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मतदाता के दृष्टि में !

फोटो सौ: सोशल मीडिया

मतदाता के दृष्टि में!

देख भीड़ मेले का, बोली माँ से, मेरा जी घबड़ाता है;
तरह-तरह के बहुरूपियों को देख, मेरा जी घबड़ाता है।
असली चेहरा किसका है, है मुझको नहीं बुझाता; सभी मुखौटे नकली लगते, समझ नहीं कुछ भी है आता।
और न जाने कितने-कितने, मरण सेज से उठ आये हैं ऊपर; तैयार खड़े है रूप बनाकर, घोर बिरह हो जायेगी, यदि सती बनु मैं उनपर ।
कलमुँहे मरते भी नहीं, क्यों मेरे ऊपर ही मरते हैं, रंगे सियार बन-बनकर, नाहक हीं स्वयंवर में बिचरते है।
हत्यारे, व्याभिचारी, खजाना चोर, पक्षपाती, वंशवादी, सत्ता लोलुप में;
हर तरह के अपराधी को छुपाये हुए है, आस्तिन के अंदर किस लोलुप से।
ये कैसा कुहराम मचा है, कोई तोप है लेकर आया; रथ से रौंद रहा कोई है, है कोई रथ को रोक रहा।
कोई आरक्षण का अस्त्र छोड़ता । मजदूरी का कोई तीर साधता; कोई कहीं से भाग रहा है, कोई चुपचाप है घात लगाता ।
लगता पंचाली बनना होगा, सबका भार भी सहना होगा; चौखट पर पादुका रख छोड़े तो, बारी-बारी से सबको ही खुश करना होगा।
माँ यह कैसा स्वयंवर है, मंडप के बाहर ही, सब रास्ता रोक खड़े हैं; सबको निराशा है, हताशा है, माला को छोड़, अब पंखुड़िया तोड़ने में लगे हैं।
मुझे चाहिए सर्वांगसुन्दर, दिव्य छटा जिसके ऊपर हो; जो मंडप में जूते चप्पल फेंका न करे, नहीं प्रस्ताव पत्र को फाड़े, नहीं विवेक के मटके पर साधे तीर
दल-बदलू के दल-दल में हो कहाँ छीपे, न हाथ सुझे, न फूल दिखे, लाल चदरिया दरका निकले; हरा बिस्तर दिखे चौपड़ सा, अब हम सफर कैसे निकले।
लूटेरे ! रास्ता छोड़ दो, चोरी का मुखौटा छोड़ दो; जनक नन्दनी से पंचाली तक बनाये, अब संयुक्ता बनाना छोड़ दो।
तुम्हारे करनी का श्वेत पत्र खोल दू तो, तेरी चमक चली जायेगी, फैले हुए फन तेरा कुंठित हो जायेगा, मंडप के बाहर ही मुर्डीत हो जायगे, बदनाम है चेहरा तेरा, कहो कभी न आवोगे ।
माँ समझायी, पगली तू सब, नाहक ही क्यों डरती हो, मन भागो को चुन चुन रखना, मेले से क्यों डरती हो।
जो है तुम्हें रिझाते, उनके हाव भाव को समझो पहले; अच्छों को तुम संग में रखना, चलो चाल नहले पर दहले।
पागल, गवार, लूटेरा, व्यभिचारी को छोड़ो, खूनी, घोटाले बाज, डंडी मार, नकलची तक को छोड़ो,
असली, युवा, दक्ष, रक्षक को खोजो, फिर उससे ही नाता जोड़ो; जय माला पहनाओ उसको, फेरा, जाति और मजहब का छोड़ो।
फिर तो सेज बिछेगा अमनचैन का, और फल विकास का खाना, दुख-दरिद्र भागेगा घर से, शांति का श्रृंगार रचाना।
रचनाकार: डॉ कृष्ण दयाल सिंह

(उक्त कविता ख्यातिप्राप्त लेखक,कवि,व्यंग्यकार,समीक्षक, अनुवादक “डॉ कृष्ण दयाल सिंह”जो एक अवकाश प्राप्त डाक सेवा अधिकारी भी है, उनके साहित्य काल के शुरूआती दौर में 09 फरवरी 1998 को प्रकाशित की गई कविता संग्रह पुस्तक “यत्र-तत्र”से ली गई है और यह कवि की उक्त संग्रह की सोलहवीं रचना है। RKTV NEWS नित्य इनके संग्रहित पुस्तक से क्रमवार एक एक रचना प्रकाशित करेगी। इनकी कई रचनाएं विभिन्न पत्र पत्रिकाओं और समाचार पत्रों में प्रकाशित होती रहती है साथ ही इनके दर्जनों पुस्तक भी प्रकाशित हो चुके है, वर्तमान में बिहार राज्य के भोजपुर जिला अंतर्गत आरा के वशिष्ठपुरी में निवास करते है। सुझाव और संपर्क हेतु: 9570805395)

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