
चुनावी स्वयंवर!
कोटि-कोटि बहनों का एक पति हो, हुआ इश्तहार अब जारी; दुल्हे ने भी शर्त रखी, एक ऐसी, हो गयी हलचल भारी।
मैं पाँच साला पति बनूँगा। जब तुम पर रीझेंगे दरबारी; हम सबने भी हामी भर दी, फिर शुरू हुई तैयारी ।
लगी सोचने भाग्य को अपने, देखें कैसे मिलते हैं दरबारी; ठिठक गयी थी, दरबारी के मेला देखकर, अद्भुत रूप निहारी ।
एक खड़ा था इंतजार में मेरे, लेकर दो बैलों की जोड़ी; बरगद गाछ एक धुनी रमाये, था उचक रहा वह थोड़ा-थोड़ी।
एक इशारा कर बुलवाता, यही झोपड़ी तेरी-मेरी; दीपक लेकर एक खोजता, कहता बन जाओ तू मेरी।
एक काटता था खेतों में, हसुआ से गेहूँ की बाली; कहता तुम्हें सुलाउँगा बिखराकर, बस चादर जो लाली लाली ।
समझ नहीं कुछ आता था, भीड़ भरे उस मेले में; आन फँसी क्यों हाय भवर में, पूरे पाँच सौ चालीस के मेले में।
सभी रिझाते पहले मुझको, कहते बाद रिझाना हमको; दो बैलों के साथ में भागी, छोड़-छाड़ कर सबको ।
दरबारी खुश हुए तो मेरी, मँगनी कर दी धोती से; सीधा-सादा पति था मेरा, लगे देहाती धोती से ।
दम्मे से परेशान जो था, लोग कहे तुम छोड़ो ना; बन बैठी पतिव्रता मैं तो, लोग कहे तुम छोड़ो ना।
दस साल निबाहा उसने, और फिर उसने दम तोड़ा; सब रत्नों में देशरत्न थे, उसने भी तब दुनिया छोड़ा।
बाँध मुरेठा दूसरा आया, पगड़ी एक विराट सा; सर्व नहीं बस, था सागर पल्ली, दर्शन का सम्राट था।
दुर्लभ दर्शन हुआ बीच में, दर्शन वाला रहा नहीं; छोड़ चला जायगा जल्दी, था इसका तो एहसास नहीं।
दरबारी फिर लगे मचाने उधम, मैं भी लगी बदलने बारी-बारी; लगे तोड़ने दरबारी दल अपना, मेरी जान फंसी दल-दल में भारी।
सोची थी झटका दूँगी, अबकी सब दरबारी को; पर आत्मा की पुकार लगा दी, अबकी नूरे दरबारी ने।
पति मिला अबकी बस जानो, संतान बढ़ाने वाला; खाता गरम जलेबी पर, था श्रम का बात बताने वाला।
श्रमिक सरीखे पति से मैं तो, लाज छुपाये रखती थी; दल-बदलू को रही देखती, पर घूंघट डाले रखती थी।
बैंकों की तिजोरी तो खुली, पर पसीने की धरोहर, वैसी मिली नहीं; मजदूरों की मजबूरी बनी रहीं होने लगा नियोजन जबरन परिवार का, अंकुश रखा नहीं गया, आगे की राह भली नहीं।
कोर्ट का चोट पड़ा जब एक पर भारी, आपात काल का आया पारी; कहे भुदानी संत, अनुशासन पर्व काल को, सुनो हे सब नर-नारी ।
पर वह कैसा था पर्व जहाँ, लोग थे ग्रसित त्रास से, आवाजें की गयी बंद सभी की, भूमिगत लोग हुए, डर से जिसके
आगे को मैंने सोचा, क्यों न दूसरा, पति खोजूँ एक फिर से; पर हाय ! यहाँ भी वही झमेला, दरबारी का फिर से।
दरबारी भी चालू निकले, बोले, हमें चाहिए कुछ कमसिन; इक्कीस ऊपर उम्र देखकर, उनका मन था हुआ मलिन ।
सोच समझकर आगे लाया, थी चढ़ी जवानी जिन पर और घटाया तीन; वे टपकाये लार जीभ से, बोले, वाह ! वाह ! क्या हो नमकीन ।
संपूर्ण क्रांति का अलख जगाते, जय-जय प्रकाश चमका था; काली अंधियारी आपात बीच, लगा की कोई बिजली ठनका था।
था आया भूचाल जिसके प्रवाह से, गिरा था महल पचिसी; ध्वस्त ही नहीं हुआ कंगुरा केवल, जड़ मूल गया था पिसी ।
नव रत्नों का मोती बिखरा, शिवाम्बु का साधक उतरा
सोच लिया था अबकी मैंने, साथ रखूँगी करके बीन; परख-परख कर साथ रखूँगी, जो रहे पाँच साल रातों दिन।
सब बहना मिल चली स्वयंवर मेला, जहाँ लगा था फिर से भारी; कुछ भागे मैदान छोड़कर, देखा जो, मेरी नैना हैं कजरारी ।
घुम-घुम कर लगी देखने, सबने मुझ पर मटकी मारी; मेले में वे लगे रिझाने मुझको, कहकर प्यारी-प्यारी ।

(उक्त कविता ख्यातिप्राप्त लेखक,कवि,व्यंग्यकार,समीक्षक, अनुवादक “डॉ कृष्ण दयाल सिंह”जो एक अवकाश प्राप्त डाक सेवा अधिकारी भी है, उनके साहित्य काल के शुरूआती दौर में 09 फरवरी 1998 को प्रकाशित की गई कविता संग्रह पुस्तक “यत्र-तत्र”से ली गई है और यह कवि की उक्त संग्रह की चौदहवीं रचना है। RKTV NEWS नित्य इनके संग्रहित पुस्तक से क्रमवार एक एक रचना प्रकाशित करेगी। इनकी कई रचनाएं विभिन्न पत्र पत्रिकाओं और समाचार पत्रों में प्रकाशित होती रहती है साथ ही इनके दर्जनों पुस्तक भी प्रकाशित हो चुके है, वर्तमान में बिहार राज्य के भोजपुर जिला अंतर्गत आरा के वशिष्ठपुरी में निवास करते है। सुझाव और संपर्क हेतु: 9570805395)


