भोपाल/ मध्यप्रदेश 09 जुलाई।भोपाल नौ दुर्गा मंदिर, निकट साहित्यकार पार्क में अखिल भारतीय कला मंदिर के भोपाल इकाई की पावस गोष्ठी “घन पाहुन आये” एवं साहित्यकार पार्क में वृक्षारोपण कार्यक्रम का आयोजन किया गया।
इस गोष्ठी की अध्यक्षता डॉ. गौरीशंकर शर्मा ‘गौरीश’ ने की, मुख्य अतिथि के रूप में वरिष्ठ साहित्यकार चिंतक मनोज श्रीवास्तव भा. प्र.से. एवं विशिष्ट अतिथि के रूप में शिक्षविद डॉ. राजेश तिवारी उपस्थित रहे।
इस कार्यक्रम में भोपाल के वरिष्ठ कविगण हरि वल्लभ शर्मा ‘हरि’ पंडित कमल किशोर दुबे, डॉ. गिरिजेश सक्सेना, महेश सक्सेना, चरणजीत सिंह कुकरेजा, सविता बांगड़, शिवांश सरल, श्रीराम माहेश्वरी, डॉ. अर्जुन दास खत्री, नीता सक्सेना, सुषमा श्रीवास्तव, सुधा दुबे, सुनील दुबे,रोशनी जैन, प्रेम चन्द गुप्त, सुरेश पबरा ‘आकाश’,गोकुल सोनी, अशोक धमेनिया, डॉ. संजय सक्सेना, देवेश देव, सीमा हरि शर्मा, डॉ. राजेश तिवारी ने काव्य पाठ किया।
कार्यक्रम के आरम्भ में गौरीशंकर शर्मा ‘गौरीश’ जी ने साहित्यकार उद्यान के लिए कला मन्दिर द्वारा किये जा रहे प्रयासों पर प्रकाश डाला तथा उद्यान को भव्य रूप देने की योजना के बारे में बताया।
विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित रघुनन्दन शर्मा पूर्व सांसद ने कला मंदिर के प्रयासों की सराहना की और अपनी उपस्थिति में वृक्षारोपण का कार्यक्रम सम्पन्न कराया।
इस अवसर पर नगर निगम की ओर से वार्ड प्रतिनिधि बृजुला सचान जी की उपस्थिति रही, उनका भी स्वागत किया।
सभी अतिथियों का स्वागत हार अंगवस्त्रम बैज और तुलसी का पौधा देकर किया गया। वृक्षमित्र सुनील दुबे का सराहनीय सहयोग रहा।
काव्य गोष्ठी का आरम्भ सुषमा श्रीवास्तव द्वारा प्रस्तुत सरस्वती वन्दना से हुआ। पश्चात उपस्थित समस्त कवियों ने अपनी प्रतिनिधि रचनाओं का पाठ किया। सविता बांगड़ ने “घन पाहुन आए हमारे अंगना। संग पावस लाए हमारे अंगना।” शिवांश सरल ने “गए के बस आषाढ़ के आया सावन मास”। राम माहेश्वरी ने “विकास के मुखौटे पर विनाश का समीकरण”। अर्जुन दास खत्री ने ” जल तांडव शीर्षक कविता पढ़ी। नीता सक्सेना ने ”सावन की बूंदें लिखती जब प्रीति की इक परिभाषा”। सुषमा श्रीवास्तव ने “नही होंगे पेड़ पौधे तो हरियाली कहाँ से लायेंगे”। पंडित कमल किशोर दुबे ने घुमड़-घुमड़ कर घिरी घटाएं तन मन मुस्काए है”। डॉ. गिरिजेश सक्सेना ने “मैं कागज अदना सा हवा में तिनके सा उड़ता”। सुधा दुबे ने “कल रात एक नन्हा पौधा फूट-फूट कर रोया”। चरनजीत सिंह कुकरेजा जी ने “भींगने के भय से बंधु रुकना ना अधबीच”। रोशनी जैन ने ” कभी मिलोगे कहीं ये खयाल आज भी है'”। प्रेम चन्द गुप्ता ने “दुंदुभी नभ ने बजाई मेघ आए”। सुरेश पबरा आकाश ने “आज बहुत ही जम कर टपके कलुआ का घर बारिश में”। गोकुल सोनी ने “पिये पसीना सोना उगले धरती माँ गुड़ धानी दे”। अशोक धमेनिया जी ने “हरी-हरी घास पर, मखमली बिछात पर एक बूंद आ गिरी”। डॉ संजय सक्सेना ने “जब भी छाती हैं घटाएँ काली मुझे तेरी ही याद आती है”। हरिवल्लभ शर्मा जी ने “तान वितान ढके नभ को घनघोर घटा घिरती अंधियारी”। देवेश देव ने “उपर वाले अबकी कर दे तूँ खुशियों की बरसातें”। सीमा हरि शर्मा ने “याद रक्खे ये जमाना वो कहानी चाहिए”। डॉ. राजेश तिवारी ने “गड़-गड़ गरज-गरज घन चम-चम चमक बिजुरिया के संग” का पाठ किया। अध्यक्षता कर रहे डॉ गौरीशंकर शर्मा ‘गौरीश’ जी ने पावस पर आयोजित इस ग़ोष्ठी में रचनाकारों की रचनाओं पर अपने विचार सहित अध्यक्षीय उद्बोधन दिया। और वृक्षारोपण का महत्व बताया।
कार्यक्रम के अंत में हरिवल्लभ शर्मा जी ने गोष्ठी की अभूतपूर्व सफलता के लिए सभी अतिथियों और आगंतुक रचनाकारों का आभार व्यक्त किया।


