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भोपाल:इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय के स्थापना दिवस पर ‘क्रिएटिव इकोनॉमी टॉय फेयर – 2026’ बना प्रमुख आकर्षण।

भोपाल/ मध्यप्रदेश (मनोज कुमार प्रसाद)23 मार्च। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय में आयोजित 49वें स्थापना दिवस समारोह के अंतर्गत आज दूसरे दिन ‘क्रिएटिव इकोनॉमी टॉय फेयर – 2026’ इस वर्ष का एक प्रमुख आकर्षण बनकर उभरा है।
इस टॉय फेयर में देशभर से आए शिल्पकार अपने हस्तनिर्मित खिलौनों एवं उत्पादों का प्रदर्शन एवं विक्रय कर रहे हैं। यह पहल “वोकल फॉर लोकल” की भावना को सशक्त करते हुए स्वदेशी शिल्प एवं कारीगरों को प्रोत्साहन प्रदान कर रही है।
इस मेले में राजकोट से आईं शिल्पकार मीना पटेल ने क्रोशिया कला के माध्यम से अत्यंत सुंदर एवं आकर्षक शिल्प प्रस्तुत किए।
वहीं मध्य प्रदेश की मंजू रावत एवं बुधनी क्षेत्र के शिल्पकारों ने आदिवासी डॉल्स एवं पारंपरिक आभूषण (ट्राइबल ज्वैलरी) के माध्यम से स्थानीय संस्कृति की झलक प्रस्तुत की।
मणिपुर से लाए गए क्रोशिया डॉल्स विशेष आकर्षण का केंद्र रहे, जो पूर्वोत्तर भारत की समृद्ध हस्तकला परंपरा को दर्शाते हैं।
आंध्र प्रदेश के कलाकार एटिकप्पा टोरी एवं संतोष कुमार ने अपनी विशिष्ट शैली में हस्तनिर्मित वस्तुएं प्रस्तुत कर दर्शकों का ध्यान आकर्षित किया।
राजस्थान की प्रसिद्ध कठपुतली कला भी इस आयोजन का प्रमुख आकर्षण रही।शिल्पकार मदन लाल एवं बिल्लू राम भट्ट ने पारंपरिक कठपुतलियों के माध्यम से राजस्थान की लोक संस्कृति को जीवंत किया। साथ ही, “राजस्थान डॉल्स टॉय” द्वारा प्रस्तुत विविध उत्पादों ने भी दर्शकों को अपनी ओर आकर्षित किया।
कर्नाटक की प्रसिद्ध चन्नपटना टॉय कला, जो ऑर्गेनिक रंगों एवं प्राकृतिक सामग्री से निर्मित होती है, शिल्पकार सरिता शर्मा द्वारा प्रस्तुत की गई। इन खिलौनों ने अपनी सादगी, सौंदर्य एवं पर्यावरण अनुकूलता के कारण विशेष सराहना प्राप्त की।
भोपाल एवं मध्यप्रदेश के अन्य क्षेत्रों से आए शिल्पकारों ने भी अपनी कला का उत्कृष्ट प्रदर्शन किया। मुकेश विश्वकर्मा द्वारा निर्मित वुडन टॉय तथा छतरपुर के शिल्पकारों द्वारा बनाए गए उत्पाद दर्शकों को खूब भाए। इसके अतिरिक्त, भगवान दास प्रजापति द्वारा निर्मित टेराकोटा शिल्प ने भी अपनी विशिष्ट पहचान बनाई। क्रोशिया कला में नुज़हत प्रवीण एवं रूपम अनिल विश्वकर्मा ने भी अपनी रचनात्मकता का परिचय दिया, जिनके कार्यों में आधुनिकता और पारंपरिकता का सुंदर समन्वय देखने को मिला।
ज्ञानवर्धन के उद्देश्य से ‘भारतीय संस्कृति और विरासत’ विषय पर आधारित पुस्तक प्रदर्शनी भी आयोजित की गई है, जिसमें भारतीय संस्कृति, इतिहास, जनजातीय अध्ययन एवं कला से संबंधित महत्वपूर्ण पुस्तकों का प्रदर्शन किया गया है।
“आहार”– “पारंपरिक व्यंजन उत्सव”
में उमड़ा स्वाद और परंपरा का संगम
‘आहार’ – पारंपरिक व्यंजन उत्सव में इन दिनों देशभर के स्वाद, सुगंध और संस्कृति का अद्भुत संगम देखने को मिल रहा है।
यह उत्सव न केवल भोजन का, बल्कि भारत की विविध लोक परंपराओं और जनजातीय जीवन शैली का जीवंत उत्सव बन गया है, जहां हर व्यंजन अपनी एक कहानी कहता नजर आता है।
उत्सव का सबसे बड़ा आकर्षण है :-महाराष्ट्र की पारंपरिक उलटी कढ़ाई पर बनती पूरणपोली, जिसे देखने और चखने के लिए दर्शकों की विशेष भीड़ उमड़ रही है।
वहीं दक्षिण भारत के स्टॉल पर ताजे बने इडली, डोसा, उत्तपम, उड़द वड़ा और वेज बिरयानी की खुशबू आगंतुकों को अपनी ओर खींच रही है।
तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश के व्यंजनों में पुनुगुलु, नारियल चावल और पायसम भी लोगों के बीच खासा लोकप्रिय हो रहे हैं। बंगाल के स्टॉल पर स्वाद का अनोखा संगम देखने को मिल रहा है, जहाँ बटर मिल्क से लेकर कोलकाता की पानी पुरी, चीज़ कॉर्न कटलेट, आलूर चॉप, बसंती पुलाव और स्वादिष्ट रबड़ी खीर तक पारंपरिक व्यंजनों का भरपूर आनंद दर्शक ले रहे हैं।
पंजाब के स्टॉल पर बिना प्याज-लहसुन के बने छोले कुलचे, दही बड़े, दाल मखनी और ठंडी लस्सी अपने पारंपरिक स्वाद के कारण लोगों को खूब लुभा रहे हैं।
वहीं मध्यप्रदेश के जनजातीय स्टॉल पर प्रकृति के साथ जुड़ी अनूठी पाक परंपराएं देखने को मिल रही हैं—बरगद के पत्ते पर बनी रोटी, बैगा समुदाय के कोदो-कुटकी चावल और बांस के व्यंजन, तथा भील समुदाय की दाल पनिया और चटनी आगंतुकों को एक अलग ही स्वाद अनुभव प्रदान कर रहे हैं।
यह उत्सव भारत की “एकता में विविधता” की भावना को साकार करते हुए पारंपरिक पाक-कला, स्थानीय संसाधनों और जनजातीय ज्ञान को एक मंच पर प्रस्तुत कर रहा है। ‘आहार’ उत्सव आगंतुकों को न केवल स्वाद का आनंद दे रहा है, बल्कि उन्हें भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत से भी जोड़ रहा है।
स्थापना दिवस समारोह के अंतर्गत मानव संग्रहालय में लोक संस्कृतियों का अद्भुत संगम देखने को मिल रहा है।
डालखाई नृत्य (ओडिशा) की ऊर्जावान प्रस्तुति से हुआ। यह नृत्य विशेष रूप से पश्चिमी ओडिशा में प्रचलित है और इसमें महिलाओं द्वारा समूह में प्रस्तुत किए जाने वाले लयबद्ध गीत एवं नृत्य दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर देते हैं।
इसके पश्चात भवाई नृत्य (राजस्थान) ने अपनी अद्भुत संतुलन कला से सभी को आश्चर्यचकित किया। इस नृत्य में कलाकार सिर पर कई मटकों को संतुलित करते हुए कठिन करतब प्रस्तुत करते हैं, जो राजस्थान की लोक-निपुणता का उत्कृष्ट उदाहरण है।
छत्तीसगढ़ के कलाकारों द्वारा प्रस्तुत गोंड नाट्य ने आदिवासी जीवन, लोककथाओं और प्रकृति के साथ उनके गहरे संबंध को प्रभावशाली ढंग से मंचित किया। इस नाट्य प्रस्तुति ने दर्शकों को जनजातीय संस्कृति की गहराई से परिचित कराया।
दक्षिण भारत की समृद्ध परंपराओं का प्रतिनिधित्व करते हुए तमिलनाडु के कलाकारों ने ओयिलाट्टम, कोलाट्टम एवं करहट्टम की मनमोहक प्रस्तुतियाँ दीं। इन नृत्यों में ताल, लय और समूह समन्वय का अद्भुत संगम देखने को मिला, जिसने दर्शकों को झूमने पर मजबूर कर दिया।
केरल की पारंपरिक कला मरुथा कोलम ने भी विशेष आकर्षण बिखेरा। यह एक अनुष्ठानिक कला है, जिसमें भूमि पर रंगों और प्राकृतिक तत्वों से सुंदर आकृतियाँ बनाई जाती हैं, जो आध्यात्मिकता और प्रकृति के प्रति श्रद्धा को दर्शाती हैं।
मानव संग्रहालय के जन संपर्क अधिकारी हेमंत बहादुर सिंह परिहार ने बताया कि,यह स्थापना दिवस उत्सव न खिलौनों के माध्यम से मनोरंजन का माध्यम है, बल्कि भारत के भिन्न भिन्न राज्यों की सांस्कृतिक विविधता, लोक परंपराओं, पाक कला और शिल्पकला की निरंतरता का जीवंत उदाहरण भी है।

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