
आरा/भोजपुर (डॉ दिनेश प्रसाद सिन्हा)23 अप्रैल।वर्तमान दौर में जहां सोशल मीडिया पर तारीफ़ और सराहना की भरमार है, वहीं विशेषज्ञ और सामाजिक चिंतक इस बात पर जोर दे रहे हैं कि “तारीफ़” और “हक़ीक़त” के बीच फर्क समझना बेहद जरूरी है। सिल्की रंजन ने बताया की तारीफ़ सुनना हर किसी को अच्छा लगता है। यह आत्मविश्वास बढ़ाती है और व्यक्ति को प्रेरित करती है। लेकिन कई बार यह सिर्फ दिखावे या स्वार्थ से प्रेरित भी हो सकती है। ऐसे में बिना जांचे-परखे तारीफ़ पर भरोसा करना व्यक्ति को वास्तविकता से दूर कर सकता है।
इन्होंने बताया कि हक़ीक़त अक्सर तारीफ़ से अलग होती है। जहां तारीफ़ में सब कुछ बेहतर और परफेक्ट दिखता है, वहीं असल जीवन में संघर्ष, कमियां और चुनौतियां भी होती हैं। यही सच्चाई व्यक्ति को मजबूत बनाती है और आगे बढ़ने का रास्ता दिखाती है।अगर व्यक्ति केवल तारीफ़ पर निर्भर रहने लगे, तो वह अपनी कमजोरियों को नजरअंदाज कर देता है। इसके विपरीत, जो लोग अपनी वास्तविक स्थिति को समझते हैं, वे खुद को बेहतर बनाने में सफल होते हैं।समाज के जानकारों का कहना है कि संतुलन ही सबसे जरूरी है—तारीफ़ सुनें, लेकिन हक़ीक़त को नजरअंदाज न करें। क्योंकि असली विकास तभी संभव है, जब व्यक्ति अपनी कमियों को पहचानकर उन्हें सुधारने की दिशा में काम करे।तारीफ़ आपको ऊपर उठा सकती है, लेकिन हक़ीक़त ही आपको मजबूत बनाती है।
