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भोजपुर:बोरा लोडिंग अनलोडिंग करने वाले मजदूरों को आज भी नहीं मिलती न्यूनतम मजदूरी : महामंत्री राम दयाल सिंह

आरा/भोजपुर 26 जून।स्वतंत्र भारत के इतिहास में बिहार राज्य खाद्य निगम के गोदामों में अपने माथे व कंधों पर पचास और सौ के जी के बोरों का लोडिंग और अनलोडिंग करने वाले मजदूरों की व्यथा कितनी दुख भरी है यह सुनकर आपको भी आश्चर्य होगा।जिसके लिए न कभी प्रशासन ने कोई राज नेता कोई बात करता हो न कभी दास्तान सुनने की हिमाकत की।बोरा उठाकर वर्षों से अपना जीवन यापन और परिवार का भरण पोषण करनेवाले मेहनतकश मजदूरों के बदौलत सरकारी गोदाम से अनाज का बोरा प्राइवेट दुकानदारों या डीलरों के पास पहुंचता है।
इस संबंध में वरिष्ठ पत्रकार डा दिनेश प्रसाद सिन्हा ने बातचीत की।अपनी मजदूरी के बारे में मजदूर नेता उमेश पासवान ने बताया कि बिहार राज्य खाद्य निगम द्वारा बोरा का लोडिंग, अनलोडिंग, तौलाई ,भराई एवं सिलाई करने के लिए प्रति बोरा कुल 37 रु 89 पैसे निर्धारित है जिसे मिलना चाहिए लेकिन मिलता कहां,वह भी वर्षों बाद।
निर्धारित मजदूरी जिसमें 41 केजी से 55 के जी तक प्रति बोरा दर एक अक्टूबर 2024 से लागू है जिसमें चढ़ाना,उतारना, तौलाई सिलाई का कुल रकम 37 रुपया 89 पैसा प्रति बोरा है।
बिहार के विभिन्न जिलों के प्रखंडों में सैकड़ों की संख्या में मजदूरों को मजदूरी के रूप में प्रति बोरा कम से कम ₹3 से अधिकतम ₹8 तक ठेकेदारों के माध्यम से दिया जाता है इसके अतिरिक्त सरकारी प्रावधानों में इपीएफ,इ एस आई ,बोनस ,आई कार्ड, शौचालय, पानी की व्यवस्था विश्राम घर की सुविधा विभाग द्वारा उपलब्ध कराना है ।
फूड एंड एलाइड वर्कर्स यूनियन के प्रदेश महामंत्री राम दयाल सिंह ने बताया कि मानवीय दृष्टिकोण से मजदूरों को भी श्रम करके मेहनताना पाने का अधिकार हैं,लेकिन अनपढ़ गवार जाहिल समझकर इन्हें मजदूरी कराकर भी हक का भी रू नही दिया जाता है। सच्चाई है की भारत सरकार व बिहार सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम मजदूरी भी नहीं दी जाती है।इन्होंने बताया कि ये मजदूर कोरोना काल में भी अपनी ड्यूटी को निरंतर सेवा समझकर अनाज के बोरे को घर-घर तक पहुंच कर देश को विषम संकट से उबारने का काम किया है।यह भी सत्य है कि कोरोना वायरस भी इन मेहनतकश मजदूरों का कुछ भी नहीं बिगाड़ सका।इन्होंने बताया कि अब ठेकेदार भी कार्य करने से अपने आप को अलग कर रहे हैं ।इनका कहना है कि सरकार ठेकेदारों को काम करने के एवज में चार माह से भुगतान नहीं कर रही है।इन्होंने बताया कि प्राप्त जानकारी के अनुसार सरकार को भुगतान करने के लिए पैसे नहीं है यह और भी दुखद है।इन्होंने बताया की ऐसे सेवकों को मेहनताना के रूप में न्यूनतम मजदूरी नहीं मिलना समाज और राष्ट्र को कलंकित करने वाला है। स्वतंत्रता प्राप्ति के 75 वर्षों बाद भी केंद्र और बिहार सरकार के पदाधिकारी और नेता गण विकास और आत्मनिर्भरता की बात जोर-जोर से सुनाते है लेकिन समाज के इस निचले पायदान पर कार्य करने वाले मजदूरों के बारे में कभी कुछ सोचा ? लानत है ऐसे नेता और सरकार पर ? श्री सिंह ने बताया कि केंद्रीय खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्री श्री प्रह्लाद जोशी जी का पटना आगमन पर सहकारिता मंत्री श्री प्रेम कुमार , खाद्य एवं उपभोक्ता संरक्षण मंत्री श्रीमती लेशी सिंहने बकाया लगभग 5000 करोड़ राशि की मांग की। केंद्रीय मंत्री में स्पष्ट कहा की आडिट रिपोर्ट मिलने के बाद ही भुगतान संभव है। महामंत्री ने कहा की पदाधिकारीयों द्वारा ऑडिट ना करना एक आपराधिक साजिश है इसके लिए दोषी कौन है।श्री सिंह ने बताया कि इस संबंध में पदाधिकारी को अनेकों आवेदन, मिलकर सारी बातों को समझना, यहां तक की केश करके भी आदेश निकलवाने के बाद भी भुगतान नहीं हो रहा है।केवल कहने के लिए सबको आजादी और स्वतंत्रता है लेकिन काम में वही ढाक के तीन पात वाली मुहावरा चरितार्थ है।अर्थात कमजोर मजदूरों के लिए कोई नियम कानून नहीं है ।इस धांधली में पदाधिकारी ठेकेदारी का मिली भगत है इसकी जांच हो तो महाघोटाले में तब्दील हो सकता है।

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