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“समय के साँच”‘ पर एक नजर

RKTV NEWS/आरा (भोजपुर)24 जून। डॉ कृष्ण दयाल सिंह की रचनाओं में शामिल उनकी छठी प्रकाशित पुस्तक भोजपुरी कविता संग्रह “समय के साँच ” है जिसका प्रथम संस्करण वर्ष 2006 में प्रकाशित हुआ था। इस पुस्तक पर कई साहित्यकारों और समीक्षकों ने अपनी अपनी सकारात्मक टिप्पणियां लिखी है जो इस पुस्तक के प्रारम्भ में प्रकाशित की गई है।

लोगन के विचार

‘समय के साँच’ पर एक नजर

भारत चीन युद्ध के पृष्ठभूमि पर रचित कविवर रामधारी सिंह ‘दिनकर’ के प्रसिद्ध काव्य ‘परशुराम की प्रतीक्षा’ के विषय वस्तु के देश काल आ परिस्थिति के अनुसार भोजपुरी में ढाले के ‘समय के साँच’ में अच्छा प्रयास भइल बा। जब देश युद्ध के आँच में उसिनाये लागेला, चारो ओर से खतरा मड़राये लागेला, तब हर नागरिक के पहिला कर्तव्य देश के सुरक्षा बन जाला। चाहे हिंसा से होखे भा अहिंसा से। फिर हाथ में चरखा ना चक्र के जरूरत पड़ेला, तकली के जगहा तरूआर के आवश्यकता पड़ेला। अतुने ना देश के महापुरुषन के, बीर शहीदन के, पितरन पुरखन के गोहरावत उनका से प्रेरणा लेबे के पड़ेला। भीतर के आग जगावे के पड़ेला। हथियारन के कुद पड़ल धार के तेज करे के पड़ेला। समय के साँच के कवि बड़ा जोरदार ढंग से एह विषय वस्तु के समाज के सामने राखत बा। एक बार परमबीर चक्र विजेता अमर शहीद हमीद के समाधि-दर्शन के अवसर दिनकर जी के कंठ से अनयासे फुट पड़ल रहे

तूने दिया देश को जीवन देश तुम्हें क्या देगा।
अपनी आग तेज करने को नाम तुम्हारा लेगा।।

प्रस्तुत संग्रह के रचनाकार भी महाराणा प्रताप, शिवाजी, कुँवर सिंह, राजगुरु, सुखदेव, भगत सिंह आदि प्राचीन से लेकर आर्वाचीन बीर पुरूषन के गुणगान के बहाने देश आ समाज के प्रति उनका योगदान के बखानत हर नागरिक के दायित्व के याद दिलावता। मन्दिर, मस्जिद, गिरजा, गुरूद्वारा से प्राप्त आध्यात्मिक ऊर्जा के देश हितार्थ उपयोग करे के उकसावता।

एगो भोजपुरी कहाउत ह अबरा के मउगी भर गांव के भउजी। बिना ताकत, जर जमीन आ जोरूओ से हाथ धोवे के पड़ेला। एह संदर्भ में निम्नलिखित पंक्तियन के महत्त्व समझल जा सकेला।

ना आवेला शांति सिर्फ
कइला भर से हथजोरी,

सबसे बड़ा देश के दुश्मन
ह आपन कमजोरी।।

वर्तमान समय पोथी-पुरान, भजन-प्रवचन, टीका-फाना, जप-जाप के नइखे। बिना आगा पीछा तकले बजरंग बली के हुंकार भरत ई त धहकत आग में कूदे के समय बा। कवि चेतवतो बा

रहीं हमेसा सावधान
चौकसी बराबर देत रहीं
तीर कमान रोज रोज फिर
कइले धरगर तेज रही ।।

आजादी बड़ा महंगा सउदा ह। एकरा के सस्ता में ना बेसाहल जा सके। एकर पुरहर मोल चुकावे के पड़ेला। एह से ‘समय के साँच’ के कवि अहदी-अलाय, भीरू-डरपोक आ बहानेबाजन के नजरअन्दाज करत आम नागरिक के नसीहत देत बा –

ऊ आपन गरमी ठंढावसु
तू भीतर के आग जलावऽ
भले राम के नाम जपसु ऊ
तू अपना के राम बनावऽ।

जबतक देश में भेद भाव ऊच्च-नीच, छल-कपट, ईर्ष्या द्वेष के जोर रही तबतक देश कमजोर रही;

जबतक घोर विषमता के
ई रही देश में खाईं
तब तक देश रही कमजोरे
ना कबहुँ बल पाई ।।

ईर्ष्या द्वेष कपट जबले ना
भीतर से सब भागी,
भारत के चेहरा तबतक ना
तनिको सुग्घर लागी ।।

ई इकइसवीं सदी में भी देश के हालात बीसवीं सदी के छठवाँ दशक से कवनो बेहतर नइखे। आजो साँच के आँच अंगेज नइखे होत।

गोहरावन, पीछा निरेखल,जबावदेही, ललकार, संकल्प आ कदम नामक छह अध्याय में विभाजित ई ‘समय के साँच’ दिनकर जी के परशुराम के प्रतीक्षा के अनुकृति भर नइखे बल्कि प्रस्तुति के ढंग के कारन रचनाकार के मूल कृति के स्वरूप ग्रहण कर लेले बा। हर रचना में रचनाकार के व्यक्तित्व झलकेला। ई प्रस्तुत रचना भी एह से अछूता नइखे। कवि के हर चीज के देखे के एगो आपन दृष्टिकोण बा। तद्नुसार भाषा शैली बा। कहे सुने के ढंग ढर्रा बा। पढ़े के एगो आपन टोन बा। कवि में जवन आत्मविश्वास बा, लगन निष्ठा बा, लोक कल्याण के भावना बा, ओकरा के नजर अन्दाज ना कइल जा सके। हमरा विचार से काव्य के मूल्यांकन के समय एह तत्त्वन के भी ध्यान राखल जरूरी बा।
अइसन रचना देला खातिर कविवर डा० के०डी० सिंह जी साधुवाद के पात्र बानीं। पर रचना तनि आउर रनाइल रहिती से, तनि आउर मलाइल रहती संत कुछ आउर चमक उभरल रहित। हम चाहबि कि एह बिमार समाज खातिर एह संग्रह के औषध के रूप में देखल जाव, जवन स्वाद में कड़वा कसैला होखलो पर स्वास्थ्य खातिर हितकर बा।
पुनश्चः
‘समय के साँच’ आ फिर भिड़ंत काहे’ ते निश्चित रूप से भोजपुरी में बीर रस संबंधी रचना के अभाव दूर होई।

रामायण सिंह
महाराणा प्रताप नगर, आरा

‘समय का सच’ का सच

हिन्दी और भोजपुरी के एक यशस्वी कवि डा०के०डी०सिंह अपनी मौलिक एवं अनूदित रचनाओं के माध्यम से अपने को स्थापित रचनाकार सिद्ध किया है। प्रायः मौलिक रचनाओं के परिप्रेक्ष्य में अनुदित रचनाओं को कम महत्त्व दिया जाता है, परन्तु साहित्य का इतिहास साक्षी है कि अनेक अनुवादित रचनाएँ मौलिक रूप में ही लोकप्रिय हुई हैं। खड़ी बोली भाषा के नाटककारों में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र शीर्ष पर हैं लेकिन सामान्य से लेकर प्रबुद्ध पाठकों के बीच उनका ‘सत्य हरिश्चन्द्र’ नाटक सर्वाधिक लोकप्रिय है। बहुत कम पाठक जानते हैं कि उक्त नाटक एक बंगला नाटक का अनुवाद है। विश्वकवि रवीन्द्र नाथ टैगोर की ‘गीताजंलि’ के अंग्रजी अनुवाद को ही नोबुल पुरस्कार मिला था। महाकवि तुलसीदास का ‘रामचरितमानस’ आदि कवि बाल्मीकि की ‘रामायण’ (संस्कृत) का अक्षरशः हू-ब-हू अनुवाद नहीं है, परन्तु स्वयं गोस्वामी तुलसीदास ने प्रत्यक्षतः और परोक्षतः ‘बाल्मीकि रामायण’ को आधार बनाया है और यह स्वीकार किया है कि उन्होंने ‘नाना पुराण निगमागम’ से भी कुछ-कुछ लिया है। हंस कुमार तिवारी ने बंगला के प्रख्यात कथाकार शरतचन्द्र, बंकिम चन्द्र, टैगोर आदि की प्रसिद्ध रचनाओं का खड़ी बोली हिन्दी में अनुवाद किया और तभी हिन्दी के पाठक अपने ही देश की इन कृतियों से परिचित हो सके। अन्तरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय स्तर पर आज भिन्न-भिन्न भाषा की रचनाओं के अनुवाद के माध्यम से ही पाठक वर्ग परिचित हो रहे हैं। यह साहित्य की आंतरिक विनिमय-योजना है। भाषाओं के माध्यम से ही विचारों, भावनाओं और संवेदनाओं का भूमंडलीय आदान-प्रदान हो रहा है। बंगला की प्रख्यात लेखिका तस्लिमा नसरीन, अंग्रेजी के भारतीय लेखक सलमान रूशदी और अरूंधति राय की रचनाएँ अनूदित होकर ही समादृत हुई हैं।
अनुवाद-कार्य कठिन कार्य है। जैसे आलोचना आज रचनात्मक साहित्य है और यह कोई सिद्ध आलोचक ही कर सकता है, इसी तरह अनुवाद किसी अन्य भाषा में न तो ‘ट्रान्सलेशन’ है और न ‘इमिटेशन’ है बल्कि यह रचनाकार की मौलिक क्षमता का परिचायक है। यूनान के प्रसिद्ध विचारक और दार्शनिक प्लेटो ने कहा था कि कला प्रकृति की अनुकृति है, किन्तु उनके शिष्य अरस्तू ने कहा कि कला प्रकृति की हू-ब-हू नकल नहीं है अपितु यह पुनसृजन है।
इस दृष्टि से डा०के०डी० सिंह ने भोजपुरी-साहित्य के लिए ऐतिहासिक कार्य किया है। आज भी भोजपुरी-भाषा बोली के रूप में ही परिगणित होती है जबकि बोलनेवालों की संख्या, क्षेत्र और साहित्य की दृष्टि से भारतीय भाषाओं में हिन्दी के बाद दूसरे स्थान पर है। क्या कारण है कि इसे संविधान की भाषागत आठवीं अनुसूचि में स्थान नहीं मिल रहा है। मुझे यह स्वीकार करते हुए किसी तरह का संकोच नहीं हो रहा है कि आजकल के हिन्दी और भोजपुरी के मठाधीश भी भोजपुरी का उत्स कबीर से ही ढूँढ़ते हैं। वे भुला जाते हैं कि भोजपुरी के शेक्सपीयर कवि और नाटककार स्व० भिखारी ठाकुर के समक्ष कितने हिन्दी के कवि और नाटककार खड़ा हो सकते हैं? विद्यापति को यही श्रेय प्राप्त है और हम सगर्व उन्हें हिन्दी के प्रथम गीतकार मानते हैं।
हिन्दी का साहित्यिक रूप हजार वर्ष के कालक्रम को पार कर चुका है। इसके खजाने में साहित्य मणियाँ छिपी हुई हैं, परन्तु भोजपुरी जो हिन्दी भाषा की ही बहन है उसे अभी अपने खजाने में ऐसे साहित्यरत्नों को भर लेना है जिससे भोजपुरी भाषाभाषी साहित्यिक अभिरूचियों को समृद्ध कर सकें। भोजपुर जनपद के असंख्य पाठक ज्ञानपीठ पुरस्कार से पुरस्कृत श्री रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की रचना ‘उर्वशी’ को नहीं जानते हैं और सर्वाधिक लोकप्रिय रचना ‘रश्मिरथी’ से परिचित नहीं हैं। ऐसे पाठकों के लिए डा०के०डी० सिंह ‘उर्वशी’ (दिलवासो) ‘रश्मिरथी’ (तपल करमजरू) के अनुवाद से स्तुत्य कार्य किया है।
राष्ट्रकवि दिनकर की ही ओजगुण संपन्न रचना ‘परशुराम की प्रतीक्षा है जिसका अनुवाद ‘समय का सच’ है।
‘समय का सच’ आज की शताब्दी की मनः स्थितियों, मानवीय कार्य-कलापों और सामयिक नव निर्मित मूल्यों के बीच से गुजरते हुए लोगों की महत्वाकांक्षाओं और संघर्षपूर्ण जीवन की त्रासदियों का विवरण है। किसी भी युग में हिंसा और युद्ध को महत्व नहीं दिया गया है, परन्तु स्वतंत्रता, अस्मिता, अधिकार और रक्षा तथा न्याय के लिए कभी-कभी यह आपद्धर्म बन जाता है। ‘दिनकर’ ने ‘महाभारत’ के संदर्भ में अपने महाकाव्य ‘कुरूक्षेत्र’ में युद्ध को धर्म नहीं बल्कि आपद्धर्म ही माना है। महात्मा गाँधी के प्रशंसक और भक्त ‘दिनकर’ ने चीनी आक्रमण के संदर्भ में गाँधीवाद से अधिक प्रतिकार के लिए युद्ध को आपद्धर्म सिद्ध किया है। इन्हीं दोनों रचनाओं के भावों को केन्द्र में रखकर कवि डा०के०डी० सिंह ने ‘समय का सच’ लिखा है, जो मात्र हिन्दी से भोजपुरी में अनुवाद नहीं है अपितु यह पुनसृजन है। इक्कीसवीं सदी के प्रथम दशक में जिस तरह आतंकवाद फैल गया है उससे बचने का क्या उपाय हो सकता है? भारत भौगोलिक दृष्टि से चतुर्दिक प्रतिगामी चौहद्दियों से घिरा हुआ है। बाह्य तथा आंतरिक प्रतिगामी शक्तियाँ हमारी एकता, अखंडता और सुरक्षा के लिए कटिबद्ध हैं। इन परिस्थितियों में हमें क्या करना चाहिए? विपत्तियों के चौराहे पर खड़ा होकर कवि किस ओर इंगित कर रहा है, इसे जानने के लिए न सिर्फ ‘कुरूक्षेत्र’ और न सिर्फ ‘परशुराम की प्रतीक्षा’ ही पठनीय हैं, बल्कि ‘समय का सच’ भी पठनीय है। ओजपूर्ण भावों और विचारों को व्यक्त करने के लिए जिस तरह की भोजपुरी भाषा चाहिए, उसका निर्वाह इस काव्य में हुआ है। सर्वत्र भाषिक प्रवाह है, वैचारिक मंथन है, बिम्बों के मूर्त रूप हैं और अर्थ की सम्प्रेषणीयता है। आने वाले समय में यह सर्वग्राह्य रचना होगी, ऐसी मेरी मान्यता है।

डॉ० दीनानाथ सिंह
कृतकार्य, स्नातकोत्तर हिन्दी
विभागाध्यक्ष एवं प्राचार्य
वीर कुँवर सिंह विश्वविद्यालय, आरा

 

कवनो देश के जब अन्य देश से सीमा प लड़ाई छिड़ जाला त ओह देश के लोगन में एगो भावात्मक एकता के राग फूटेला। आपसी मतभेद भूला के लोग दुश्मन देश के मुकाबला करे के आह्वान करेला। कवि रचनाकारो अपना रचनन से देश के शौर्य के जगावेला। आ उत्साह भरेला। तनी अतिरेक में जाये के परेला त ओकरो से परहेज ना करे। जवानी के खून हिलकोरा मारेला। देश खातिर बलिदान हो जाये के वीर भाव से लोग ओत-प्रोत हो जाला। ‘समय के साँचे’ में अइसन जोशिला कविता पढ़े के मिली। एह में अतीत जीविता प व्यंग्य बा। इतिहास से सीखे के चाहीं। इतिहास जान के वर्त्तमान सुधारल जा सकेला। युद्ध काल में ‘वीर भोग्या वसुंधरा’ के मंत्र पाठ के अपील बा। आजादी पर संकट के पृष्ठभूमि में एकरो प्रासंगिकता बा। ललकार खंड वीर रस से ओत प्रोत बा। कविता में आधुनिक प्रसंग बा। अंधविश्वास छोड़े के आग्रह बा। कविता के कठोर व्याकरण प यदि कविता नइखे कसा पावत, तबो घीव के लड्डू टेंढ़ो होई त मीठे लागी।

जितेन्द्र कुमार,मदन जी के हाता, आरा

 

साँच दू तरह के होला एगो समय के साथ चलल रहेला, एगो समय ‘के साथ बदलत रहेला। ‘परशुराम की प्रतीक्षा’ दिनकर चीनी आक्रमण के समय में लिखले रहन जब देश विजय से दूर होत जात रहे। तब ऊ देश के जगवले रहन। हालाँकि समय बदलला के साथ बहुत बदलाव आ गइल बा तबो दिनकर के बहुत सत्य समय के शिला प अंगद के पाँव के तरह खड़ा बा। आज भी देश प, संस्कृति प, भाषा प आक्रमण के कम संकट नइखे। बाहरी संकट के साथे आंतरिक संकट के जवन चर्चा दिनकर कइले बाड़न ऊ त बुझाता कि कम होखे के बदले आउर बढ़ले जात बा। अइसन समय में ‘समय के साँच’ प्रस्तुत क के रचनाकार देश हित में एगो महत्वपूर्ण काम कइले बाड़न। एकरा खातिर ऊ बधाई के पात्र बाड़न।

एगो आउर कहे के चाहत बानी कि ‘तपल करमजरू’ से ‘समय के साँच’ के यात्रा के रचनाकार के विकास यात्रा कहल जा सकेला। ‘तपल करमजरु’ के भाषा से ‘समय के साँच’ के भाषा में विकास भइल बा। एह विकास के साथ रचनाकार के सृजनात्मक विकास होत रहे इहे कामना के साथ।

डा० परशुराम सिंह

कुछ आपन बात

जब हम ‘तपल करमजरू’ के रचना करत रहीं जे कर्ण के चरित्र पर आधारित बा, ओह क्रम में डा० रण विजय कुमार जी सलाह देले रहीं कि ‘परशुराम की प्रतिक्षा’ आ ‘कुरूक्षेत्र’ के आधार बना के भोजपुरी में रचना आवे के चाहीं। रण विजय बाबू के बात से प्रोत्साहित भइलीं आ ओही के प्रतिफल स्वरूप ‘समय के साँच’ आ ‘फिर भिड़ंत काहे’ सामने आ सकल। आज जब देश के सोझा कारगिल युद्ध नजर आवत बा। संसद पर आक्रमण के दृश्य जेहन में छवले दूनो राष्ट्र के सेना आमने सामने सरहद पर दस महीना रहवो कइल तबहूँ सीमा पार से आतंकबाद रूके के नाम ना लेत बा। इहो सोचे के पड़त बा कि 11 सितम्बर के घटना के बाद पूरा राष्ट्र 2 मिनट के मौन रखले रहे बाकिर भारतीय संसद पर आक्रमण के विरोध में काहे ना मौन राखे के सरकारी ऐलान कइल गइल। सोची, जब अइसन परिस्थिति आई तब का समाधान सर्वधर्म प्रार्थना सभा आ अनासक्ति रहित यज्ञ कर के निकालल जा सकेला? हरगिज ना। कालिया नाग यमुना के जल में जहर फैलावत रहे कृष्ण के कालिया नाग के मान मर्दन करे पड़ल रहे। पूजा ना करे लागल रहन। आज बहुराष्ट्रीय कम्पनी कोल्ड ड्रींक में जहर घोल रहल बा। राष्ट्रीय बहस खूबे भइल, जाँच भी भइल। केहू बतावे का करे के चाहीं? जहर घोंटत रहे के चाहीं कि सुधार खातिर साकारात्मक बड़ा प्रतिरोध करे के चाहीं, आफत अइला पर आत्म रक्षार्थ, राष्ट्र के स्वाभिमान खातिर हथियार उठावही के पड़ेला। महाभारत आज भी जारी बा भूखमरी, गरीबी आ अमीरी के बीच संघर्ष हो रहल बा। राजनैतिक दल एक दूसरा पर घात-प्रतिघात करे से बाज नइखे आवत। सबके हाथ अनैतिकता में बोराइल बा। गरीबन के सवाल केहू उठा भी पाई शंका बा। काहे कि सवाल उठावे खातिर पैसा दीहीं त कहवाँ से? ई वर्ग त अपने अभाव में जिन्दगी जी रहल बा। समानता कइसे आई, विषमता कइसे दूर होई? एह सब सवाल के हल दूढ़े के प्रयास कइल गइल बा। कोशिश रहे के चाही कि शांति, अमन-चैन सबके तक पहुचे, बाकिर एह रास्ता में अगर केहूँ खलल पहुँचावे पर तुलला रहे त ओकर हाथ रोकहीं के पड़ी। एह रचना के भाषा के त्रुटि सुधारे में कवि रामायण सिंह जी आउर कवि साहित्यकार हीरा प्रसाद ठाकुर के काफी मदद मिलल। हम एह दुनों लोग के आभारी बानीं। रचना समालोचक जितेन्द्र कुमार जी, कथाकार राम निहाल गुंजन जी, शिक्षक डा० ओम प्रकाश सिन्हा जी, महान साहित्कार डा० दीनानाथ सिंह जी आउर डा० परशुराम सिंह जी के नजर से गुजर चुकल बा। कुछ हद तक ई महान लोगन के सुझाव के समाहित भी कइल गइल बा। आभारी बानी एह सबके प्रति।
युद्ध आ युद्ध बाद के चिन्तन मिलल-जुलल रूप एह रचना में बा। पहिल खंड ‘समय के साँच’ आ दुसरा खंड ‘फिर भिडंत काहे’। चूंकि एके चीज से मतलब राखल बा एह से दुनों के एक जगह जवरिया दिहल गइल बा। रचना के नाम के प्रति ढेरो सुझाव मिलल बाकिर हमरा इहे नाम ज्यादा जँचल।
एकर भाव यद्यपि ‘परशुराम की प्रतिक्षा’ आ ‘कुरूक्षेत्र’ से लिहल बा बाकिर देश-काल के अनुसार तद् विषयक ढेरो भाव एह में समावेश भइल बा आ कुछ नया रूप लेले उभर के आइल बा। पूरा प्रयास के बाद भी भाषागत गलती के संभावना के इनकार नइखे कइल जा सकत।
एकर इहो उद्देश्य बा कि एह विषय के बुद्धिजीवी आ पुस्तकालय के बाहर जवन हवा बा खेत-खलिहान, आर-पगार, चरवाहा-हलवाहा, कम पढ़ल लिखल लोग उनका पास तक पहुँचावल जाय। एह से कोशिश बा कि ओही लोग के बोली भाषा में पहुँचे।
ई रचना पाठक गण के हाथ में जा रहल बा। भोजपुरी में बीर रस के रचना के कमी के प्रस्तुत रचना केतना पूरा कर पाई ई त पाठकगण ही बता पड़हें।

सब लोगन के नमन आ नव वर्ष 2006 के मंगल कामना के साथ।

राउर आपन
डा०के०डी०सिंह
2-1-2006
रचनाकार:डॉ कृष्ण दयाल सिंह
(लेखक वर्तमान में आरा के वरिष्ठपुरी में निवास करते है,संपर्क:9570805395)

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