो नहीं है जो यूरोप में है।” आगे उन्होंने अपनी किताब ‘भारतीय राष्ट्रवाद : एक अनिवार्य पाठ’ पर बात करते हुए कहा, “इस किताब को लिखने का मकसद यही था कि राष्ट्रवाद को लोगों तक उन लोगों की जुबान से पहुंचाया जाय। जिन्होंने हमें राष्ट्रवाद दिया वे सब इस किताब में हैं। यह किताब बताती है कि राष्ट्रवाद की विरासत हमें किन लोगों से मिली है। यह किताब हमें एक रास्ता दिखा सकती है।” वर्तमान समय में प्रचलित राष्ट्रवाद पर बात करते हुए उन्होंने कहा, “आज के समय में खान-पान, पहनावे तक को राष्ट्रवाद से जोड़कर देखा जाता है जो कि बहुत हास्यास्पद है। मेरी कोशिश रही है कि नौजवानों को राष्ट्रवाद की असली अवधारणा के प्रति आगाह किया जाय जिससे उन्हें राष्ट्रवाद को समझने में मदद मिले। आज के नौजवानों को देशभक्त बनने की जरूरत है न कि एक राष्ट्रवादी। आज के राष्ट्रवाद में विविधिता नहीं है। आज का राष्ट्रवाद संकीर्ण है जिसमें केवल अपनी ही बात होती है, इसमें दूसरों के लिए जगह ही नहीं है। मैं मानता हूँ कि देश की विविधिता ही असली राष्ट्रवाद है।”

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