
ब्रह्मपुर/बक्सर (डॉ दिनेश प्रसाद सिन्हा)07 फरवरी।ब्रह्माजी द्वारा संस्थापित और पूजित शिव लिंग बाबा ब्रह्मेश्वर नाथ की नगरी ब्रह्मपुर धाम गौरीशंकर महाविद्यालय परिसर में आयोजित श्रीमद्भागवत सप्ताह कथा यज्ञ में विश्वाचार्य विद्या वाचस्पति ब्रह्मपुर पीठाधीश्वर आचार्य धर्मेन्द्र ने विदुर मैत्रेय संवाद के माध्यम से माया ,जीव और मायापति के स्वरूप, संबंध, स्वभाव और प्रभाव का सटीक विश्लेषण दिया है। इन्होंने कहा की जीव को माया तभी तक बाधक बनती लगती है ,जबतक जीव माया पति के शरण चरण का आश्रय नहीं लेता।जो सदा देता है वह देवता,जो सदा लेता ही रहता है वह दानव ,जो समय-समय पर देता भी है और लेता ही वह मानव है। श्रृष्टि विस्तार की कथा कहते हुए आचार्य जी ने कहा कि नारायण के नाभिकमल से ब्रह्मा जी ब्रह्मा जी से मनु-शतरूपा हुए। मनु-शतरूपा से प्रियव्रत, उत्तानपाद पुत्र और देवहूति,आकुति, प्रसुति तीन पुत्रियां होती हैं जिनसे श्रृष्टि का विस्तार होता है। आचार्य जी ने कहा कि भरत महाराज ने राज छोड़ा, परिवार छोड़कर संन्यास लेते हैं।पर हिरण के बच्चे के मोह में बंध जाते ,उसे याद करते प्राण छोड़ते और अगले जन्म में हिरण का बच्चा बनते हैं।जरा सोचिए जब सन्यस्त भरत की यह दशा हुई तो उनका क्या होगा जो हर जगह मन लगाते,प्राण छोड़ेगे। नाम महिमा की पुष्टि में अजामिल मोक्ष की कथा का रहस्यमई वर्णन करते हैं जिसे सुनकर श्रोता भावविभोर होते रहे।समिति के अन्य सदस्यों में शिव मोहन तिवारी, लखनऊ भैया, सुदर्शन शर्मा, सुमन भरद्वाज ज्यादा सक्रिय हैं।श्रीमद्भागवत का मूल पाठ वैदिक अमरनारायण स्वामी, पूजन कार्य पं दीपक बाबा और शंभु स्वामी कर रहे हैं।
