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नारी !

नारी !

नारी होती देवी अवतार
यही रचती संसार
यही पालती संसार
यही जन्माती वीर संतान
इसमें ही बहता ममता सागर
यही करती जगत् कल्याण
यही देती शिक्षा संस्कार
यही ही होती सब सुख धाम
यही होती घर का श्रृंगार
बिनु नारी घर श्मशान।
जहाँ होता नारी अपमान
वहाँ होता विपुल विनाश
कौरवों ने किया एक नारी अपमान
हो गया उसका कुल समेत नाश।
इतना ही नहीं
नारी रखती शक्ति अपार
जब करतीं असुरवृत्तियाँ अत्याचार
तब यह काली दुर्गा सम हो
कर बैठती उनका समूल नाश।
रचनाकार: धर्मदेव सिंह

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