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लक्ष्मण शाहाबादी:भोजपुरी के बेजोड़ गीतकार ।जन्मदिवस पर विशेष

RKTV NEWS/पंकज भारद्वाज,16 मई।सिनेमा आ साहित्य के बड़ा गहिर संबंध रहल बा। साहित्य, सिनेमा के आधार दिहलस, संवरलस, ओहिजे सिनेमा साहित्य के बड़ आसमान दिहलस। ओह के पसरलस। जन-जन तक पहुंचवलस। लोक साहित्य तऽ सिनेमा के संसारे बदल दिहलस। कथानक से लिहले गीत ले, जवन भी रचल गइल, उ अलग मुकाम बनवलस।
लोक साहित्य आ धुन प बनल फिलिम आपन अलहदा छाप छोड़लस। हालांकि अइसन कुछे लोग भइल, जे सिनेमा आ साहित्य के बीच के एह संबंध सूत्र के कायदे से पकड़ल आ कुछ अइसन कर गइल जवन मील के पत्थर बन गइल।
सिनेमा में लोक रंग भरे वाला अइसने विलक्षण कलमचियन में शामिल बा लक्ष्मण शाहाबादी के नाम। खांटी भोजपुरिया माटी में पैदा भइल लक्ष्मण शाहाबादी आपन रचनाधर्मिता से भोजपुरी सिनेमा के नया आयाम दिहलें, अइसन आयाम जेकरा के पा के भोजपुरी सिने जगत आजो खुद के गौरवान्वित महसूस करत बा।
बिहार के राजधानी पटना से महज 60 किलोमीटर पश्चिम बसल आरा शहर के शिवगंज में 16 मई, 1938 के एगो कायस्थ परिवार में जनमल लक्ष्मण शाहाबादी के संगीत आ साहित्य विरासत में मिलल रहे। उनकर बचपन के नाम झुनन रहे। उनकर बाबूजी रामलाला प्रसाद सितार वादक रहीं। शास्त्रीय संगीत के उस्ताद। घर में हर तरह के वाद्य यंत्र रहे। जाहिर सी बात बा बचपन में ही लक्ष्मण शाहाबादी के पाला एह वाद्य यंत्रन से पड़ल। अइसना माहौल में पलल-बढ़ल शाहाबादी के भीतर भी गीत-संगीत के अंकुर फूट गइल। बचपन में ही गाना-बजाना आ गीत रचना शुरू कर दिहलन। संगीत के विधिवत शिक्षा उस्ताद जंगली मलिक से लिहलें। बतावल जाला कि उनकर उमिर के बच्चा जब गलियन में, मैदान में कबड्डी, फुटबाॅल, गुल्ली-डंडा खेलत रहलें तब ऊ हारमोनियम, तबला, सितार जइसन वाद्य यंत्रन के संगत में मशगूल रहत रहलें। एही के नतीजा रहल कि आगे चलकर उनके हर तरह के वाद्य यंत्र बजावे में महारत हासिल हो गइल।
कायस्थ परिवार से रहले, तो कलम से रिश्ता पैदाइशी रहे। पढ़ाई-लिखाई कायदे से भइल। हिंदी साहित्य से डबल एम.ए. कइलन। हिंदी के अलावा उर्दू प भी बेहतर पकड़ रहे। भोजपुरी तो मातृभाषा ही रहे, एह से उनके विशेष लगाव रहे। खासकर एकरा लोक साहित्य आ लोक धुनन से। एह में कवनो दो राय नइखे कि लक्ष्मण शाहाबादी के पास कमाल के सौंदर्यबोध रहे, जवन उनकर रचना में खूब-खूब नजर आवेला। अापन रचल गीत ऊ मंच से खुदे गावत रहलें। ‘दियरा के बाती अइसन जरे के परी/दुनिया में जिये खातिर मरे के परी‘ जैसे गीत बहुत पहले लोकप्रिय हो गइल रहे। समय के साथ उनकर हिंदी-भोजपुरी गीतन के गूंज दिल्ली-मुंबई तक पहुंचल।
लोक परंपरा आ गंवई माटी के गंध से लबरेज एह गीतन के मुरीद लोग गीतकार के ढूंढें लागल। तब एचएमवी जइसन कंपनी शाहाबादी के बुलवलस आ उनकर पहिला हिंदी गीत रिकार्ड भइल -‘कह के भी न आये मुलाकात को/चांद-तारे हंस रहे थे कल रात को’। एह गीत के आवाज दिहले रहलें हिंदी सिनेमा के मशहूर गायक मो. रफी। एकरे बाद उनकर रिश्ता मायानगरी से जुड़ गइल। बिहार से बने वाली पहिल हिंदी फिल्म ‘कल हमारा है‘ के मय गीत लक्ष्मण शाहाबादी लिखलें। एह गीतन के रचे के बेरा शाहाबादी हिंदी आ भोजपुरी के बीच के खाई के पाट दिहलें। गीतन में अइसन भोजपुरी शब्द जोड़लें, जेवने के हिंदी भाषी भी आसानी से समझ सकें। एह गीतन के गवलें मो. रफी, उषा मंगेशकर, आशा भोंसले, मन्ना डे, दिलराज कौर, भूपिंदर सिंह जइसन दिग्गज गायक-गायिका।
एकरे अलावा ऊ 1988 में बनल हिंदी फिल्म ‘घूंघट’ के भी गीत लिखलें। हालांकि उनके ख्याति मिलल भोजपुरी फिल्म से। 1981 में बनल भोजपुरी फिल्म ‘धरती मइया’ के गीते नाहिं, संवाद भी लक्ष्मण शाहाबादी लिखलें। इ फिल्म खूब शोहरत बटोलस। एह फिल्म में संगीत दिहले रहलें बाॅलीवुड के मशहूर संगीतकार चित्रगुप्त। फिल्म के सारा के सारा गीत हिट भइल। मो. रफी के गावल ‘जल्दी-जल्दी चल रे कहंरवा/सूरुज डूबे रे नदिया‘ केकरा याद ना होई। एह फिल्म के एगो दोसर गीत ‘केहू लुटेरा केहू चोर हो जाला/आवेले जवानी बड़ा शोर हो जाला’ भी भोजपुरांचल में कम शोर नाहिं मचवलस। इ शोर आजो सुनाई देला।

किशोर कुमार के साथ लक्ष्मण शाहबादी (फाइल फोटो)

1983 में बनल फिल्म ‘गंगा किनारे मोरा गांव’ के गीत लिखे के जिम्मा भी मिलल लक्ष्मण शाहाबादी के। संगीतकार एक बार फिर चित्रगुप्त रहलें। एह फिल्म के गीत भोजपुरी ही नाहिं हिंदीपट्टी के भी काफी प्रभावित कइलस। कोलकाता से लिहले दिल्ली-मुंबई आ पंजाब-हरियाणा तक एह गीतन की पहुंच बनल। इ फिल्म ब्लाॅकबस्टर साबित भइल। कहीं तो धूम मच गइल धूम। लक्ष्मण शाहाबादी के नाम अब कवनो परिचय के मोहताज नाहिं रह गइल रहे।
कहे के त सभ केहू आपन, आपन कहाए वाला के बा‘, ‘भींजे रे चुनरी, भींजे रे चोली, भींजे बदनवा ना‘, ‘मेला में सइयां भुलाइल हमार, अब हम का करीं‘, ‘गंगा किनारे मोरा गांव हो, घर पहुंचा द देवी मइया’ जइसन गीतन के गंध से कोई बचल नाहिं। सब के सब गीत सुपर-डुपर हिट। उषा मंगेशकर के गावल एही फिल्म के एगो गीत ‘जइसे रोज आवेलू तू टेर सुन के/अइयो रे नींदिया निंदरबन से‘, तऽ एतना मशहूर भइल कि तब भोजपुरांचल के गांव में माई अपने बच्चवन के सुतावे खातिर इहे लोरी सुनावे।
खैर, अगिले साल रिलीज भइल ‘भैया दूज’। एहू के गीत लक्ष्मण शाहाबादी ही लिखलें। एह फिल्म के गीत ‘कहंवा गइल लरिकइयां हो, तनी हमके बता द’ आ ‘एही फागुन में कई द बियाह बुढ़ऊ’ काफी लोकप्रिय भइल। अबहिन लोग एह फिल्मन के गीत गुनगुनाते रहलें तब लें 1986 में रिलीज भइल ‘दुलहा गंगा पार के’। एहू में गीत आ संगीत दूनों लक्ष्मण शाहाबादी के रहे। एह फिल्म के टाइटल गीत ‘काहे जिया दुखवल, चल दिहल मोहे बिसार के/अतना बता द तू दुलहा गंगा पार के’ एक बेर फिर साबित क दिहलस कि शाहाबादी के कवनो जोड़ नइखे। इहो तय हो गइल रहे कि भोजपुरी सिनेमा के एगो अइसन नायाब नगीना नसीब हो गइल बा जवने के भीतर हिंदी सिनेमा के शैलेंद्र (गीतकार) आ नौशाद (संगीतकार), दूनों छिपल बाड़ें। दरअसल, गीत गढ़े में माहिर लक्ष्मण शाहाबादी मेलोडी के भी मास्टर रहलें। उ कई गो फिल्मन में संगीत भी दिहलें। बिहार के गोपालगंज निवासी मशहूर संगीतकार चित्रगुप्त के साथ उनकर खूब निभल। उनकरे साथे खूब काम कइलन आ एही बीच उन से सिनेमाई संगीत के बारीकियो सीखलें। ‘छोटकी बहू’, ‘भैया दूज’, ‘राम जइसन भइया हमार’, गंगा आबाद रखिह सजनवा के’, ‘बेटी उधार के’, ‘गंगा ज्वाला’, ‘दगाबाज बालमा’, ‘हमार दुलहा’, ‘कसम गंगाजल के’ जइसन फिल्मन के लक्ष्मण शाहाबादी अपना गीत-संगीत से यादगार बना दिहलें।
कई फिल्मन के पटकथा भी लिखलें। अस्सी-नब्बे के दशक में उनकर नामे कवनो भोजपुरी सिनेमा के कामयाबी के गारंटी होता रहे। भोजपुरी के ख्यातिलब्ध साहित्यकार डॉ. अरूण मोहन ‘भारवि’ के मुताबिक लक्ष्मण शाहाबादी सिनेमा के लोक से जोड़ दहलें। ऊ लोक धुन आ लोक साहित्य के मर्मज्ञ रहलें। उ भोजपुरी सिनेमा के बखूबी संस्कारित कइलें। कहल जाए तो शाहाबादी अपना गीत-संगीत से भोजपुरी सिनेमा के स्वर्णिम दौर गढ़लें। तीस से भी ज्यादा सुपरहिट फिल्म दिहलें। उनका मन में अबहिन बहुत कुछ करे के तमन्ना रहे। भोजपुरी गीत-संगीत से ताल्लुक रखे वालन के भी उन से काफी उम्मीद रहे। बाकिर, एह उम्मीदन के जबर्दस्त झटका लागल 19 दिसंबर 1991 के, जब महज 53 साल के उमिर में ही लोक साहित्य आ लोक धुन के इ यशस्वी चितेरा अंजान सफर पर निकल गइल। उनकर आखिरी फिल्म ‘गंगा झूठ न बोलावे’ अधूरे रह गइल। शाहाबादी के जाए के बाद भोजपुरी फिल्म जगत में सन्नाटा-सा पसर गइल। ओइसन फिल्म, ओइसन गीत, ओइसन संगीत फिर कहां बन पवलस भोजपुरी में।
शाहाबादी खुद सिनेमा के स्कूल रहलें। गीतकार, संगीतकार, पटकथा लेखक, निर्माता, निर्देशक-सब कुछ। उनका जाए के तीस साल बाद भी भोजपुरी सिनेमा के दोसर लक्ष्मण शाहाबादी कहां मिल पवलस? ऊ एह दौर में कथित भोजपुरी गीतकारन खातिर आईना बाड़ें, जिनकर कलम एह लोक भाषा के स्वरूप विद्रूप कर दिहले बा। ओहू लोग के भी लक्ष्मण शाहाबादी के रचल गीतन के सुने के चाहिं, जेकरा भोजपुरी गीत-संगीत में अश्लीलता नजर आवेला।

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