
आरा/भोजपुर ( डॉ दिनेश प्रसाद सिन्हा)22 जून।संगीत के स्वरों की साधना एक प्राचीन योग विधि है। षड्ज’ का अर्थ है छह जगहों से जन्म लेने वाला स्वर। यह स्वर नासिका, कंठ, उर , तालु जिह्वा और दाँत इन छहों स्थानों से उत्पन्न होता है। इसी प्रकार स्वर साधना से शरीर का संतुलन बना रहता है। भारतीय संगीत ही विश्व के सभी संगीत का आधार है। पूरे विश्व ने भारतीय शास्त्रीय संगीत की प्राचीनता को अपने स्तर से प्रमाणित किया है। उक्त बातें गुरु बक्शी विकास ने शिवादी क्लासिक सेंटर ऑफ आर्ट एंड म्युजिक द्वारा आयोजित विश्व संगीत दिवस का उद्घाटन करते हुए कहा। इस अवसर पर श्रेया पांडे व अंजीत पांडेय ने युगल शास्त्रीय गायन में राग योग में तीन ताल की बंदिश “प्रीत की डोर में हम तुम संग पिया” व ठुमरी दादरा प्रस्तुत कर दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। वही युवा गायिका आरोही ने ठुमरी “सैयां रूठ गयें मैं मनाती रही” व दादरा “रसीले भर दे मोरी गगरी” प्रस्तुत कर तालियां बटोरी। शास्त्रीय गायक श्री महेश यादव ने बड़ा ख्याल व छोटा ख्याल प्रस्तुत कर समां बाँधा। इस अवसर पर विदुषी बिमला देवी ने अपने घराने की अति प्राचीन बंदिश, ठुमरी व दादरा की प्रस्तुति से वाहवाही लूटी। मंच संचालन गुरु बक्शी विकास व धन्यवाद ज्ञापन पिंटू यादव ने किया।
