हनुमानगढ़/राजस्थान 08 नवम्बर। धान की पराली जलाने से हमारे वातावरण पर प्रतिकुल प्रभाव पड़ता है इसलिए फसलों के अवशेषों का प्रबंधन किया जाना आवश्यक है । जिले में इस वर्ष लगभग 35 हजार हेक्टर क्षेत्र में धान की फसल से लगभग 22 लाख क्विटल पराली का उत्पादन होने का अनुमान है। अगर पराली को जलाया जाता है तो ना केवल वातावरण प्रदूषित होता है बल्कि मानवीय अस्तित्व पर अनेकों दुष्प्रभाव है धान की पराली जलाने के नुकसान- कृषि विस्तार संयुक्त निदेशक डॉ. रमेश चंद्र बराला ने बताया कि धान की पराली व अन्य फसल अवशेष जलाने से जमीन की उर्वरा शक्ति कम हो जाती है तथा भूमि में मौजूद लाभकारी सूक्ष्म जीव नष्ट हो जाते हैं। धान की 10 क्विंटल पराली जलाने से 5.5 किग्रा नाईट्रोजन, 2.3 किग्रा फॉसफोरस, 25 किग्रा पोटास, 1.2 किग्रा सल्फर प्रमुख पोषक तत्व तथा 400 किग्रा जैविक कार्बन एवं सूक्ष्म पोषक तत्व भी नष्ट हो जाते है । फसल अवशेष जलाने से कार्बनडाई ऑक्साईड, मिथेन, कार्बन मोनो ऑक्साईड, नाइट्रस ऑक्साईड एंव सल्फर ऑक्साईड जैसी घातक गैसे निकलती है जिससे हवा की गुणवत्ता खराब होती है तथा पर्यावरण प्रदूषित होता है।
प्रदूषित पर्यावरण के कारण मनुष्यों में श्वास संबंधी बीमारियाँ बढ़ रही हैं। इससे न केवल मानव जाति परन्तु पशुओं के स्वास्थ्य को भी नुकसान होता है। धान की पराली जलाने से निकलने वाले धुएं के कारण यातायात में भी बाधा उत्पन्न होती है. जिसके कारण सड़क दुर्घटनाओं में व्यक्तियों की मृत्यु तक हो जाती है।
इस प्रकार से करें पराली का प्रबंधन
संयुक्त निदेशक डॉ. रमेश चंद्र बराला ने बताया कि पराली के प्रबंधन के तौर पर चौपर मशीन, बैलर, बायोगेंस संयंत्र मशरूम उत्पादन, कम्पोस्ट खाद, पशुचारा एवं बिछावन और खेत में मल्चिंग में उपयोग किया जा सकता है ।
चौपर मशीन :- धान की पराली के टुकड़े करने हेतु चौपर मशीन ईजाद की गई हैं, जो बाजार में उपलब्ध हैं। इस मशीन के उपयोग से पराली के छोटे-छोटे टुकड़े हो जाते है, उसके बाद रोटावेटर से जुताई करके जीरो टिलेज मशीन से आसानी से गेहूं की बिजाई की जा सकती है। हैप्पी सीडर मशीन से बुआई करने की स्थिति में तो रोटावेटर से जुताई करने की भी आवश्यकता नहीं पड़ती है।
बैलरः- इस मशीन के द्वारा पराली की चौकोर गाँठे बनाई जाती है। इन गाँठे का उपयोग कार्ड बोर्ड बनाने वाली फैक्ट्री, पैकेजिंग फैक्ट्री, पशु चारे के रूप में तथा बिजली पैदा करने वाली ईकाईयों में किया जा सकता है।
बायोगेंस संयंत्र:- कृषि अनुसंधान के उपरान्त यह साबित हुआ है कि धान की 12 क्विटल पराली में 4 क्विटल गाय का गोबर मिलाकर गोबर गैस संयंत्र से लगभग 4 से 5 घनमीटर प्रतिदिन गैस उत्पन्न की जा सकती है, जो कि घरेलू कार्यो हेतू तीन माह तक उपयोग ली जा सकती है।
मशरूम उत्पादन:- मशरूम उत्पादन में अधिकतर गेहूँ की तूड़ी का उपयोग किया जाता है, परन्तु इस हेतु धान की पराली का भी उपयोग किया जा सकता है।
कम्पोस्ट खाद: पंजाब कृषि विश्वविद्यालय ने धान की पराली से कम्पोस्ट खाद बनाने की विधि इजाद की है, कम्पोस्ट खाद तैयार करने हेतु 15 किग्रा पराली, 1 किग्रा गोबर एवं 1000 लीटर पानी को मिलाकर टैंक में रख लिया जाता है। फिर इस टैंक से पराली बाहर निकालकर पॉलिथीन की सीट पर रख देते है। 5 मीटर लम्बी, 1.5 मीटर चौड़ी तथा 6 इंच ऊँची नरमे की बनसटियों द्वारा एक बैड बनाई जाती है, जिसके ऊपर धान की पराली रख दी जाती है। इस पराली पर 6 प्रतिशत रॉक फॉस्फेट का स्प्रे किया जाता है। उसके बाद 20 से 30 सेटीमीटर मोटी सूखी पराली की परत लगाई जाती है। 80 से 90 दिन में कम्पोस्ट खाद बनकर तैयार हो जाती है।
पशुचारा एवं बिछावन :- कुतर काटकर पशुओं को चारे के रूप में तथा पशुओं के नीचे बिछावन के रूप में धान की पराली का उपयोग किया जा सकता है। इसमें मिनरल मिक्चर इत्यादि के साथ मिलाकर अच्छी गुणवत्ता का चारा बनाया जा सकता है। इससे न केवल चारे की पूर्ति होगी बल्कि इसके उपयोग से गौशालाओं में वृहद स्तर पर चारे की कमी पूर्ति हो सकती है।
खेत में मल्चिंग :- धान की पराली नमी संरक्षण एवं भूमि का तापक्रम बनाए रखने में बहुत ही उपयोगी सिद्ध हुई है। इसके साथ-साथ मल्च के रूप में उपयोग करने से न केवल पानी की बचत होती है बल्कि खरपतवार नियंत्रण भी बहुत अच्छा होता है।
पराली जलाने पर 15 हजार जुर्माना राशि का प्रावधान
पर्यावरण विभाग राजस्थान सरकार द्वारा जारी नोटिफिकेशन अनुसार सेक्सन 19 (5) वायु (प्रिवेन्शन एण्ड कन्ट्रोल ऑफ पॉल्युशन) एक्ट 1981 के द्वारा फसल अवशेष जलाने पर पूर्णतया रोक लगाई गयी है। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल बोर्ड, नई दिल्ली के द्वारा जारी निर्देश द्वारा फसल अवशेष जलाने पर दो एकड़ क्षेत्रफल तक 2500 रूपए, 2 से 5 एकड़ क्षेत्रफल तक 5 हजार रुपए तथा 5 एकड़ से अधिक क्षेत्रफल कि फसल अवशेष जलाने पर 15 हजार रूपए पर्यावरण क्षति पूर्ति के रूप में जुर्माना लगाने का प्रावधान है।

