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डॉ० राम मनोहर लोहिया

डॉ० राम मनोहर लोहिया

भारत माँ तेरे चरणों में, शतबार नमन करता हूँ; पाने को आशीष तुम्हारा, शतबार नमन करता हूँ।
तेरी गोद में आने को माँ, क्यों देव ललायित रहते हैं; प्रेम मयी रसधारा में, क्यों गोता भरते रहते है।
वर्ण, वर्ग का भेद तिमिर बन, फैल रहा अब ये कैसा; भ्रातृत्व प्रेम में, बीज भेद का, पल्लवित होता अब कैसा
माँ तेरी आँखों से अश्रुधारा, अब और नहीं बहने देंगे; हे तेज पूंज एक धमक रहा, अब और नहीं बहने देंगे।
एक सपना सुबह में देखा है, कुर्बानी भी शरमायी है, चाहा एक अखंडित भारत, खंडित से शरमायी है।
और धर्म के नामों पर, माता का, दो फाँक हुए देखा है, रक्ते रंजित मेघना और सिन्धु को, लाल हुए देखा है।
एक शक्ति पुंज है आ धमका, लेकर महासंघ का ध्वज, चौखम्भे के ऊपर भी, लेकर एक विश्व संघ का ध्वज ।
वर्ग भेद है झुलूस रहे, उसकी लपटों में, भाषा भेद मिटाते आता; वैभव के हर पाटों को, वह आज मिटाते आता।
आज अयोध्या विस्मित है, अकबरपुर तो और चकित; मिथिला की चन्दा विस्मित है, हीरालाल तो हो गये चकित ।
धन्य अवध का अकबरपुर, धन्य है मिथिला की चनपटीया; धन्य है 23 मार्च शत उन्नीस दस, धन्य है चैत्र कृष्ण की तृतीया ।
पूंजीवाद के अश्वमेघी घोड़े को रोकने, एक दिव्य-अलौकिक रूप उतर आया है; धर्म निरपेक्षता का बन प्रतीक, राम मनोहर उतर आया है।
देखो, लाल पताका लिए हुए, वह आगे बढ़ते आता है; देखो, देखो ! लिए फावड़ा, वह कैसे बढ़ते आता है।
वर्ण भेद का सिर फोड़ते, जेलों का जंजीर तोड़ते, वह आता है; मैकमोहन का चिह्न मिटाते, कैलास शिखर तक वह जाता है।
रंग-भेदी होटल अमेरिकन को, चूर किये वह आता है; गोवा को मुक्ति करवाते, देखो, कैसे वह आता है।
अंग्रेजी का नाम मिटा दो, बान्धों दाम कहते आता है; भ्रूण हत्या हो गयी तिब्बत की, इसे कोसते आता है।
काटो फेंको जाति बंधन, वह बतलाते आता है; और ‘बचाओ हिमालय’ को, वह गर्जन करते आता है।
आर्थिक समता का शंखनाद, वह देखो, करते आता है; एक और दस से अधीक न अंतर हो, रण भेरी करते आता है।
एक बिगुल बजाया है उसने, जो कानों में गूँज रहा; जीने वालों मरना सीखो, है यही मंत्र वह फूँक रहा।
शोषण से संघर्ष करो, वह लड़ने को ललकार रहा; जाग गरीबों कल तेरा है, कह कर के ललकार रहा।
रहे रोटी अलग आजादी से, यह रूप नहीं वह बनने देगा; समाजवाद का रूप दोनों हो साथ, इसे ही वह बनने देगा।
गरीबों ! पैदा किये हो, उसे क्या, पूंजीवादी थैली में बन्द यो ही होने दोगे; नहीं, तो उठो जयघोष करो लोहिया की, उनके मंत्रों को ही, आगे-आगे बढ़ने दोगे
12 अक्टूबर 67 को बस काल उतर आया था, पर, मर कर भी वह वीर पुरुष, आज अमर हो आया है;
ये आंजूल के पुष्प, चरण तेरा छुयेंगे, आशिष तुम्हारा पाने में ही हम धन्य समझेंगे।

(उक्त कविता ख्यातिप्राप्त लेखक,कवि,व्यंग्यकार,समीक्षक, अनुवादक “डॉ कृष्ण दयाल सिंह”जो एक अवकाश प्राप्त डाक सेवा अधिकारी भी है, उनके साहित्य काल के शुरूआती दौर में 09 फरवरी 1998 को प्रकाशित की गई कविता संग्रह पुस्तक “यत्र-तत्र”से ली गई है और यह कवि की उक्त संग्रह की सातवीं रचना है। RKTV NEWS नित्य इनके संग्रहित पुस्तक से क्रमवार एक एक रचना प्रकाशित करेगी। इनकी कई रचनाएं विभिन्न पत्र पत्रिकाओं और समाचार पत्रों में प्रकाशित होती रहती है साथ ही इनके दर्जनों पुस्तक भी प्रकाशित हो चुके है, वर्तमान में बिहार राज्य के भोजपुर जिला अंतर्गत आरा के वशिष्ठपुरी में निवास करते है। सुझाव और संपर्क हेतु: 9570805395)

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