
RKTV NEWS/पीरो (भोजपुर)28 जुलाई।परमानपुर चातुर्मास्य व्रत स्थल पर भारत के महान मनीषी संत श्री लक्ष्मी प्रपन्न जीयर स्वामी जी महाराज ने कहा कि कथा, धार्मिक आयोजन, विवाह, शादी, उत्सव में नृत्य और गायन का विशेष महत्व है। श्रीमद् भागवत महापुराण में भगवान के लीला कथा में भी कथा की शुरुआत में एवं मध्य में और अंत में नृत्य और गायन का विशेष महत्व बताया गया हैं।
लेकिन नृत्य एवं गायन की भी एक मर्यादा शास्त्रों में निर्धारित है। आज श्रीमद् भागवत कथा के दौरान भी हर 5 मिनट पर नृत्य करवाया जा रहा है। कहीं-कहीं आप कथा में भी देखते होंगे कि महिलाएं कथा के दौरान भी नृत्य करती हैं। लेकिन नृत्य की भी एक मर्यादा है। ऐसा नृत्य या गायन नहीं होना चाहिए, जिससे समाज में चंचलता उत्पन्न होता हो। कथा के दौरान हर 5 मिनट पर नृत्य गायन करने से भगवान की कथा छुप जाती है। जबकि भगवान की जब कथा होती है तो वहां पर कथा का ही विशेष महत्व होता है। क्योंकि भगवान की स्वरूप और लीला की चर्चा से मानव जीवन का कल्याण संभव है। नृत्य और गायन भगवान के विवाह के अवसर जन्म के अवसर तथा अन्य उत्सव पर ही भजन गायन का विशेष महत्व बतलाया गया है।
लेकिन आज कथा कम और नृत्य और गायन अधिक हो रहा है। स्वामी जी ने कहा कि नृत्य और गायन से आपत्ति नहीं होना चाहिए। लेकिन मर्यादित होना चाहिए। शादी विवाह के अवसर पर या अन्य उत्सव के आयोजन में नृत्य हो रहा है। जहां पर घर की महिलाएं नृत्य करती हैं। जबकि नृत्य करने के लिए गायन करने के लिए बैंड पार्टी एवं गायन इत्यादि के लिए अलग से लोगों को बुलाया जाता है। इसीलिए नृत्य और गायन करते समय हमें अपने समाज संस्कृति की भी मर्यादा का पालन करना चाहिए।
वेद और जनेऊ संस्कार का विशेष महत्व
श्रीमद् भागवत कथा अंतर्गत नैमिषारण्य क्षेत्र में 1000 वर्ष चलने वाला अनुष्ठान जहां पर 88000 संत महात्माओं की उपस्थिति में कथा का आयोजन किया गया था। जहां पर उस आयोजन की अध्यक्षता सौनक ऋषि कर रहे थे। वहीं व्यास पीठ पर सूत जी बैठे हुए थे। जहां पर सौनक ऋषि के द्वारा सूत जी से पूछा गया कि भगवान की प्राप्ति के लिए सहज माध्यम क्या है, भगवान को कैसे प्राप्त किया जा सकता है। आगे सूत जी के द्वारा व्यास जी के द्वारा रचित श्रीमद् भागवत के प्रसंग को विस्तार से बताया गया।
पराशर ऋषि और सत्यवती से व्यास जी का जन्म हुआ था। व्यास जी का जन्म भगवान के लीला स्वरूप को वर्णन करने के लिए ही हुआ था।
व्यास जी के द्वारा जो पहले कथा श्रुति के रूप में था जो कहने और सुनने के रूप में था, उसकी लेखनी के रूप में लिखा गया। व्यास जी ने सबसे पहले वेद की रचना किए। वेद में एक लाख श्लोक लिखा गया। व्यास जी के द्वारा वेद को ही चार भागों में विभाजित करके अलग-अलग रचना किया गया था। जिसमें सामवेद, अथर्ववेद, यजुर्वेद,और ऋगवेद हैं।
उसके बाद उपनिषद की रचना की गई। व्यास जी ने आगे महाभारत की भी रचना की, जिसमें वेद उपनिषद के ही श्लोकों को आसान भाषा में लिखा। इस प्रकार से व्यास जी के द्वारा कई इतिहास, पुराण, वेद की रचना की गई। वेद पर महिलाओं का अधिकार नहीं था। क्योंकि वेद के वाक्य को पढ़ने के लिए कुछ नियम है। इसीलिए वेद पर महिलाओं का अधिकार नहीं था। महिलाओं को अशुद्धी अवस्था में होने के कारण वेद पर अधिकार नहीं दिया गया था। वहीं यज्ञोपवीत संस्कार का भी अधिकार महिलाओं को ऋषियों के द्वारा नहीं दिया गया था। क्योंकि महिलाएं कुछ समय के बाद अशुद्धी अवस्था को प्राप्त करती हैं। जिससे यज्ञोपवीत संस्कार की मर्यादा नहीं रह पाती है।
इसीलिए ऋषि महर्षियों ने महिलाओं को बिना याज्ञोपवित संस्कार के भी पूजा पाठ इत्यादि करने का अधिकार दिया। लेकिन व्यास जी के द्वारा जो वेद की रचना की गई, उसमें 95 परसेंट लोगों को पढ़ने का अधिकार नहीं था। 50 परसेंट महिलाएं अलग हो जाती हैं। वहीं जिनका खान-पान, रहन-सहन, आचरण, व्यवहार मर्यादित नहीं है, वह भी वेद के अधिकारी नहीं हैं। इस प्रकार से 95 पर्सेंट लोग वेद अधिकारी नहीं थे। केवल 5% लोग ही वेद के अधिकारी हुए। इसीलिए व्यास जी ने आगे कई धार्मिक ग्रंथो की रचना किए।
विष्णु पुराण सहित 17 पुराणों की रचना करने के बाद भी व्यास जी को शांति नहीं मिला था। क्योंकि व्यास जी ने अलग-अलग कई इतिहास पुराण इत्यादि की रचना तो किया, लेकिन उनमें कुछ ऐसी शब्द लिख दिए थे, जिससे लोगों ने उसका अर्थ गलत निकलना शुरू कर दिया था। जिससे समाज में लोगों का आचरण सही नहीं रह पाया।
इसीलिए व्यास जी मन ही मन परेशान रहने लगे थे। फिर आगे चलकर नारद जी के द्वारा व्यास जी को मार्गदर्शन दिया गया। जिसमें नारद जी ने कहा कि व्यास जी आपके द्वारा जितने भी इतिहास, पुराण, ग्रंथ की रचना की गई, उससे समाज में लोगों के बीच भ्रम की स्थिति बनी हुई हैं। इसीलिए आप एक वैसे ग्रंथ की रचना कीजिए जिससे समाज के लोगों का कल्याण हो सके। वही व्यास जी के द्वारा सबसे अंतिम 18वां श्रीमद् भागवत महापुराण की रचना की गई। जिससे मानव का कल्याण संभव है। वही सभी पुराणों का सार भागवत महापुराण है। जिससे संपूर्ण मानव श्रवण करके भगवान श्रीमन नारायण की शरणागति प्राप्त कर सकते हैं।
