अंतिम दिन पारंपरिक खिलौनों और काष्ठ कला ने दर्शकों को किया आकर्षित।
भोपाल/मध्यप्रदेश ( मनोज कुमार प्रसाद)23 मार्च।मानव संग्रहालय में आयोजित हस्तशिल्प प्रदर्शनी में पारंपरिक काष्ठ कला (वुड कार्विंग) का एक अनूठा प्रदर्शन देखने को मिल रहा है।
इस अवसर पर पश्चिम बंगाल के प्रख्यात काष्ठ शिल्पकार जयदेव भास्कर अपने उत्कृष्ट शिल्प कौशल के साथ सहभागी बने हैं।
जयदेव भास्कर पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही विश्वमाल क्षेत्र की पारंपरिक ‘काष्ठ कुदाई’ (वुड कार्विंग) कला को संरक्षित और संवर्धित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।
उन्होंने इस प्राचीन कला को न केवल जीवित रखा है, बल्कि इसे नई पीढ़ी तक पहुंचाने का भी सराहनीय कार्य किया है।
उनकी कला में धार्मिक एवं सांस्कृतिक प्रतीकों का विशेष स्थान है।
उनके द्वारा निर्मित काष्ठ मूर्तियों में उल्लू, लक्ष्मी-गणेश, राधा-कृष्ण, एकतारा, बांसुरी आदि प्रमुख रूप से शामिल हैं, जो भारतीय परंपरा और आस्था का सुंदर प्रतिबिंब प्रस्तुत करते हैं।
इन कलाकृतियों के निर्माण में वे विशेष प्रकार की लकड़ियों, जैसे मेघनीका और सोनागिरी लकड़ी, का उपयोग करते हैं, जो न केवल टिकाऊ होती हैं बल्कि उत्कृष्ट नक्काशी के लिए भी उपयुक्त मानी जाती हैं।
भारत की समृद्ध हस्तशिल्प परंपराओं में कर्नाटक के चन्नापटना के लकड़ी के खिलौनों का विशेष स्थान है। लगभग 100 वर्ष पुरानी इस अद्वितीय कला को आज भी जीवंत बनाए रखने में कारीगर सैयद नयाज उल्लाह महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।
उन्होंने यह कला अपने पूर्वजों से सीखी और अब इसे नई पीढ़ी तक पहुंचाने का कार्य कर रहे हैं।
चन्नापटना खिलौनों की परंपरा का इतिहास अत्यंत रोचक है। बताया जाता है कि इस कला को बढ़ावा देने में मैसूर के महाराजा कृष्णराज वाडियार के काल का महत्वपूर्ण योगदान रहा, जब कुशल कारीगरों को आमंत्रित किया गया।
वहीं, ऐतिहासिक संदर्भों में यह भी उल्लेख मिलता है कि टीपू सुल्तान ने रेशम, खिलौनों और कॉफी के विकास को प्रोत्साहित किया। इस कला को और निखारने में ‘बाबा साहब मियां’ का विशेष योगदान रहा, जो जापान से इस तकनीक को सीखकर भारत लाए थे।
सैयद नयाज उल्लाह पिछले 35 वर्षों से चन्नापटना के ऑर्गेनिक लकड़ी के खिलौनों का निर्माण कर रहे हैं। इन खिलौनों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इन्हें प्राकृतिक रंगों और सुरक्षित सामग्री से बनाया जाना ।
मध्यप्रदेश के छतरपुर से स्थानीय हस्तशिल्प प्रदर्शनी में राम कुमार प्रजापति एवं भगवानदास प्रजापति द्वारा लगाए गए टेराकोटा कला के स्टॉल ने आगंतुकों का विशेष ध्यान आकर्षित किया। इस स्टॉल पर न केवल पारंपरिक मिट्टी के बर्तनों का प्रदर्शन किया गया, बल्कि आगंतुकों को स्वयं बर्तन बनाने का अनुभव भी प्रदान किया गया।
स्टॉल की विशेषता यह रही कि इच्छुक प्रतिभागियों से प्रति व्यक्ति मात्र 50 रुपये शुल्क लेकर उन्हें टेराकोटा कला सीखने और अपने हाथों से बर्तन बनाने का अवसर दिया गया। इस पहल के माध्यम से लोगों को पारंपरिक कारीगरी से जोड़ने का प्रयास किया गया, जिससे वे इस प्राचीन कला के महत्व को समझ सकें।
प्रदर्शनी में विभिन्न प्रकार के मिट्टी के उत्पाद जैसे—खाना बनाने के बर्तन, मटके, दीपक, घड़े, ग्लास, घरेलू उपयोग की अन्य वस्तुएँ एवं सजावटी सामग्री प्रदर्शित की गई। विशेष रूप से टेराकोटा की कढ़ाई आकर्षण का केंद्र रही। कारीगरों का मानना है कि मिट्टी के बर्तनों में बना भोजन स्वादिष्ट और स्वास्थ्यवर्धक होता है, जिसके कारण आजकल लोग पुनः इन पारंपरिक बर्तनों की ओर आकर्षित हो रहे हैं।
तीन दिवसीय स्थापना दिवस समारोह के अंतर्गत देश के विभिन्न राज्यों की पारंपरिक खाद्य संस्कृति का विशेष आकर्षण देखने को मिल रहा है। इस अवसर पर विभिन्न क्षेत्रों के प्रसिद्ध व्यंजन स्टॉल लगाए गए हैं, जो आगंतुकों को भारत की विविधतापूर्ण पाक परंपराओं से रूबरू करा रहे हैं।
दक्षिण भारतीय व्यंजनों के लिए प्रसिद्ध मुरुगन इडली शॉप अपने पारंपरिक स्वाद और गुणवत्ता के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र बनी हुई है। यहां मुलायम इडली, कुरकुरी डोसा और स्वादिष्ट उत्तपम विभिन्न प्रकार की चटनी और सांभर के साथ परोसे जा रहे हैं।
इसके साथ ही उड़द वड़ा और चना वड़ा की कुरकुरी बनावट दर्शकों को बेहद पसंद आ रही है। वेजिटेबल बिरयानी का सुगंधित और मसालेदार स्वाद इस स्टॉल को और भी खास बनाता है, जो तमिलनाडु की समृद्ध खाद्य परंपरा को दर्शाता है।
इसी क्रम में आंध्र कैफे अपने तीखे और चटपटे स्वाद के लिए आगंतुकों के बीच लोकप्रिय बना हुआ है।
यहां की सॉफ्ट इडली सांभर और वड़ा सांभर पारंपरिक स्वाद का उत्कृष्ट उदाहरण हैं। इसके अलावा कुरकुरे और स्वादिष्ट पुनुगुलु, तीखी चटनियों के साथ विशेष आकर्षण का केंद्र हैं। नारियल अचार चावल (कोकोनट पिकल राइस) अपने अनोखे स्वाद और सुगंध के लिए खास पहचान बना रहा है। भोजन के अंत में परोसा जाने वाला पारंपरिक पायसम आगंतुकों को आंध्र प्रदेश की समृद्ध मिठास का अनुभव कराता है।
उत्तर भारत के स्वाद को प्रस्तुत करता पंजाबी फूड स्टॉल भी आगंतुकों को अपनी ओर आकर्षित कर रहा है। बिना प्याज और लहसुन के बनाए गए व्यंजनों में भी भरपूर स्वाद और संतुलन देखने को मिल रहा है। मुख्य व्यंजनों में छोले कुल्चे, दही भल्ला और मलाईदार दाल मखनी के साथ परोसा गया कुरकुरा लच्छा पराठा विशेष रूप से पसंद किया जा रहा है।
स्नैक्स के रूप में आलू चिप्स, मठरी, मसाला मठरी और साबूदाना चिप्स जैसे कुरकुरे व्यंजन आगंतुकों को आकर्षित कर रहे हैं। वहीं लस्सी, कोल्ड ड्रिंक्स और पानी जैसे पेय पदार्थ इस पारंपरिक पंजाबी भोजन को पूर्णता प्रदान करते हैं।
यह खाद्य प्रदर्शनी न केवल स्वाद का अनुभव कराती है, बल्कि भारत की विविध सांस्कृतिक विरासत और पारंपरिक पाक कला की समृद्धि को भी दर्शाती है। संग्रहालय में आए दर्शक यहां विभिन्न राज्यों के व्यंजनों का आनंद लेते हुए ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ की भावना को भी आत्मसात कर रहे हैं।
सांस्कृतिक कार्यक्रम
भारत की विविध सांस्कृतिक विरासत को एक मंच पर लाकर दर्शकों को उसकी गहराई और व्यापकता से परिचित कराना रहा।
कार्यक्रम की शुरुआत केरल के पारंपरिक भैरवी कोलम नृत्य से हुई, जिसमें रंगों, लय और भाव-भंगिमाओं के माध्यम से आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक अभिव्यक्ति का सुंदर समन्वय देखने को मिला।
कलाकारों ने पारंपरिक वेशभूषा और सुसंगत ताल के साथ प्रस्तुति देकर दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया।
इसके पश्चात ओडिशा का लोकप्रिय लोकनृत्य छुटकु छुटा (Chutku Chuta) प्रस्तुत किया गया।
इस नृत्य में ग्रामीण जीवन की सादगी, उल्लास और सामूहिकता की भावना को जीवंत रूप में प्रदर्शित किया गया। कलाकारों की ऊर्जा और तालमेल ने प्रस्तुति को अत्यंत आकर्षक बना दिया।
तमिलनाडु के कलाकारों द्वारा प्रस्तुत पुलियाट्टम, मायलाट्टम एवं मारट्टम ने कार्यक्रम में विशेष रंग भर दिया।
पुलियाट्टम (बाघ नृत्य) में कलाकारों ने बाघ के रूप में सजकर साहस और शक्ति का प्रदर्शन किया, वहीं मायलाट्टम (मोर नृत्य) में सौंदर्य और लय का अद्भुत संयोजन देखने को मिला।
मारट्टम ने अपनी पारंपरिक शैली और जोशीले प्रदर्शन से दर्शकों को रोमांचित किया।
राजस्थान का प्रसिद्ध घूमर नृत्य भी कार्यक्रम का प्रमुख आकर्षण रहा। रंग-बिरंगी घाघरा-चुनरी में सजी महिलाओं ने घूमर की लयात्मक घूमों और मधुर गीतों के साथ राजस्थानी संस्कृति की झलक प्रस्तुत की, जिसने दर्शकों को विशेष रूप से प्रभावित किया।
अंत में छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र का पारंपरिक बस्तर नृत्य प्रस्तुत किया गया, जिसमें जनजातीय जीवन की सहजता, प्रकृति से जुड़ाव और सामुदायिक उत्सव की भावना स्पष्ट रूप से दिखाई दी।
ढोल-नगाड़ों की थाप और पारंपरिक वाद्यों के साथ प्रस्तुत यह नृत्य अत्यंत जीवंत और ऊर्जावान रहा।
कार्यक्रम में उपस्थित दर्शकों ने सभी प्रस्तुतियों की सराहना करते हुए कलाकारों का उत्साहवर्धन किया।
संग्रहालय के जन संपर्क अधिकारी हेमंत बहादुर सिंह परिहार ने बताया कि मानव संग्रहालय का स्थापना दिवस समारोह,न केवल मनोरंजन का माध्यम बना, बल्कि भारतीय लोक-संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास भी सिद्ध हुआ।


