जयंती पर आयोजित हुई ‘नाट्य-साहित्य में बिहार का योगदान’ विषय पर संगोष्ठी और लघुकथा-गोष्ठी।
RKTV NEWS/पटना(बिहार)09 सितम्बर। आधुनिक हिन्दी को, जिसे आरंभ में ‘खड़ी-बोली’ कहा गया, भारतेंदु ने ही अंगुली पकड़कर चलना सिखाया। इसीलिए आधुनिक हिन्दी साहित्य के इतिहास के आरंभिक-युग को ‘भारतेंदु-युग’ के रूप में स्मरण किया जाता है। भारतेंदु के नाटक ‘सत्य हरिश्चन्द्र’ और ‘अंधेर-नगरी’ सौ साल बाद भी प्रासंगिक बने हुए हैं। उनके काव्य और नाटक जन-मानस को झकझोरते और आंदोलित करते हैं।
यह बातें बुधवार को बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन में, हिन्दी-पखवारा और पुस्तक चौदस मेला के ९वें दिन आयोजित भारतेंदु जयंती और संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए, सम्मेलन अध्यक्ष डा अनिल सुलभ ने कही। उन्होंने कहा कि अद्भुत प्रतिभा के इस कवि ने मात्र ३५ वर्ष की अपनी कुल आयु में जो कमाल कर दिया वह हिन्दी साहित्य के इतिहास का स्वर्णिम अध्याय है।
इस अवसर पर ‘नाट्य-साहित्य में बिहार के योगदान’ पर आयोजित संगोष्ठी में मुख्य वक्ता के रूप में अपना विचार रखते हुए, सुप्रसिद्ध नाटक-कार और संस्कृति-कर्मी डा अशोक प्रियदर्शी ने कहा कि बिहार में नाट्य-साहित्य के प्रणेता थे केशव राम भट्ट। उन्होंने स्वयं अनेक नाटक लिखे और ‘पटना नाट्य मण्डली’ की स्थापना कर बिहार में एक बड़ा नाट्य-आंदोलन आरम्भ किया। नाट्य-साहित्य को आगे चलकर ऐतिहासिक नाटकों के महान नाटककार डा चतुर्भुज ने इस आंदोलन को शीर्ष तक पहुँचाया।
डा प्रियदर्शी ने कहा कि आरंभिक दिनों में बिहार में भी संस्कृत से अनूदित नाटकों के ही मंचन हुआ करते थे। आगे चलकर तीन प्रकार के मंच; ‘पारसी थियेटर’, रामलीला मण्डली’ और ‘कृष्णलीला मण्डली’ सामने आए। केशव राम भट्ट, डा चतुर्भुज, भिखारी ठाकुर, रामवृक्ष बेनीपुरी, आचार्य देवेंद्रनाथ शर्मा, ‘बिहार आर्ट थिएटर’ के संस्थापक अनिल कुमार मुखर्जी, प्रो रामेश्वर सिंह काश्यप’लोहा सिंह’, कमलेश्वर सिंह ‘अमलेश’, जानकी वल्लभ शास्त्री, आरसी प्रसाद सिंह, मोहनलाल महतो ‘वियोगी’, भगवान प्रसाद, बच्चन लाल, श्याम मोहन आदि नाटककारों, कलाकारों और विभिन्न नाट्य-संस्थाओं का आधुनिक नाट्य-जगत में अविस्मरणीय योगदान हैं।
मुंगेर से पधारे साहित्यकार मधुसूदन आत्मीय, वरिष्ठ साहित्यकार डा रत्नेश्वर सिंह, बिहार नाटक अकादमी के पूर्व उपाध्यक्ष कुमार अनुपम, डा प्रतिभा रानी तथा वरिष्ठ शिक्षिका एवं रंगकर्मी निर्मला सिंह ने भी अपने विचार व्यक्त किए।
इस अवसर पर आयोजित लघुकथा गोष्ठी में, डा पूनम आनंद ने ‘कड़ी’, विभा रानी श्रीवास्तव ने ‘कृती” , शमा कौसर ‘शमा’ ने ‘मुक़द्दर की शिकायत’, सिद्धेश्वर ने ‘घर का सुख’, चित्तरंजन भारती ने ‘किताबें’, ईं अशोक कुमार ने ‘हिमालय दरक रहा है’, तथा इन्दु भूषण सहाय ने ‘गवाह’ शीर्षक से अपनी लघुकथा का पाठ किया। मंच का संचालन ब्रह्मानन्द पाण्डेय ने तथा धन्यवाद-ज्ञापन चंदा मिश्र ने किया।
सुनील कुमार सिन्हा, राक कुमार चौबे, नागेंद्र प्रसाद राय, ममता कुमारी खत्री, डा चंद्रशेखर आज़ाद, ईशा कुमारी, नरेश कुमार, मुकेश कुमार, अनिमेष कुमार, अजय कुमार आदि प्रबुद्धजन उपस्थित थे।

