अंतरिक्ष की कल्पना
ठनले बाड़ी मन में सपनवा बेटी, चाँद तरेगनवो से उपर जाइब।
कवन कवन राज छीपवले ग्रह बाड़न, सब खोज के खबरवा ले आइब।
ऊँच अरमान बा, ऊँचा अभिलाषावा, जाये के त जइबे करब ठनले बानी जँहवा।
हवा से तेज, गर्जनवो से तेज चलब, लागल बा पांख, हम किरीणीयों के मात करब।
चढ़ के चलनी शटल कोलंबिया, जल्दी लौट के आइब, चालिस उपर उमर से का, सोलहे दिन में आइब।
भारत के झंडा अंतरिक्ष ले जाकर फहराइब, घर भारत करनाल, सोच कतना ऊँचा ले जाइब।
नियति से जुझत ही रहब, खुबे जोर लगाइब, आपन अभियान खातीर, बाजी जान के लगाइब।
शेष ना भेटाइल, अवशेष धरती पर छींटकाइल, पंद्रह मिनट के आयु घटल, काल पहिलहीं आइल।
बाजे लागल मातमी धुन, सबके कान झनझनाइल, तेजी मिलिहें ‘कल्पना’ के जहाँ-जहाँ उनकर राख छींटाइल ।
अमर रहो भारत की बेटी, अमर रहो जग श्रेष्टी, मर कर भी तू धन्य हो बेटी, अमर रहो जग श्रेष्टी।
तू नहीं कल्पना चावला हो, तू अंतरिक्ष की कल्पना हो, हर ऊँचे से ऊँची तू, हर दिल की तो तू बस सपना हो।


