
समस्तीपुर /बिहार (डॉ परमानन्द लाभ)10 अप्रैल ।विदेहराज चेटक की बहन प्रियकारिणी, विदेहदिज्जा अथवा देवी त्रिशला और श्रेयांस व यशस्वी दो नामों के अतिरिक्त एक सिद्धार्थ नाम धारण करने वाले के घर एक पुत्र-रत्न की प्राप्ति हुई। क्षत्रिय कुंडपुर और ब्रह्मांड कुंडपुर के घर-घर खुशियां व्याप्त हो गई। माता-पिता ने शिशु का नाम वर्धमान रखा, समयान्तराल में जो महावीर, सन्मति. श्रमण, विदेहदिज्ज व वैशालिक आदि कतिपय नामों से जाने जाने लगे। इनमें ‘विदेहदिज्ज’ नाम मातृ पक्ष का है और ‘महावीर’ नाम उनके अभय तथा पराक्रम गुणों के कारण है। इसीप्रकार ‘सन्मति ‘ नाम मति, बुद्धि एवं प्रतिभा में दक्ष होने के कारण पड़ा।
यह अद्भुत शिशु जब लौकिक संसार में आया, फिर अलौकिकता उसका साथ कभी नहीं छोड़ा, जो उसके धर्म चक्रवर्ती होने की सूचना थी।
कुमार वर्धमान अपनी पत्नी यशोदा के साथ जब रथ पर आरूढ़ हो नगर-विहार को निकलते, तो उन्हें काफी संख्या में जमघट लगाये साधु-सन्यासियों के दर्शन होते, इनमें कोई जटा धारण किये, कोई त्रिशूल थामे, कोई नग्न, तो कोई भीक्षापात्र लिए। कोई तापस, तो कोई परिव्राजक। वन-प्रांतों में मठ तथा आश्रम मिलते। वर्धमान को लगा कि लोग भोग को त्याग मान बैठे हैं। अधर्म को धर्म समझ बैठे हैं।
वश, क्या था? वर्धमान ने ठान लिया कि वह मंगलमय धर्म की स्थापना करेगा। अहिंसा, संयम और तप का उद्धार करेगा।
वर्धमान का मानना था कि पति-पत्नी सत्ता में दो होकर भी कर्तव्य में एक होते हैं। दोनों एक दूसरे के पूरक होते हैं,सहगामी होते हैं। और सच तो यह है कि स्वयं वर्धमान और यशोदा ने जीवन जीने की इस पद्धति को स्वीकार किया था।
वर्धमान-यशोदा को भगवान पार्श्वनाथ का धर्म विरासत में मिला था। उनके अहिंसा, संयम और तप के दर्शन में उनकी आस्था और श्रद्धा थी। उनका श्रुत, आचार और संघ उनका आदर्श था। उनकी स्पष्ट मान्यता थी कि ज्ञान और कर्म का समन्वय जीवन को उर्जस्वित करता है। पार्श्वनाथ के संघ में श्रमण-श्रमणी, श्रावक-श्राविका सभी थे, परंतु दुर्भाग्य था कि उनके निर्वाण के ढाई सौ साल बाद उसके प्रवाह की गति मंद हो चुकी थी, जिसके लिए वर्धमान के अंत: में गहरी चिंता थी।
मानव जिस समाज में जीता है, उसे स्वस्थ रखना उसका परम कर्तव्य होता है। वर्धमान ने महसूस किया कि तत्कालीन सामाजिक मूल्य विषमता से आक्रांत है। समाज में अनुशासन और मर्यादा नहीं रह गई है। राजा भोग-विलास में डूबे हैं। धर्मगुरु कर्मकांड का जाल बिछाने में लगे हैं। पुरोहित राजा की स्तुति-पाठ में लगे हैं। राजा को ईश्वर का अंश बताया जा रहा था। समाज में धन की पूजा हो रही थी। मनुष्य की बिक्री हो रही थी। जातिवाद का बोल-बाला था। ये सब देखकर वर्धमान का अंतर चीत्कार कर उठा।
वर्धमान खुद एक गणतंत्री राजा के पुत्र थे। उन्होंने देखा कि समग्र राष्ट्र छोटे-मोटे टुकड़ों में बंटा है। राजसत्ता और धनसत्ता सब पर हावी है। मानवीय एकता और समता का सिद्धांत गौण हो गया है। धर्म और संस्कृति की रक्षा करने वाला कोई नहीं रह गया है। वर्धमान के मन में विचार आया कि गणतंत्र की स्थापना का उद्देश्य जन-जन का कल्याण था, सभीके सुख व समृद्धि के लिए था। लेकिन, उन्हें देश, समाज व परिवार में कहीं भी समता नजर नहीं आया। गणतंत्र असफल होता दिखा। आमलोगों की चेतना कुंठित हो चुकी थी। अतएव उनके हृदय में गणतंत्र की असफलता हिलोर मारने लगा।
श्रमण पद्धति तथा वैदिक पद्धति गणतंत्र संस्कृति के दो आयाम हैं। वज्जी गणतंत्र और मल्ली गणतंत्र दोनों इन पद्धतियों में भरोसा करने वाले राजा थे। इनके मामा चेटक श्रमण परंपरा में आस्था रखते थे, जबकि उनके कतिपय साथी वैदिक परंपरा को श्रेष्ठ मानते थे। राष्ट्र में अनेक श्रमण संघ थे, वैदिक सम्प्रदाय थे। स्वयं वर्धमान-यशोदा श्रमण-परंपरा में विश्वास करते थे। दूसरे तरफ वैदिक ईश्वरवादी थे, कुछ कर्मकांडी थे। कुछ आत्मवादी, तो कुछ निर्वाणवाद में भरोसा रखते। तपी भी थे। तंत्रमार्गी, शौचवादी… आदि।

वर्धमान को सुधार की अनिवार्यता महसूस हुई। उन्हें धर्म के नाम पर पशुबलि एकदम पसंद नहीं। दास-प्रथा भी पसंद नहीं। उनकी दृष्टि में जातिवाद तो भयंकर रोग है।
वर्धमान के पवित्र हृदय ने इन भव रोगों का निदान ढूंढ निकाला। उनके विकार क्षीण हो गए। आंतरिक पवित्रता अन्य सभी विकारों को रुपांतरित कर देती है। यह सब उनके पूर्वजन्मों में संचित संस्कारों का अद्भुत प्रभाव था। योग-साधक वर्धमान के लिए कुछ भी असंभव नहीं था। साहित्यकारों ने भगवान वर्धमान महावीर के जिन अलौकिकताओं का वर्णन किया है, वे सभी सच हैं। संसार के राग-रंग ने उनके चित्त को कभी बांध न सका। साधना में उनकी विशेष रुचि थी।
उनकी मान्यता है कि मनुष्य स्वयं हीं अपना भाग्य विधाता है। वर्धमान का समय आत्मचिंतन में हीं व्यतीत हुआ। सत्योपलब्धि हीं उनकी साधना का अंतिम चरण था।
व्यक्ति की अंतिम अर्थवत्ता अकेलापन ही है। कुमार वर्धमान श्रमण हो गए। वे ऐसे राज्य से जुड़ गए, जहां शासक और शासित का भेद मिट जाता है। वर्धमान अब कर्ता नहीं रहे, द्रष्टा एवं ज्ञाता महावीर हुए। परंतु जो अमृत मिला, उसे जन-जन तक पहुंचाना आवश्यक था।
श्रमण भगवान महावीर ने जिस संघ की स्थापना की थी, उसका द्वार सबके लिए खुला था। संघ में भेद के लिए कोई स्थान नहीं था। दास व स्वामी का भेद नहीं था। नारी को विशेष गौरव प्राप्त था। संघ में प्रवेश कर सब अपना कल्याण कर सकते थे । उनका संघ सर्वोदय तीर्थ था।
भगवान महावीर की जयंती पर उन्हें शत-शत नमन।
