
RKTV NEWS/अजय कुमार गुप्ता “अज्ञानी”12 जनवरी।नकारात्मकता मात्र नकारा नहीं होता एक चिंतन भी है आखिर निगेटिव उत्पन्न होने का कारण क्या हैं? क्यों आती है मन में निगेटिव भावनाएं? कुछ प्रश्न है तो कहीं ना कहीं इसका उत्तर भी अवश्य होगा।
समाज में ऐसा भी देखा गया है कि कुछ लोग सकारात्मकता को काफी महत्व देते हैं निगेटिव को हेय दृष्टि से देखते हैं या नकरात्मक इंसान से दूरी बना कर रखते हैं। जब की निगेटिव भी जीवन का एक अंग है और इंसानी जीवन में चाहे जितना भी पाज़िटिव रहें इसका सामना तो करना ही पड़ता हैं। भले जीवन में निगेटिव आ जाए परन्तु सोच में नकारात्मकता हावी ना हो बस इसका ख्याल अक्सर रखना चाहिए। परन्तु बोल चाल की भाषा में निगेटिव आ जाने भर से कोई निगेटिव नहीं हो जाता बस लाजिमी है देखना कि उसके जीवन में उसका कितना महत्व है और इंसान जीवन में किस काम का ज्यादा तरजीह देता है और उसका जीवन शैली क्या है बुराईयों को उजागर करना और उस में सुधारात्मक कृत उत्पन्न करने के लिए उलाहना देना निंदा का विषय नहीं होना चाहिए।
निगेटिव के कोख से ही पाजिटिव का सूरज उदय होता है जो अपनी उर्जा से बसुंधरा को ऊर्जावान बनाता हैं। हमेशा नकारात्मकता बुरी नहीं होती। जीवन में इसका भी एक महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है।
समझना होगा कि, सुबह होना सकरात्मकता का पर्याय हैं और शाम होना नकारात्मकता का। परन्तु अगर शाम नहीं होती तो इतने सुन्दर उर्जावान सबेरा का दीदार नहीं होता। और जीव अपने उर्जा का संरक्षण नवीनीकरण नहीं कर पाता। और जीवन काल न्यून हो जाता विक्षिप्त परेशान थकावट भरा हो जाता।
आम साधारण जनभावना है कि केवल पाना ही पाज़िटिव है खर्च करना निगेटिव, मगर देखा जाए तो पाने की महता तभी सार्थक होगी जब खर्च करने की क्षमता भी हो। अगर पाना ही मात्र आदर्श रहे तो कभी ना कभी वो खुद में विनाश का कारण बन जायेगा क्योंकि प्रकृति का नियम है आना व जाना इस चक्र को तोड़ा नहीं जा सकता और तोड़ कर सुख की अनुभूति नहीं की जा सकती अखण्ड सत्य है। सागर को देखो केवल लेना जानता है इसलिए उसके साथ मिलने वाली मीठी नदियों का जल धारा भी खारे हो जाते है वहीं सूरज उस खारे पानी को अपने हूनर से तपा कर वाष्प बना देता है फिर उसे मीठा जल बना कर बारिश के रूप में धारा को लौटा देता है! हैं ना कमाल की बात बस हूनर होना चाहिए बिष को अमृत बनने का। जब सागर मंथन हुआ तो सागर से बिष निकला रत्न भी। मगर बिष यहां नकरात्मक हैं और रत्न सकारात्मक परन्तु दीगर बात है कि बिष जो नकरात्मक हैं कौन पचाएं उस समय तो बहुत सारे देव भी थे दानव भी सभी के सभी महान थे वीर थे योद्धा थे परन्तु उस बिष को बर्दाश्त करने का क्षमता या हूनर कहे मात्र भगवान शंकर के पास ही था जो उस कटू निगेटिव को सकारात्मक रूप दिया बस हूनर होना चाहिए निगेटिव को पाज़िटिव बनाने का।
किसान वर्षों से संजोय बीज को समय आने पर आपने हाथों से ही उसे खेतों की मिट्टी में फेंक देता है। उसे थोड़ा भी मन में दर्द ग्लानि नहीं होता बल्कि वो बीज फेंकने के बाद भी शूकून से रहता है खाता पीता है खुश मिजाज रहता है उसे बीजों को खो जाने का दुख नहीं होता है बल्कि वो उस अपव्यय पर भी खुश हैं क्योंकि उसके अन्दर अभी उम्मीद जिंदा हैं। उसे उम्मीद है कि वो नन्हा सा बीज उसे सैकड़ों दानों में बदल कर लौटा देगा जो जीवन को नये सकारात्मक उर्जा उम्मीदों से भर देगा। इसलिए किसी साहित्यकार ने यह लिखा है कि अमंगल के कोख में भी मंगल छुपा है। बस उसे शांत मन से तलासने का प्रयास करो जीवन में कुछ बुरा भी होता है तो वहीं से अच्छाई की राहें भी निकलती है।बस उस सार्थक राहों का तलाश करो। नकारात्मकता से डरने के बजाए उस में आए पाज़िटिव ढूंढने का प्रयास करो यह सत्य है कि जो ढूंढोगे वहीं पाओगे। धरती पर एक से एक विभूति हुए जो गरीबी को मात दे कर अमीरी के शिखर को भी चूमे हैं। गरीबी से उठ कर कितने कर्मयोगी शिक्षा जगत के एक हस्ताक्षर बने चाहे ईश्वर चंद विद्यासागर हो या हमारे आदरणीय पूर्व प्रधानमंत्री मंत्री श्री लाल बहादुर शास्त्री जी हो ऐसे अनगिनत नाम हमारे इतिहास के पन्नों में दर्ज हैं। अगर वे लोग गरीबी जैसे नकारात्मकता से हार जाते तो उनका आज इतिहास नहीं होता और काल उनके जैसे विभूतियों पर आज नाज नहीं करता। इसलिए नकारात्मकता व सकारात्मकता जीवन की अवस्थाएं पुरा जीवन नहीं है।
इसलिए नकारात्मकता सर्वदा बुरी नहीं होती उस नकारात्मकता को मथ कर उस में से सार रूप में अंतिम सत्य क्रिम निकालने का हूनर तो रखना होगा और वो हूनर आयेगा धीरज से, साहस से, संयम से, सद विचार से, सामाधान ढूंढने से कोई भी दर्द जीवन से लम्बा नहीं होता ध्यान रखना चाहिए। इसलिए किसी ने कहा है:—-
जीवन में आए दु:ख तो मन को ना बेकरार कर।
सुबह होगी जरूर सुबह का इंतजार कर।

