
आरा/भोजपुर( अतुल प्रकाश)26 मई। भोजपुरी समाज की मौखिक परंपरा का एक समृद्ध हिस्सा हैं, जो पीढ़ियों से चली आ रही हैं। कृष्णदेव उपाध्याय और अन्य विद्वानों के अनुसार, भोजपुरी लोककथाओं को मुख्य रूप से 6 भागों में बाँटा जा सकता है:
1. उपदेशात्मक कथा :* इन कथाओं का उद्देश्य लोगों को नैतिकता, नीति, और सही-गलत का ज्ञान देना होता है।इनमें अक्सर पशु-पक्षियों के माध्यम से या राजा-रानी के किस्सों के द्वारा बुद्धिमत्ता की सीख दी जाती है।
2. *व्रत कथा*- ये कथाएँ भोजपुरी समाज में मनाए जाने वाले विभिन्न व्रतों (जैसे- छठ पूजा, जितिया, तीज, आदि) से संबंधित होती हैं.इनका उद्देश्य धार्मिक आस्था को जगाना और पूजा की विधि बताना होता है।
3. *प्रेम कथा :* ये कथाएँ प्रेम, विरह, और त्याग पर आधारित होती हैं।उदाहरण: सोरठी, बिहुला, और शोभा नायका बंनजारा की प्रेम कहानियाँ बहुत प्रसिद्ध हैं
4. *मनोरंजन कथा*: इनका उद्देश्य केवल मनोरंजन करना होता है। इनमें भूत-प्रेत, परी, जादू और अजीबोगरीब घटनाओं का ज़िक्र होता है.ये कथाएँ बच्चों और बुजुर्गों में समान रूप से लोकप्रिय हैं।
5. *सामाजिक कथाएँ :* ये कथाएँ ग्रामीण जीवन, परिवार के रिश्ते (जैसे- सास-बहू), और समाज की कुरीतियों पर आधारित होती हैं.इनमें सामाजिक मर्यादाओं और पारिवारिक संघर्षों को दिखाया जाता है।
6. *पौराणिक कथा :* ये कथाएँ देवी-देवताओं, अवतारों, और प्राचीन राजाओं से संबंधित होती हैं.ये कथाएँ हमारी सांस्कृतिक विरासत को पीढ़ी दर पीढ़ी पहुँचाती हैं।इसके अलावा, कुछ विद्वान डॉ. परमेश्वर दूबे के अनुसार आर्थिक और राजनीतिक कथाओं को भी इसमें शामिल करते हैं, जो उस समय के आर्थिक (जैसे- खेती) और राजनीतिक जीवन को दर्शाती है।
*लोकगाथा -* प्रमुख गाथाओं का संक्षिप्त विवरण – *सोरठी*- यह एक प्रेमगाथा है। *नायका बंनजारा* भारतीय बनजारों के जीवन से संबंधित यह प्रेमकथा बड़ी ही प्रभावोत्पादक है।
भोजपुरी कथाएँ
मध्यप्रदेश जनजातीय संग्रहालय, भोपालकृष्णदेव उपाध्याय ने ‘लोक – साहित्य की भूमिका’ में भोजपुरी. लोककथाओं को आधार बनाकर लोककथा को छह भागों में बाँटा है-. उपदेशात्मक कथा, व्रतकथा, प्रेमकथा, मनोरंजन …जनजातीय संग्रहालय लोककथा।
लोककथाओं के भेद
उपदेशात्मक कथाएँ हिंदी की अनेक छोटी बड़ी कथाओं में मानव कल्याण के लिए विभिन्न प्रकार के उपदेश भरे पड़े हैं। ‘पूर्वी उत्तर प्रदेश की भोजपुरी लोककथाओं का सामाजिक अध्ययन’ शीर्षक शोध-ग्रंथ में डॉ परमेश्वर दूबे ‘शाहाबादी’ भोजपुरी लोककथा के वर्गीकरन एह किसिम से कइले
लोकगाथा एवं कथाएं
इन लोक कथाओं का उद्देश्य यह है कि कैसे पौराणिक कथाओं के जरिए. लोगों के बीच एकता, आपसी प्रेम, भाईचारे और सक्षम होने का ज्ञान दिया जाता है । इनकी पहचान यही है कि भोजपुरी लोकगाथा लोकसाहित्य वह लोकरंजनी साहित्य है जो सर्वसाधारण समाज की. मौखिक रूप में भावमय अभिव्यक्ति करता है। सृष्टि के विकास के साथ ही लोकसाहित्य का उद्भव माना गया है। इन कथाओं में, सामाजिक, मनोरंजक नीति एवं उपदेश संबंधी, धार्मिक व्रत आदि की कथाएँ, पशु पक्षियों से संबंधित कथाएँ, प्रेम कथाएँ एवं पौराणिक कथाएँ शामिल हैं।
आज लोक कथाओं की स्थिति
1. लुप्त हो रही हैं
टीवी, मोबाइल के दौर में चौपाल टूटी। बुजुर्ग सुनाने में संकोच करते हैं। नई पीढ़ी तक पहुँची नहीं।
2. संग्रह की समस्या
शोधकर्ताओं को रिकॉर्ड करने में दिक्कत होती है क्योंकि लोग सार्वजनिक रूप से सुनाने से कतराते हैं। इस कारण लिखित रूप में बहुत कम मिलती हैं।
3. लोकगीत में बची हैं
कजरी, बिरहा, जंतसार की कुछ कड़ियों में वही दोअर्थी शृंगार मिल जाता है। जैसे “खेत में चना बोआई ले…” जैसी पंक्तियाँ।
5. महत्वपूर्ण बात
लोकसाहित्य समाज का दर्पण है। उसमें भक्ति भी है और शृंगार भी अश्लीलता सहित विद्यमान है। इन कथाओं का अध्ययन करने से पता चलता है कि गाँव का आदमी वर्जनाओं से कैसे निपटता था। इन्हें “अश्लील” कहकर खारिज करना उतना ही गलत है जितना इन्हें बच्चों के सामने परोसना।
*नोट*: ये कथाएँ वयस्क श्रोता समूह के लिए थीं। इनका सार्वजनिक मंचन या प्रकाशन आज भी सामाजिक मर्यादा के अनुसार तय होता है।
अगर आपको शोध के लिए अकादमिक संदर्भ चाहिए तो कृष्णदेव उपाध्याय की ‘भोजपुरी लोक-साहित्य का अध्ययन’ और विद्या निवास मिश्र के लोक साहित्य संबंधी लेख देख सकते हैं।
