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धर्मों पर राजनीति करने के बजाए उनकी कड़ी बने ‘सफेद रंग’,तब ही मिलेगी भारत माता और उनके वीर सपूतों को सच्ची श्रद्धांजलि।

अतुल मलिकराम (लेखक और राजनीतिक रणनीतिकार) 30 अक्टूबर ।धर्मों पर राजनीति करने के बजाए उनकी कड़ी बने ‘सफेद रंग’,तब ही मिलेगी भारत माता और उनके वीर सपूतों को सच्ची श्रद्धांजलि।भारत देश विभिन्न संस्कृतियों की बेशकीमती पहचान के रूप में दुनिया में अपना एक अलग मान रखता है। देश सतत रूप से आगे बढ़ता रहे, इसके लिए देशवासियों को चाहिए कि न सिर्फ सामाजिक, बल्कि धार्मिक सौहार्द्र बनाए रखने और हर संभव प्रयास करने का भी प्रण ले। लेकिन इस बात से भी किनारा नहीं किया जा सकता कि भारत में सौहार्द्र की भावना बनाए रखने में नेताओं की भूमिका सबसे अहम् है। यह इसलिए, क्योंकि देश के नेता कहीं न कहीं एक ऐसा माध्यम हैं, जो प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से देश के विभिन्न हिस्सों को एक कड़ी से जोड़ने का काम करते हैं।
तिरंगे का हर एक रंग, चाहे वह केसरिया हो, हरा हो, नीला हो या फिर सफेद, किसी न किसी धर्म का प्रतीक है। यदि बात करें सफेद रंग की, तो इसका कार्य है शांति बनाए रखने का। अन्य रंगों के बीच में यदि सफेद रंग को स्थान दिया गया है, तो इनमें आपसी मतभेद कराने के लिए नहीं, बल्कि दोनों के बीच एकता बनाए रखने के लिए। यहाँ सफेद रंग से आशय देश के उन नेताओं से हैं, जो जनता को एकसूत्र में बाँधने के लिए जाने जाते हैं। तमाम नेताओं से यही अनुरोध है कि इस स्वतंत्रता दिवस वे भी प्रण लें कि वे देश में धर्मों की लड़ाइयों को विराम देने और देश में भाईचारा बनाए रखने में योगदान देंगे।
सच्चे नेता का यही दायित्व है कि वह दो धर्मों के बीच तेजी से बढ़ती दूरियों को कम करने का काम करे। वह केसरिया, नीले और हरे रंग के बीच की कड़ी बने, न की दीवार। साथ ही, वे यह संकल्प लें कि किसी भी पार्टी विशेष को देश की पार्टी के रूप में जगह देकर सिर्फ देश की भलाई के लिए काम करेंगे और यह भी ध्यान रखेंगे कि पार्टियाँ किसी एक ही धर्म विशेष के लिए न पहचानी जाएँ।
नेता वह माध्यम है, जो जनता को एक सूत्र में बाँधे रखने का काम करता है, जिसके मार्गदर्शन में देश फलता-फूलता है। नेता का अर्थ यह कतई नहीं है कि दो धर्मों के बीच की दीवार बनकर उनमें बैर बढ़ाने का काम करे। हालात तो ये हैं कि अब पार्टियाँ भी धर्मों की होने लगी हैं। और फिर एक-दूसरे की कट्टर दुश्मन होना तो तय ही है, क्योंकि धर्म की आड़ में जो राजनीति कर रही हैं। इसका सबसे बड़ा दुष्परिणाम यह है कि ऐसे में धर्मों के बीच की लड़ाइयाँ खतरनाक रुख ले लेती हैं, जो कि आज के समय में सच में देखने में आ ही रहा है।
भारत की असली दौलत सामाजिक और धार्मिक सौहार्द्र है। बेशक देश खूब तरक्की कर रहा है, लेकिन धर्मों के बीच बढ़ती दूरियाँ कहीं न कहीं हमें अँधेरे गर्त में ले जाने का काम कर रही हैं। देश के मौजूदा हालातों को देखते हुए इस बात पर ध्यान देने की बहुत ज्यादा जरुरत है कि झंडे में तीनों ही रंगों का महत्व एक समान है, क्योंकि धर्मों के बीच राजनीति की चिंगारी काफी गरमाने लगी है। देशवासियों को चाहिए कि वे ‘विभिन्न समाज’, ‘अलग धर्म’ और ‘अलग राज्य’ के बजाए ‘कई धर्मों वाला एक देश’ के मान को बनाए रखने में योगदान दें। सच्चे देशवासी होने के नाते हम सभी का कर्तव्य है कि देश में सामाजिक एवं धार्मिक सौहार्द्र को खोखला होने से रोकें और इसे मजबूत बनाएँ।
हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि भारत के स्वतंत्रता संग्राम में देश के हर वर्ग और हर धर्म के लोगों ने मिल-जुलकर देश की आजादी के लिए लंबा संघर्ष किया था, जो कि सामाजिक सौहार्द्र की एक मजबूत मिसाल है। भारत में सभी धर्मों के लोग लम्बे अरसे से रहते आ रहे हैं। सभी को चाहिए कि वे एक-दूसरे की भावनाओं को समझते हुए सामाजिक सौहार्द्र के साथ मिल-जुलकर रहें, यही भारत माता और उनके वीर शहीदों को इस स्वतंत्रता की सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

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