
RKTV NEWS/पटना(बिहार)26 अक्टूबर।लेखक-पत्रकार नेहा दीक्षित की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चित किताब ‘कोई एक सईदा’ पर अशोक राजपथ स्थित राजकमल प्रकाशन कार्यालय में सोमवार शाम बातचीत हुई। लेखक-पत्रकार पुष्यमित्र के साथ बातचीत के दौरान नेहा दीक्षित ने कहा, मैं लगातार महिलाओं के अलग अलग मुद्दे को रिपोर्ट कर रही थी। मगर उससे कोई बात बन नहीं रही थी। जब मैं सईदा से मिली तो मुझे लगा कि यह कहानी ऐसी है, जिसमें कई मुद्दे एक साथ आते हैं। महिला कामगार है, पीस रेट वर्कर है, सांप्रदायिकता की शिकार है। एक ऐसी महिला है जो रोज 12 घंटे काम कर रही है, मगर खुद को मजदूर ही नहीं समझती।
उन्होंने आगे कहा, सईदा ने अपने जीवन में 50 से अधिक तरह के काम किए, मगर उन कामों से कभी उनके जीवन में इतने पैसे नहीं आ सके कि वह अपने बेसिक खर्च के संघर्ष से बाहर आ सके। सईदा और उसके परिवार ने दिल्ली की एक झुग्गी बस्ती में रहते हुए, रोजगार और मजदूरी का संकट तो झेला ही, सांप्रदायिकता का भी शिकार हुई। मगर अपने जीवन में एक बार वह हड़ताल में शामिल हुई और उस हड़ताल ने उन्होंने और उनके साथियों ने अपना हक हासिल किया। मगर पीस रेट वर्करों की यह हड़ताल मीडिया की नजर में आ न सकी।
सईदा की अगली पीढ़ी रेशमा की कहानी एक अलग स्तर का शोषण है। वह अपना जीवन बेहतर करने के लिए एक मॉल के वॉशरूम की सफाई की नौकरी कर लेती है। मगर वहां उसने आधुनिक किस्म के छुआछूत का सामना करना पड़ता है। वह उस वॉशरूम का इस्तेमाल नहीं कर सकती, लंच के लिए उसे छिपकर खाना होता है। उसे एक असहज जीवन जीना पड़ता है।
उन्होंने कहा, एक पत्रकार के लिए सवाल पूछने की क्षमता, तथ्यों की पड़ताल, लगातार सीखने की इच्छा और समाज के विभिन्न वर्गों के बीच जाकर वास्तविकताओं को समझना बेहद जरूरी है। पत्रकारिता को केवल एक नौकरी या करियर के रूप में देखने के बजाय समाज को समझने और सार्वजनिक हित के मुद्दों को सामने लाने का माध्यम होना चाहिए।
वहीं पुष्यमित्र ने बातचीत के दौरान कहा, यह एक महिला पीस रेट वर्कर के जीवन की महागाथा है। उसके संघर्ष को उसका अल्पसंख्यक होना और बढ़ा देता है। यह किताब बताती है कि मजदूरी की कई ऐसी परतें हैं, जिससे हम अनजान हैं। अमूमन ऐसा माना जाता है कि घर में पुरुष कमाऊ सदस्य होते हैं, महिलाएं तो बस पॉकेट मनी के लिए काम करती हैं। जबकि इस किताब को पढ़कर समझ आता है कि महानगरी जीवन में अब महिलाएं ही कमाऊ हैं और उनकी कमाई से ही घर चलता। पुरुष अब पार्टटाइम कमाऊ हो रहे हैं और गैरजिम्मेदार तरीके से वे अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा नशे में खर्च करते हैं। यह किताब आधुनिक जीवन संस्कृति में छिपे छुआछूत की भी उजागर करते है जो सईदा की बेटी की मॉल में नौकरी से जाहिर होता है।
नेहा दीक्षित की किताब ‘कोई एक सईदा’ मूल रूप से अंग्रेजी में Many Lives of Syeda X शीर्षक से प्रकाशित है जिसका हिन्दी अनुवाद सुपरिचित अनुवादक प्रभात सिंह ने किया है।
यह किताब सांप्रदायिक हिंसा और विस्थापन का दंश झेलकर दिल्ली आई एक प्रवासी महिला के तीन दशकों के कठिन जीवन-संघर्ष की मार्मिक गाथा है। अपनी आजीविका और गरिमा बचाने के लिए पचास से अधिक छोटे-बड़े श्रम-साध्य काम काम करने वाली इस महिला की कहानी के ज़रिए लेखक हाशिए की महिला श्रमिकों के आर्थिक शोषण, अदृश्य मेहनत और अदम्य साहस को सामने लाती है। साथ ही, यह किताब भारत के अनौपचारिक क्षेत्र में काम करने वाली करोड़ों महिलाओं की मेहनत और उनके अधिकारों के सवाल को उठाते हुए दिखाती है कि प्रवासी मज़दूरों की मेहनत पर टिके बड़े शहर किस तरह उन्हें सुरक्षा, सम्मान और बुनियादी अधिकार देने में विफल रहते हैं।
