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भोपाल:जब तक समाज का विद्रूपताओं से सामना होता रहेगा, व्यंग्य लेखक समाज को आईना दिखाता रहेगा : कांति शुक्ला “उर्मि

RKTV NEWS/भोपाल (मध्यप्रदेश) 09 जनवरी।भोपाल में लघुकथा शोधकेंद्र भोपाल के “पुस्तक पखवाड़ा अष्टम सत्र” द्वारा आयोजित किए जा रहे “आनलाइन पुस्तक पखवाड़ा” में देश विदेश से बड़ी संख्या में शामिल हो रहे साहित्यकारों के बीच ये उद्गार अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में व्यक्त किए देश की सुप्रसिद्ध साहित्यकार कांति शुक्ला उर्मि ने किये।इस कार्यक्रम का आरंभ घनश्याम मैथिल के स्वागत भाषण से हुआ। कार्यक्रम का सफल संचालन वरिष्ठ साहित्यकार गोकुल सोनी द्वारा किया गया।
इस क्रम में कार्यक्रम में डॉ गिरजेश सक्सेना की तीन कृतियों तीसरा तांडव, तुणीर और पतझड़ के फूल पर क्रमश: समीक्षकों, कनाडा की साहित्यकार चित्रा राणा राघव, भोपाल से राजेंद्र गट्टानी एवं शैफालिका श्रीवास्तव ने विस्तृत चर्चा की।
चित्रा राणा राघव ने अपने विश्लेषण में कहा कि तीसरा तांडव की लघुकथाएं गिरिजेश सक्सेना के जीवन अनुभवों से बुनी गई लघुकथाएं हैं, जो सत्ता और समाज की विषमताओं को सामने लाती हैं। राजेंद्र गट्टानी ने तुणीर की कविताओं पर अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि “ए सी” में बैठकर आम आदमी के दर्द पर नहीं लिखा जा सकता, श्री सक्सेना की कविताएं इसी ओर इशारा करती हैं। शैफालिका श्रीवास्तव का विचार था कि सक्सेना जी की कविताओं में जीवन के भोगे हुए यथार्थ का कारुणिक चित्रण है। चेन्नई से प्रो. बी एल आच्छा ने विशेष टिप्पणी में कहा कि “अच्छा लगता है जब कोई साहित्यकार अभी तक जो लिखा गया है, उससे आगे की बात करता है।” नागपुर से विशेष टिप्पणी देते हुए प्रो. मिथिलेश अवस्थी का कथन था कि लघुकथा शोध केंद्र द्वारा आयोजित इस महत्वपूर्ण आयोजन से पुस्तक पठन पाठन संस्कृति को तो बढ़ावा मिल ही रहा है साथ ही कुशल समीक्षक निकल कर सामने आ रहे हैं।
संचालन करते हुए गोकुल सोनी ने कहा कि डॉ गिरजेश सक्सेना की मार्मिक कविताएं “मन की आहत मरुभूमि से” जबकि व्यंग्य लघुकथाएं “समाज की विषमताओं से” जन्मी हैं।
अपनी रचना प्रक्रिया पर प्रकाश डालते हुए डॉ सक्सेना ने कहा कि जीवन ने मुझे जो फूल और कांटे दिए हैं, उन्हीं की भावाभिव्यक्ति है मेरी कविताएं और लघुकथाएं।
लघुकथा शोध केंद्र की अध्यक्ष कांता राय ने कहा कि देश और विदेश से बड़ी संख्या में विद्वानों का पुस्तक परिचर्चा में शामिल होना, पुस्तक पखवाड़े की सार्थकता सिद्ध करता है।
अंत में लघुकथाकार सरिता बाघेला ने सभी उपस्थित साहित्य प्रेमियों का आभार व्यक्त किया।

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