
आरा/भोजपुर (डॉ दिनेश प्रसाद सिन्हा)25 मई।ईद-उल-अजहा (बकरीद) इस्लाम धर्म का एक महत्वपूर्ण और पवित्र त्योहार है, जो त्याग, समर्पण, इंसानियत और भाईचारे का संदेश देता है।
सामाजिक कार्यकर्ता और रेड क्रॉस के उप संरक्षक सरफराज अहमद ने बकरीद शुभकामना दी। इन्होंने बताया की यह पर्व पैगंबर इब्राहिम और उनके पुत्र इस्माइल की अल्लाह के प्रति अटूट आस्था, निष्ठा और कुर्बानी की अमर याद दिलाता है। यह हमें सिखाता है कि ईश्वर की राह में अपनी सबसे प्रिय वस्तु का भी त्याग करने से पीछे नहीं हटना चाहिए।
इसका मुख्य संदेश निस्वार्थ प्रेम और त्याग का है। इसमें दी जाने वाली कुर्बानी केवल पशु बलि तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका वास्तविक उद्देश्य अपने अंदर के अहंकार, लालच, स्वार्थ और बुरी आदतों का त्याग करना है। कुर्बानी के गोश्त को तीन हिस्सों में – एक हिस्सा परिवार, दूसरा रिश्तेदारों और मित्रों तथा तीसरा हिस्सा गरीबों और जरूरतमंदों को वितरित होता है।यह परंपरा समाज में समानता, दान-पुण्य और जरूरतमंदों की सहायता करने की भावना को मजबूत करती है। इसी पवित्र महीने में हज यात्रा भी संपन्न होती है। इस्लाम धर्म के पांच प्रमुख स्तंभों में शामिल हज का मुख्य संदेश अल्लाह के प्रति पूर्ण समर्पण, मानव समानता, विनम्रता और वैश्विक भाईचारा है।
हज के दौरान सभी तीर्थयात्री एक जैसा सफेद साधारण वस्त्र (एहराम) धारण करते हैं, जो अमीर-गरीब, राजा-रंक और ऊँच-नीच के भेदभाव को समाप्त कर मानव समानता का संदेश देता है।हज की रस्मों में शैतान को पत्थर मारने की प्रक्रिया (जमारात) बुराइयों, अहंकार और नकारात्मक प्रवृत्तियों को त्यागने का प्रतीक मानी जाती है। यह यात्रा व्यक्ति को आत्मिक शुद्धि, आत्मचिंतन और नई नेक जिंदगी शुरू करने की प्रेरणा देती है।दुनिया भर से लाखों मुसलमानों का एक स्थान पर एकत्र होना वैश्विक भाईचारे, एकता और प्रेम का अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत करता है। ईद-उल-अजहा और हज दोनों ही मानवता, त्याग, सेवा और सामाजिक सद्भाव के ऐसे संदेश हैं, जो सम्पूर्ण विश्व को शांति और प्रेम की राह दिखाते हैं।
