
आरा/भोजपुर (डॉ दिनेश प्रसाद सिन्हा)22 मई।उच्च शिक्षा निदेशक श्री अग्रवाल के हालिया बयान पर शिक्षकों एवं कर्मचारियों की तीखी प्रतिक्रिया सामने आई है। शिक्षकों का कहना है कि हर वर्ष वेतन और पेंशन भुगतान में देरी को “प्रशासनिक समस्या” बताकर टाल दिया जाता है, जबकि इसकी मार सीधे शिक्षक, कर्मचारी और पेंशनर झेलते हैं।
प्रो. चन्द्र शेखर वर्मा ने जारी प्रतिक्रिया पत्र में कहा कि विश्वविद्यालयों में उपयोगिता प्रमाणपत्र, लंबित फाइलें और प्रशासनिक ढिलाई जैसी समस्याओं के लिए शिक्षक जिम्मेदार नहीं हैं, फिर भी सबसे पहले उनका वेतन और पेंशन रोका जाता है जो अन्यायपूर्ण और अमानवीय व्यवस्था है।उन्होंने कहा कि मार्च–अप्रैल आते ही पूर्ण वेतन और पेंशन रोक देना अब एक नियमित प्रक्रिया बन चुकी है। जबकि वर्तमान समय में AI, ऑटोमेशन और आधुनिक डिजिटल तकनीकों के माध्यम से “Zero Delay” व्यवस्था लागू करना पूरी तरह संभव है। आवश्यकता केवल प्रशासनिक इच्छाशक्ति और पारदर्शी व्यवस्था की है। प्रो. वर्मा ने कहा कि प्रशासनिक ढांचे को तकनीक आधारित, सरल और परिणामोन्मुखी बनाया जाना चाहिए, ताकि भ्रष्टाचार, अपव्यय और अनावश्यक देरी पर रोक लग सके। उन्होंने जोर देकर कहा कि शिक्षक कोई बोझ नहीं, बल्कि राष्ट्र की बौद्धिक शक्ति हैं। उच्च शिक्षा ही वह माध्यम है जो शोध, तकनीकी विकास और आत्मनिर्भर भारत की आधारशिला तैयार करती है। एक ओर फिजूलखर्ची पर भारी खर्च होता है, वहीं दूसरी ओर शिक्षकों का वेतन और पेंशन लंबित रखा जाता है जो राष्ट्र निर्माण की नींव को कमजोर करने वाला कदम” बताया।
डा वर्मा ने कहा कि जो राष्ट्र अपने शिक्षकों को असुरक्षित बनाता है, वह अपने भविष्य को असुरक्षित बनाता है।”यह केवल एक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि शिक्षकों और कर्मचारियों की पीड़ा है, जो अब चुप रहने को तैयार नहीं।
