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अत्रि ऋषि की साधना उच्च कोटि की थी : श्री जीयर स्वामी जी महाराज

RKTV NEWS/पीरो (भोजपुर)22 अगस्त।परमानपुर चातुर्मास्य व्रत स्थल पर भारत के महान मनीषी संत श्री लक्ष्मी प्रपन्‍न जीयर स्वामी जी महाराज ने अत्रि ऋषि की साधना पर प्रकाश डाले। ब्रह्मा जी के पुत्र अत्रि ऋषि थे। अत्रि का मतलब जो त्रिदेव ब्रह्मा विष्णु महेश की भक्ति आराधना पूजा साधना करता हो उसे अत्रि कहते हैं। सामान्य तौर पर अत्रि दो शब्दों से बना है। जिसका अर्थ है जो ब्रह्मा विष्णु महेश के गुण लीला चरित्र का चिंतन मनन निरंतर करते रहता है उसे अत्री कहते हैं। अत्रि ऋषि का विवाह कर्दम ऋषि की पुत्री अनुसूईया के साथ हुआ था। कर्दम ऋषि का विवाह देवहूती के साथ हुआ था। मनु शतरूपा की तीन पुत्री हुई, जिनका नाम प्रसूति, देवहूती और आहुति हुआ। वही देवहूती का विवाह कर्दम ऋषि के साथ हुआ।
कर्दम ऋषि का जन्म ब्रह्मा जी के छाया से हुआ था। इस प्रकार से सती अनूसुईया के भाई कपिल मुनि भगवान थे। कर्दम ऋषि और देवहूति से भगवान कपिल मुनि का जन्म हुआ था। वहीं अनुसूईया का विवाह अत्रि मुनि के साथ हुआ था।
अत्रि मुनि एक उच्च कोटि के संत थे। वे लगातार भगवान की साधना करते रहते थे। एक दिन त्रिदेव प्रकट हो गए। तीनों देवों ने अत्रि ऋषि की साधना से प्रसन्न होकर वरदान मांगने को कहा। वहीं अत्रि ऋषि ने अपने पुत्र के रूप में त्रिदेवों को वरदान स्वरुप मांग लिया। जिसके बाद त्रिदेव ने अपनी सहमति देते हुए प्रतीक्षा करने को कहा।
आगे चलकर इधर पृथ्वी लोक पर सती अनुसूईया अपनी साधना एवं पतिव्रत धर्म के लिए जानी जाती थी। उत्तर प्रदेश के चित्रकूट क्षेत्र में वह साधना आराधना करती थी। उनकी पतिव्रत धर्म का चर्चा पूरी दुनिया में थी। अब भगवान अत्रि ऋषि को पुत्र के रूप में आने का वचन दे दिए थे। जिसके लिए समय अनुसार नारद जी भी अपना काम प्रारंभ किए।
वही नारद जी ब्रह्मा जी के पत्नी के पास पहुंचे। वहां जाकर के प्रणाम किए। ब्राह्मणी के द्वारा नारद जी को बहुत ही मीठा प्रसाद दिया गया। नारद जी ने कहा माता जी आपके मिष्ठान में जो स्वाद है, उससे अधिक स्वाद तो सती अनुसूईया के मिष्ठान में है। ब्राह्मणी ने कहा नारद जी अनुसूईया कौन है। नारद जी कहते हैं कि अनुसूईया अत्रि ऋषि की पत्नी है।
जो पूरे दुनिया में पतिव्रता स्त्री के रूप में जानी जाती है। उनसे बड़ा पतिव्रता स्त्री दुनिया में कोई नहीं हैं। अभी इतना बात करके नारद जी वहां से निकल गए। ब्राह्मणी कहने लगी कि ब्रह्मा जी कहते हैं कि हमसे बड़ा कोई प्रतिव्रता स्त्री नहीं है। अभी इसी बात को ब्राह्मणी सोच रही हैं कि इधर नारद जी शंकर जी की पत्नी पार्वती जी के पास पहुंचे। वहां पहुंचने के बाद भी वहीं बातों को दोहराए। जिसके बाद पार्वती जी भी नाराज हुई। वह भी मन ही मन सोचने लगी कि सती अनुसूईया की पतिव्रता व्रत को भंग करना पड़ेगा।
इस प्रकार से आगे नारद जी विष्णु भगवान की पत्नी लक्ष्मी जी के पास पहुंचे। वहां पर जाने के बाद भी नारद जी के द्वारा उन्हीं प्रसंग को दोहराया गया, जो ब्राह्मणी और पार्वती जी के पास दोहराया गया था। अब ब्रह्माणी, पार्वती जी और लक्ष्मी जी तीनों के यहां इन बातों को कह कर के नारद जी के द्वारा आगे का पूरा प्लानिंग सेट कर दिया गया था। अब तीनों देवियों के द्वारा अपने-अपने पति ब्रह्मा जी, शंकर जी और विष्णु भगवान को पतिव्रता व्रत भंग करने के लिए अनुसूईया के पास भेजा गया।
चित्रकूट में सती अनुसूईया के घर पर ब्रह्मा, विष्णु, महेश पहुंचे। जहां पर अनुसूईया से भिक्षा की मांग की गई। तीनों देवों ने कहा कि अनुसूईया आप वस्त्र अभाव में भिक्षा देंगी, तभी हम लोग ग्रहण करेंगे। वहीं अनुसूईया अपने तेज साधना के द्वारा उन तीनों देवों को पहचान गई। जिसके बाद हाथ में जल लेकर के तीनों देवों को 6 महीने के बालक बनाकर पालने में झूलाने लगी।
अनुसूईया को पता चल गया कि यह ब्रह्मा, विष्णु, महेश है। जो पुत्र के रूप में मेरे यहां आने वाले थे, वहीं आए हुए हैं। अत्रि ऋषि घर पर पहुंचे। उन्होंने पालने में झूलते हुए तीन बालक को देखा। वह भी अपने तेज साधना से इन तीनों बालकों को पहचान गए। यह तो साक्षात ब्रह्मा, विष्णु, महेश हैं। आगे इधर ब्रह्माणी, रुद्राणी और लक्ष्मी जी परेशान है कि मेरे पति कहां चले गए हैं। तीनों देवियां ढूंढ रही थी। वहीं अचानक एक दिन नारद जी मिलते हैं। नारद जी पूरी घटना की जानकारी तीनों देवियों को देते हैं। जिसके बाद तीनों देवियां अनुसूईया के घर पर पहुंचती है
काफी विनती करने के बाद अनुसूईया तीनों देव को फिर से अपने स्वरूप में प्रकट करती है। जिसके बाद एक स्वरूप से ब्रह्मा, विष्णु, महेश अनुसूईया और अत्रि ऋषि के पुत्र रूप में हो गए थे और एक स्वरूप से ब्रह्मा, विष्णु, महेश अपने स्वरूप में हो गए हैं। वहीं ब्रह्मा, विष्णु, महेश अनुसूईया और अत्रि के पुत्र के रूप में भी जान गए। विष्णु भगवान दत्तात्रेय के रूप में जाने गए। वहीं शिवाजी दुर्वासा नाम से जाने गए और ब्रह्मा जी भी चंद्र नाम से जाने गए। क्‍योंकि दत्तात्रेय विष्णु के अंश से, दुर्वासा शिव के अंश से और चंद्र ब्रह्मा के अंश से थे।

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