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कलम रुक गई…..पर अल्फ़ाज़ मन में चल रहे थे : अनायास

RKTV NEWS/आरा (भोजपुर)05 मई। नाटकों और कहानियों के संग्रह “अनायास” की पहली रचना एक लघु नाटक “गुलसिताँ” से शुरू होती है।”गुलसिताँ” में लेखक ने अपने शब्दों को मार्मिकता की स्याही से बदहाल स्वास्थ्य व्यवस्था में धरती के भगवान की अहम भूमिका , गरीबों की वेदना,रोजगार हेतु परिवार से दूर पलायन की मजबूरी के साथ साथ सखी की वास्तविक परिभाषा एवं सामाजिक भाई चारे को सजीव रूप में मानसिक पटल पर दृश्यांकित किया है।

गुलसिताँ (लघु नाटक)

दृश्य:जनाना अस्पताल, बच्चा विभाग

नेपथ्य से :-

सारे जहाँ से अच्छा, हिन्दोस्ताँ हमारा, हम बुलबुले हैं इसकी, ये गुलसिताँ हमारा ।

पृष्ठ-भूमि का नेपथ्य से अवलोकन :

होगा अच्छा, जब सुखेन एवं चरक जैसे वैद्य होगे और मिल जाती होगी संजीवनी बूटी । पर आजकल काला ज्वर, पोलियो, कुपोषण आदि-आदि कितने खौफनाक बन बैठे हैं और सुविधाओं पर केचुल मारे आजके सुखेन ।

।। परदा खुलता है ।।

(तभी कमला मुन्ने को गोद में लिए हाजिर होती है ।)

कमला-(मुन्ने को चुप कराते हुए) चुप रहो मेरे लाल (मुन्ना रोता है)(कमला बेदना भरे स्वर में बुदबुदाती है।) मालूम नहीं और कितनी देर होगी ।

(तभी नर्स का प्रवेश)

(वह अपने टेबुल के पास गयी, फिर उसका दराज खोला, थर्मामीटर एवं इन्जेकशन की सिरिंज को निकाला एवं साफ किया तथा स्पिरीट की बोतल को बाहर किया ।(इसी बीच चार-पाँच महिलायें अस्पताल में बच्चों को लिए आ जाती है)

नर्स :(कमला से) क्या हुआ है बच्चे को ?

कमला-देखिये न दीदी, इसे चार रोज से ज्वर और पतला दस्त है जो रुकने का नाम ही नहीं लेता ।

नर्स -क्या जीवन रक्षक घोल नहीं पिलाती है ?

कमला-पिलायी पर फिर भी……

(इसी बीच डा० आशा का प्रवेश)

नर्स -नमस्ते डाक्टरनी जी ।

डा०-नमस्ते । कहो कैसी हो अर्चना ?

नर्स: ठीक हूँ।

डा०-अच्छा अर्चना, अखबारों में तो वैशाली की तरफ कालाजार के भयंकर फैलाव और प्रकोप की खबरें छप रही हैं। लगता है रमना की हवा उसे आरा आने से रोके हुए है।

नर्स:यहाँ तक फैले, ऐसा नेक इरादा पालने का कारण ?

डा०-(बातों को ताड़ते हुए) अपने पेशा के कौशल का परिचय देने का अवसर जो होगा । अच्छा छोड़ो इन बातों को। कल ड्रग रिसर्च का एजेन्ट आया था, बिटामिनों की दस फाइल और सूइयों का पाँच पैकेट दे गया था, वे सभी यहीं हैं न ?

नर्स -कौन पेन्टामिडिन वाली ?

डा०-हाँ, हाँ, आजकल दुर्लभ तो यही दवाएँ हो गयी हैं। ऐसा करो उन सभी को मेरे निजी चिकित्सा केन्द्र में पहुँचाने के लिए ब्रीफकेस में रख दो। और हाँ, शाम में केन्द्र पर जाकर कम्पाउण्डर नीरज से मिल लेना, तुम्हारे लिए एच. एम. टी. की कलाई घड़ी रखी हुई है।

नर्स -क्या करूँगी घड़ी लेकर ?

डा०: क्यों उस दिन बोल रही थी न कि छोटे भाई मनोज के जन्म दिन पर उपहार देना है। भूल गयी क्या ?

नर्स -(सोचती है नीरज की हरकते भी कोई कम थोड़े रहती है, वो भी शाम में केन्द्र पर जाना। शर्म से आँखें झुका लेती है, पर परिस्थिति से समझौता करते हुए, ब्रीफकेस में दवाएँ रख देती है ।) आज शाम अन्य काम में व्यस्त रहूँगी शायद केन्द्र पर नहीं जा सकूँगी। (इधर अस्पताल में आयी अन्य सभी महिलाएं इन लोगों की समय काटु एवं बीमारी में व्यापार को मिलाने की बातों से खड़ी-खड़ी उबते जा रही थीं।) (एक ने टोका) और कितनी देर होगी ?

डा०-(भीड़ पर नियंत्रण हेतु) आप सभी कतार में लग जाएं।

कमला-आठ रोज से ज्वर, पतला दस्त और रूक-रूक कर अकड़न हो जाया करती है।

डा०-(बच्चे की नब्ज टटोलकर, पुर्जे पर दवा लिख देती है एवं नर्स की तरफ बढ़ाते हुए) समझा देना, परहेज में दाल-रोटी एवं बैगन नहीं खाना है।

नर्स -(कमला से) दवा दुकान से खरीद लेना। ऊपर की दवा दिन में तीन बार दो-दो चम्मच, बीच की गोली का आधा टुकड़ा खाने के पहले एवं रोजाना सूई पाँच दिनो तक ।
(बारी-बारी से सभी महिलायें अपने-अपने बच्चों को डा॰ से दिखाती है। कमला दवा खरीदने जाती है। इसी बीच वार्ड ब्याय दौड़ता हुआ आता है। पीछे-पीछे नजमा भी हाँफते हुए आती है और डा० से ……)

नजमा-डाक्टर साहिबा, जल्दी कीजिए बेड नं० ६ पर अजीज का सलाइन वाटर रुक गया है, उसका सारा शरीर फूल गया है तथा साँस भी रुकने के जैसा लग रहा है। (डा०, नर्स और सभी जल्दी-जल्दी वार्ड पहुँचते हैं। झट सलाइन हटाकर ऑक्सीजन सुँघाया जाने लगा। पाँच मिनट बाद अजीज ने आँखे खोली, फिर निंद्रा की बूँदें दी गयीं, स्थिति पर काबू पा लेने के बाद डा०-नर्स फिर अस्पताल के आउटडोर में आकर बैठ जाती हैं। इधर कमला दवा की दुकान पर पहुँचती है जहाँ सेल्समैन मालती बैठी है ।)

कमला -(सेल्स मैन को दवा का पुर्जा बढ़ाते हुए) ये दवाये तो दीजियेगा।

सेल्समेन -(दवा निकालते हुए) यह सूई तो आजकल नहीं मिल रही है। बाकी के दाम ८५ रु. ६५ पैसे ।

कमला- लेकिन सूई तो जरूरी है, कहाँ से मिल सकेगी ?

सेल्समैन – डाक्टर से मिलकर इसके बदले दूसरी दवा पूछ लीजिएगा । (कमला डाक्टर के पास दुबारा जाती है)

कमला- डाक्टर साहिबा, यह सूई तो नहीं मिल रही है। (तभी नर्स बीच में टपक पड़ती है)

नर्स-देखो तुम दो पहर डाक्टर के निजी चिकित्सा केन्द्र पर जाकर अच्छी सलाह क्यों नहीं ले लेती। क्यों मुफ्त के फेरे में बच्चे की जान ले रही हो ?

कमला-सरकारी अस्पताल और निजी चिकित्सा केन्द्र में सलाह के तरीके भी अलग-अलग होते हैं क्या ?

नर्स -क्यों चीनी अधिक डालने पर मिठास ज्यादा नहीं होती क्या? लगता है पहली बार बीमारी के विषय में अनुभव है तुम्हारा । (इसी बीच डाक्टर चली जाती है)

कमला-हाँ, मुन्ने के पिता, एक हफ्ता हुआ फरीदकोट गये हैं, लौटे नहीं अन्यथा (इस बीच कमला मुन्ने को दवा की गोली एवं पीने वाली दवा देती है, पर बीमारी में कोई कमी नजर नहीं आती है)

।। डा० आशा का निजी चिकित्सा केन्द्र ।।

(कमला दोपहर डा० आशा के निजी चिकित्सा केन्द्र पर मुन्ने को लिए पहुँचती है ।)

कमला-डाक्टर साहिबा, मुन्ना की हालत में कोई सुधार नहीं हो रहा है आप अच्छी तरह देख तो लीजिए कोई बढ़िया दवा दे दीजिए

डा०घबड़ाओ नहीं। (इस बार डा० भली-भाँति देखती है, नाड़ी देखी, आँखों की पुतली देखी, थर्मामीटर से बुखार मापा, स्टेथोस्कोप से साँस की घरघराहट देखी फिर नये पुर्जे पर दवा लिखते हुए।) मुन्ना ठीक हो जायेगा। फीस के नगद ५० रु. हुए। दवा सरोज ड्रग हाउस से ले लेना ।

कमला-(फीस के १०-१० के पाँच नोट देती है। फिर केन्द्र से सटे सरोज ड्रग हाउस जाती है और पुर्जा बढ़ाते हुए सेल्स मैन रूपा से कहती है) ये दवायें तो दीजिएगा ।

सेल्स मैन-देखो ठीक दवा प्रति सूई ७२ रु. लगेगा कुल ५ के ३६० रु होंगे।

कमला: ठीक दवा, यह क्या ? मुझे तौ बीमारी ठीक होने की दवा चाहिए।

सेल्समैन-बीमारी ठीक होने में डाक्टर एवं दवा दोनों का ठीक होना जरूरी होता है। दोनों के ठीक होने की जगह भी खास-खास होती हैं। जैसे डा० के लिए उनका निजी चिकित्सा केन्द्र वैसे दवा के लिए उनकी प्रिय दुकान । अब समझ गयी होगी ।

कमला-समझी, पर हाय! इतना रुपया कहाँ से पाँऊ। हे भगवान ! अब मुन्ने का क्या होगा। मुन्ने के पिता के पास फरीदकोट तार भेजना ही पड़ेगा। (मुन्ना जोर-जोर से रोने लगता है) (सेल्समैन से) देखो मेरे पास कुल ३५० रु० थे जिनमें से अब शेष २१४ रू० ही पास हैं। तुम दवा दे दो। मुन्ने की जान बचा दो, बाद बाकी पैसे सूद समेत पहुँचा दूँगी ।

सेल्समैन: चल हट, इस तरह खैरात का व्यापार करूँ तो आज ही खटिया खड़ी हो जाय। जानती नहीं; पूरा नफा का आधा तो डा० आशा के पास चला जाता है, जहाँ से दवा ब्रीफकेस में भर-भर कर रात के अंधरे में अस्पताल से ड्रग हाउस आती है। ऐसा करो, मैं तीन सूइयाँ तब तक दिये देता हूँ। (एक रु पैसठ पैसे बाकी रह जाते हैं। जब रु. का प्रबंध हो जाय बाकी दवा ले जाना ।

कमला-चलते-चलते सोचती है, तार तो भेजना ठीक होगा, पर पैसे कहाँ ? तभी याद आयी। बिसुन काका तो इसी रमना के कोने वाले डाकघर में तारबाबू हैं, उन्हीं से सारा हाल कहूँगी। (आरा कचहरी डाकघर की तार खिड़की पर पहुँचकर उदास चेहरा किये खड़ी होती है)

विसुन काका-क्यों बेटी, क्या बात है ? बोलो किस तरह मैं तुम्हारी सेवा कर सकता हूँ ?

कमला-काका, कष्टो को कहने का साहस तो बटोर पा रही हूँ, पर निराकरण के सूत्र जिसमें आपकी मदद की जरूरत है, जुवान से बाहर नहीं हो पाते ।

विसुन काका-और थोड़ा साहस बटोरो, कहो, समझ लो मेरी तरफ से उत्तर में ना नहीं सुन पाओगी ।

कमला-मुन्ने की तबीयत खराब है, इसके पिता जी फरीदकोट हैं। पैसे का भी अभाव है। उन्हीं के पास तार करना चाहती हूँ।

विसुन काका-(पहले अपनी जेब टटोली, देखा तार के फीस से अधिक पैसे उनके पास थे।) इस तार के फार्म को भर दो, घबड़ाओ नहीं इसे प्राथमिकता श्रेणी का तार बनाकर अभी भेज देता हूँ।

।। कमला का घर ।।

(कमला घर पहुँच जाती है। मुन्ना की बीमारी एक-दो दिन सुधरने के बाद फिर बिगड़ती दिखने लगी। कमला हर रोज रेल की सीटी पर, पति के आने के इंतजार में आँखों की नींद आँसुओं में बदलते हुए गुजार देती है। तभी सईदा (कमला की सहेली का प्रवेश)

सईदा -नमस्ते कमला। कहो कैसी हो ? पाँच माह गुजर गये, कभी तूने आने का नाम तक नहीं लिया। तू तो मेरे यहाँ का रास्ता भी भूल गयी होगी ?

कमला -नमस्ते बहन। क्या कहूँ सईदा, जब से घर-गृहस्थी संभाला मँहगाई ने कमर तोड़ काम करने के बाद भी चैन से दिन बीतने ही कहाँ दिया। देखो न, मुन्ना की तबीयत दिनोंदिन बिगड़ती जा रही है। इसके पिता फरीदकोट से अभी आये तक नहीं। बिसुन काका से तार भी भेजवाया, अबतक मिल ही गया होगा। अब तो संदेह होता है वहाँ की स्थिति पर भी। मेरे पास अब दवा खरीदने के लिए कुछ भी शेष नहीं रहा । मालूम नहीं पड़ता अब क्या करूँ । सच सईदा मुन्ने को कुछ होने के पहले भगवान मेरी ही जान ले लेते तो ठीक था । (इतना कहते-कहते कमला सुबकने लगी ।)

सईदा-(कमला के मुँह पर हाथ रखते हुए) अल्लाह न करें, कमला, ऐसा भी हो। वह तो परवर दिगार हैं, सब की भला करता है। तुम घबड़ाओ नहीं। ये देखो मेरे निकाह पर याकूब की दी हुई अगूंठी पास है, इसको अभी बन्धक रखकर दवा का इन्तजाम किये देती हूँ।

कमला-नहीं सईदा, नहीं। ऐसा न करो। यह तुम्हारे और याकूब के प्रेम की धरोहर है। इसको मेरे प्रेम मे न बाँटो ।

सईदा-कमला ! क्या मुन्ना केवल तुम्हारा है। वह जब बड़ा होगा, मुल्क का खिदमतगार होगा, जिसमें तुम होगी, तुम्हारे प्रकाश होंगे, मैं हूँगी, याकूब होंगे और होगी सारी दुनिया (सईदा बाद में हाफिज इब्राहिम की दुकान पर जाती है)

सईदा- हाफिज भाई, हाफिज भाई, एक बहुत जरूरी काम है।

हाफिज – चाँद का टुकड़ा एक लम्बे अरसे बाद मुखातीब होने को हाजिर हो, इसे तो मैं खुद का किस्मत मानता हूँ। ऐसे में एक क्या हजार जरूरी बातें भी कम होगी। यूँ भी जरूरी काम के लिए तूने दिन का समय क्यों चुना। फिर भी कुछ कहो तो सहीं। क्या याकूब भाई घर पर नहीं हैं?

सईदा-हाफिज भाई, कभी भी तो गंभीर रहो ।

हाफिज – काम की बात भी कहोगी या आयतें ही सुनाओगी। बोलो तो सही।

सईदा-मेरी एक सहेली कमला है, उसका बच्चा बीमार है। उसके पति फरीदकोट गये हैं। दूसरा उसका कोई सहारा नहीं है। पैसे के अभाव में इलाज रुक गया है।यह अंगूठी तुम्हारे पास बंधक रखे देती हूं।इस कीमत के बराबर पैसे दे दो ताकि उसकी दवा का इंतजाम हो सके।

हाफिज क्या अगूठी निकालने में भी कुछ मदद कर सकता हूँ ?

सईदा : (मुस्कुराकर) देर न करो भाई।

हाफिज : (रुपया देते हुए) ले जाओ, दवा कराओ, देखना राम-रहीम की गाँठ ढीली नहीं रहने पाये ।

सईदा-(दवा लाकर मुन्ने को देती है। देखते-देखते मुन्ना भला-चंगा हो जाता है।) बहन घबड़ाना नहीं चाहिए। ऐसे मौके पर तुम्हारे दुःखों में सहभागी बन सकी और अल्लाह ने हमारी मिन्नतें सुन ली, इसीको मैं अपनी खुश किस्मती मानती हूँ।

कमला- (बहुत खुश होती है। बहन, तुम्हारे इस आभार से मैं दबी जा रही हूँ। इसकी वापसी शायद कभीकर पाऊँ। (इसके आगे कुछ भी बोल नहीं पायी, क्योंकि वे सारे दृश्य- (दवा के पैकेट का अस्पताल से ड्रग हाउस जाना, डा० आशा की फीस के अनुसार भेदपूर्ण सलाह, ठीक दवा बिक्री का रहस्य, नर्स की दलाली, बिसुन काका की सहानुभूति, सईदा का निश्छल प्रेम, हाफिज भाई की राम-रहीम गाँठ ढीली न पड़ने देने की चेतावनी, उसके मानस पटल पर एक साथ नाच जाते हैं और कहती है) धरती फटने में और कितनी देर लगेगी, गरीबों को इन दगाबाजों से कब छुट्टी मिलेगी । काश ! यह सभी जान पाते “आदमी के पास क्या है, यह उतने महत्व की चीज नहीं है जितना यह कि आदमी क्या है और कैसा है” तभी यह गुलसिताँ खिला रह सकता है

(परदा गिरता है)
नेपथ्य से-

गरीबों तेरी आह, यो ही न जायेगी
तेरी ही आग से, ये दुनिया खाक हो जायेगी ।

डॉ कृष्ण दयाल सिंह
( लेखक वर्तमान में आरा के वरिष्ठपुरी में निवास करते है,संपर्क:9570805395)

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