
आरा/भोजपुर (डा जंग बहादुर पाण्डेय)11 नवंबर।भारतवर्ष में शिक्षाशास्त्रियों की लंबी सुदीर्घ परंपरा रही है। महर्षि वाल्मीकि, वेद व्यास,परशुराम, वशिष्ठ, संदीपनी, विश्वामित्र, द्रोणाचार्य से लेकर आज तक अनेक शिक्षाशास्त्री भारत वर्ष की पुण्य भूमि पर अवतरित हुए हैं।आधुनिक युग में रामकृष्ण परम हंस,विवेकानंद, महर्षि अरविंद, राष्ट्रपिता महात्मा गांधी,डा राजेन्द्र प्रसाद,पं.जवाहर लाल नेहरू, सरदार वल्लभ भाई पटेल,पं.मदन मोहन मालवीय, पंडित दीनदयाल उपाध्याय,डा श्यामा प्रसाद मुखर्जी,डा जाकिर हुसैन आदि-आदि।इसी परंपरा में आधुनिक युग में मौलाना अबुल कलाम आजाद का पदार्पण हुआ।उनका जन्म 11.11.1988 ई. में हुआ और उनकी मृत्यु 22 फरवरी 1958 को हुई।मौलाना आजाद स्वतंत्र भारत के प्रथम तालीम मंत्री थे।पंडित नेहरू की आंखों में स्वाधीन भारत के विकास का एक नया नक्शा था,वैसे ही मौलाना आजाद के मन में भारतीय शिक्षा व्यवस्था की भावी तस्वीरें थी।
1835 में लार्ड मैकाले द्वारा स्थापित शिक्षा प्रणाली की खूबियों और खामियों से वे भली भांति परिचित थे,इसलिए उन्होंने भारतीय शिक्षा में बदलते समय के अनुसार अनेक परिवर्तनों के सपने देखा था।शिक्षा एक ऐसी कुंजी है,जो कई दरवाजों को खोलती है;इसलिए हम सबको चाहिए कि इसमें दिलचस्पी लें।शिक्षा एक ऐसा साधन है कि जिसकी बेहतरी पर जिंदगी के बाकी हिस्सों की बेहतरी निर्भर करती है।इसलिए जिंदगी को सफल और बेहतर बनाना है तो हम शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण विषय को नजरअंदाज नहीं कर सकते।”
इस वक्तव्य से संकेत मिलता है कि मौलाना आजाद जीवन की श्रेष्ठता के लिए शिक्षा की श्रेष्ठता को आवश्यक मानते थे।नीति कार भर्तृहरि ने कहा है कि:-
आहार निद्रा भय मैथुनं च,
सामान्य ऐतत पशुभि:नाराणाम्।
विद्या हि तेषां अधिको विशेष:,
विद्येन हीना पशुभि: समाना।
मौलाना आजाद मानते थे कि मनुष्य की शिक्षा का सबसे पहला विश्वविद्यालय उसका घर होता है और उसके माता -पिता पहले अध्यापक होते हैं।एक आदर्श बच्चा ही आगे चलकर बेहतर शिक्षा पाने के बाद अच्छा नागरिक बन सकता है।प्रेम और अनुशासन द्वारा मां -बाप अपने बच्चे को शिक्षा का पहला सबक दे सकते हैं।ऐसा नहीं हुआ तो आजाद भारत के नागरिक अनुशासन हीन हो जाएंगे और उनका भविष्य अंधकारमय हो जाएगा।घर के विश्वविद्यालय में शिक्षित होकर निकले बच्चे ही अच्छे व्यवहार कुशल और आत्मविश्वासी नागरिक बनेंगे।मौलाना आजाद मानते थे कि माता-पिता को केवल अभिभावक ही नहीं, बल्कि कुशल कलाकार और निदेशक भी होना पड़ेगा।उन्हें अपने बच्चों को ऐसे सांचे में गढ़ना होगा; जो उन्हें बेहतर नागरिक और बेहतर मनुष्य बना सके।यानी भारत के नागरिकों के लिए माता-पिता के दायित्वों पर चर्चा करने के साथ साथ मौलाना आजाद ने शिक्षकों के लिए भी कई आदर्श सुनिश्चित किए।जो शिक्षक वास्तव में आदर्श शिक्षा देना चाहते हैं,उन्हें यह महसूस करना होगा कि शिक्षण मात्र व्यवसाय या जीविका नहीं है।यह उनके जीवन का धर्म है।मौलाना आजाद ने संसद में कहा था कि प्रत्येक विद्यालय या मदरसा वास्तव में ताकत और प्रेरणा का मंदिर और मस्जिद हैं।ऐसा मान लेने के बाद शिक्षक अपने कार्य की जिम्मेदारी पूरी तरह निभा सकते। हैं।मौलाना आजाद ने विद्यालय के शिक्षकों की तुलना उस बागवान से की है,जो अपने हर पौधे की हिफाजत करता है,हर फूल को दुलार की नजर से देखता है और उसकी बढ़ोतरी के लिए हर संभव प्रयास करता है।वे चाहते थे कि शिक्षा के द्वारा विद्यार्थी अपने आप को पहचाने,उनमें सवालों की भूख कभी खत्म न हो और एक अच्छे समाज के निर्माण में अच्छे नागरिक बनकर योगदान करें। मौलाना आजाद राष्ट्र पिता महात्मा गांधी की शिक्षा नीति से बहुत प्रभावित थे। राष्ट्र पिता महात्मा गांधी कहा करते थे कि ” देश का भविष्य वहां के योग्य नागरिकों पर , नागरिकों का भविष्य वहां की शिक्षा पर और शिक्षा का भविष्य वहां के योग्य शिक्षकों पर निर्भर करता है।” मौलाना आजाद उत्कृष्ट शिक्षा के पक्षधर थे और वे शिक्षा की गुणवत्ता से किसी भी प्रकार का समझौता करना नहीं चाहते थे।मौलाना आजाद का शैक्षणिक चिंतन या शिक्षा हमें शिक्षा का आदर्श मार्ग दिखाती है,जिस पर चलकर हम विकास और इंसानियत के लक्ष्य तक पहुंचने में सफल हो सकेंगे।उनके द्वारा 1956 में विश्वविद्यालय सेवा आयोग की स्थापना उच्च शिक्षा के क्षेत्र में उठाया गया एक महत्वपूर्ण कदम है। उनकी सुप्रसिद्ध पुस्तक इंडिया विन्स फ्रीडम उनके सृजनशील व्यक्तित्व का परिचायक है।उनके द्वारा बताई गई शिक्षा दृष्टि को हम अपनाएं तो निश्चित रूप से हमारा और हमारे देश का भविष्य उज्जवल होगा। उनका जन्मदिन राष्ट्रीय साक्षरता दिवस के रुप में मनाया जाता है।आज उनकी 137 वीं जयंती के पावन अवसर पर उनका हार्दिक नमन,वंदन एवं अभिनन्दन है।
