RK TV News
खबरें
Breaking Newsसमाजिक

आखिर आत्म हत्याएँ क्यों?

RKTV NEWS/अजय गुप्ता अज्ञानी 15 अक्टूबर।“शिक्षण एक उत्कृष्ट कर्म है विद्यालय एक मंदिर शिक्षक हमारे भगवान व बच्चे/बच्चियाँ प्रसाद समान है इनकी पवित्रता बनी रहनी चाहिए और हम सब कि यह सामुहिक जिम्मेवारी है।”
इन नौनिहालो में कितने भाभा कितने न्यूटन कितने आईंस्टाईन छुपे है हम बड़े बुजुर्गो व सरकारो का काम है कि इन्हें तराश कर बेशकीमती नगीने बना दे इसलिए इन विद्यार्थो के मार्ग में आने वाले बधाओ को चून-चून कर हटाना हमारा कर्तव्य है।
आज हमारा देश स्तब्ध है कोटा में होने वाले विद्यार्थियो के *एक के बाद एक आत्महत्या वाली कदम उठाने से* क्यों हमारे बच्चे जीवन के सबेरा में ही चीरनिद्रा में सो रहे है। कारण क्या है कारण तो तलाशना होगा।
आज कोटा आत्म हत्या का पर्याय बनता जा रहा है कारण क्या है? जहाँ देश भर से बच्चे/बच्चियाँ अपना भविष्य निर्माण व माँ-बाप के सपने साकार करने तो जाते है मगर बच्चो में से कई ऐसे होते है जो अपना जीवन ही हार जाते है। और कुछ दें जाते है तो माँ-बाप के लिए जीवन भर के लिए कोई टिसता आँसू और मन में खूद के द्वारा की हुई एक गुनाह भावना। ऐसे बच्चे जो जीवन बनाने के लिए जाते है मगर जीवन ही हार जाते है ऐसी भावनाएँ बच्चो में उत्पन्न हो जाना ठीक नहीं। कई बार ऐसा हो जाता है कि माँ-बाप का इकलौता बच्चा था वो भी जीवन का बाजी हार गया ऐसे माँ-बाप तो बिल्कुल ही निढ़ाल हो जाते है।

सौ. सोशल मीडिया

ऐसे दारुण स्थिती से कैसे निपटा जाए इस पर विचार होना ही चाहिए क्योंकि ऐसी मानसिकता डेवलप होना समाज और देश के लिए ठीक नहीं ऐसी जटिल होती समस्याओ पर बिचार मंथन जरूरी है। मेरा मन में कुछ बिचार आया जिसे कलमबद्ध किया और ईसे साझा करना समाज हित व राष्ट्रहित में जरूरी समझता हूँ। ऐसी समस्याओ से बचने के लिए माँ-बाप, इंस्टीटयूशनस और सरकार को सामुहिक रुप से बिचार करना चाहिए नहीं तो *आत्म हत्याएं कृत्रिम महामारी बन जायेगी जहाँ जीवन बोझील और मौत सुगम लगने लगेगी।* हम कुछ कारणो पर बिचार कर सकते है जो कोटा मे विद्यार्थियो के लिए आत्म हत्या का कारण बन रहे है और एक साहित्यकार होने के नाते डरने लगा हूँ कि कहीं यह हमारी संस्कृति ना बन जाए क्योंकि हमारा समाज जल्दी-जल्दी में सब कुछ चाहने लगा है और हमारा संयम व दृढ़ता कमजोर होती जा रही है। गुस्सा व डिप्रेशन बढ़ता जा रहा है सही मार्गदर्शक का घोर अभाव है। और हारना जीवन का अंत समझा जाने लगा है ऐसे में इस जटिल समस्या से बचने के लिए कुछ बिन्दुओ पर बिचार किया जा सकता है।

सौ. सोशल मीडिया

प्राइवेट कोचिंग संस्थान एक व्यवसायिक संस्थान बन कर रह गया है जिसका उद्देश्य शिक्षा बेचना व पैसा कमाना मात्र रह गया है। इसमें ईमानदारी व संवेदनाओ का घोर अभाव है। यहाँ गुरु व शिष्य वाली आत्मीयता का कोई जगह नहीं केवल पैसा कमाना मुख्य उद्देश्य है।
कोटा के इंस्टीयूटों का पढ़ाने का तरिका:- चूँकि कोटा मेडिकल और इंजीनियरिंग का सर्वाधिक रिजल्ट देनेवाला इंस्टीटयूशन में सुमार हो चुका है। इसीलिए नीट व इंजिनियरिंग क्षेत्र के बच्चे/बच्चायों का पहली पसंद कोटा है। जब हम पढ़ाई की बात करते है तो सिलेबस पर पहले विचार करना चाहिए। चूँकि देशभर से जहाँ तकरीबन बीस लाख बच्चे परीक्षा में बैठते है और ऐसे बच्चे जो पढ़ने में बारूदी ज्ञान रखते है उनको छाटना व और उपलब्ध सिटो के दायरे में बच्चो को लाना NTA, JEE और अन्य इंजिनियरिंग व मेडिकल का कम्बाईन परीक्षा लेने वाले संस्थाओ के लिए भी इक समस्या होती जा रही है। कि इन बच्चो की संख्या कैसे कम कर के उपलब्ध सिटो के दायरे में लाए इसलिए यें संस्थाएं सरल प्रश्न को भी ऐसे टियूस्ट कर पूछते है कि हिन्दी प्रदेश के बच्चें सही से समझ ही नहीं पाते व आंसर नेगेटिव होने के डर से प्रश्नो को छोड़ देते है जबकि उसका सही आंसर वो जानते है। परीक्षा समाप्ती के बाद वो जब उन्हें महसूस होता है कि मैं सही प्रश्न को भी छोड़ दिया और आपेक्षित मार्क्स परीक्षा में नहीं आ रहा है तो वो डिप्रेशन में चले जाते है।

सौ. सोशल मीडिया

ऐसी बातों को किसी से वो शेयर नहीं करते खुद में घुटते रहते है। उपर से कोटा में पढ़ाई का खर्च होस्टल की चार्ज माँ-बाप व खूद के टूटते सपने व माँ-बाप द्वारा लिए हुए कर्ज बोध जो आगे चल कर जान लेवा बन जाता है। और डिप्रेशन आत्म हत्या के तरफ नाजुक मन को मोड़ देता है। चूँकि बच्चे प्रेम स्नेह मीठे बोल दोस्त साथी से दूर रहते है शिक्षक से कोई आत्मीयता नहीं वहाँ कोई आपना नहीं कोमल मन दुनिया के कोई बिहड़ में भटक जाता है जो आत्म हत्या का कारण बनता है।
जटिल होते प्रश्न पैटर्न:- में पढ़ाने का तरिका काफी फास्ट है फास्ट इसलिए है कि परीक्षा एजेन्सियो के जटिल होते रफ्तार को वो क्रेक करना चाहते है। और उसी हिसाब से बच्चो को पढ़ाते है अगर वो पढ़ाने का स्पीड कम करे तो तय सीमा के अंदर सिलेबस को कवर नहीं कर पायेंगे इसलिए चार सालो में कवर होने वाले सिलेबस और बदलते पैटर्न को एक दो साल के कोर्स के अंदर समेटना चाहते है। जो बच्चो को एक्सेपटेंस पावर से ज्यादा हो जाता है और सारे बच्चे पढ़ाई की उस स्पीड को कवर नहीं कर पाते है।
चूँकि बच्चे छोटे गांव शहरो से आय हुए होते है।जो वो शिक्षा ग्रहण कर आए है उससे यहाँ की शिक्षा काफी बोझील व उबाऊ लगती है व उनके जेहन में बैठती नहीं और लाज शर्म के कारण शिक्षक से खुल कर पूछते नहीं कि साथी बच्चे व शिक्षक उसे बेवकूफ और कमजोर समझेंगे मजाक उड़ायेगे धीरे-धीरे वो पढ़ाई में पिछड़ने लगते है। और धीरे-धीरे खूद के व माँ-बाप के सपने को टूटते देख डिप्रेशन में चले जाते है जो आत्म हत्या का कारण बनता है।
प्रारम्भिक शिक्षा:- आज पुरे देश भर में देखे तो प्रारम्भिक शिक्षा में बहुत गिरावट आई है। और उस स्तर की शिक्षा छोटे शहरो व गांव के बच्चो को प्राप्त नहीं हो रहे है जो मिल का पत्थर साबित हो और बच्चो को पंख मिल सके जबकी इच्छाएँ व अवश्यकताएं काफी बढ़ी है।
आज देखा जाए तो इंग्लिश मीडियम के स्कूले बहुत जोरो से चल रहे है और गांव-शहरो व कस्बो में शिक्षा का मेरुदंड बने हुए है। और समाज ऐसे स्कूलो को काफी अहमियत देता है और अपने सपने साकार करने के लिए माँ-बाप इनके तरफ तेजी से अग्रसर हुए है कुछ दसक पहले से विचार करे तो हम पायेगे की गरीब आदमी भी अँग्रेजी माध्यम से बच्चो को तालीम देना चाहता है और पेट काट कर प्राइवेट स्कूलो में पढ़ता व मोटा फी अदा करता है। मगर यें स्कूले अंग्रेजी मीडियम तो है मगर महानगरो के स्कूलो के तरह शिक्षा देने में सक्षम नहीं है। इसलिए गांव कस्बो व छोटे शहरो के बच्चे महानगरो के बच्चो से पिछड़ जाते है। चूँकि हमारे यहाँ तो अंग्रेजी मीडियम स्कूल व शिक्षा तो है मगर हमारे बच्चे ना तो अंग्रेजी सही समझ पाते है नहीं बोल पाते है नहीं लिख पाते है।

सौ. सोशल मीडिया

मगर परीक्षा में उच्चे नम्बरो से पास कर जाते है। और माँ-बाप का भरोसा हो जाता है कि मेरा बच्चा/बच्ची इंजीनियरिंग/नीट क्रैक कर देगा। इसलिए समर्थवान हो या गरीब जमीन बेचकर कर्ज लेकर बच्चो को कोटा पढ़ने के लिए भेजते है। और बच्चे खुशी खुशी जाते भी है। जब वहाँ जाते है और आपने अभी तक पाए शिक्षा और वहाँ की शिक्षा से परिचित होते है तो छोटे शहरो व गांव से आए बच्चे उसके सामने बहुत पिछड़ा महसूस करने लगते है क्योकि वहां की फास्ट शिक्षा और अंग्रेजी समझने बोलने की समस्या हिन्दी भाषी बच्चो के सामने जटिलता से सामने आती है। क्योंकि छोटे शहरो व गांव के बच्चो कि अंग्रेजी महानगरो के बच्चो के समान नहीं होती जबकि शिक्षा एक ही बैच में एक ही साथ दी जाती है इसलिए सब बच्चे कन्टेन्ट को सही सही समझ नहीं पाते। व पिछड़ने लगते है।
चूँकि अनजान शहर कच्ची उम्र कुछ पाने की ललक माँ-बाप व खूद के सपने आपना आर्थिक हैसियत और गांव के जमीन को बेचना या वो कर्ज जो उनके पढ़ाने के लिए माँ-बाप ने ले रखा है बच्चो के दिमाग पर प्रेशर डालता है और वो चाहता है कि एनी हाऊ हमें कैसे भी हो एक्जाम क्रेक करना है। और जो अपने आपको इसमें असफल पाता है तो आत्म हत्या के तरफ अग्रसर होता है। चूंकि वहाँ हौसला बढ़ाने वाला कोई नहीं होता अंजान शिक्षक व होस्टल की चहारदिवारी के सिवाय उसका कौन है वहाँ बच्चा/बच्ची अकेला व हताश हो जाता है।
इसलिए बच्चा/बच्ची का कैलिवर पहचान कर वहाँ भेजे सभी क्षेत्र में स्कोप व तरक्की का अवसर है बच्चा/बच्ची का जिधर झुकाव हो उधर ही भेजे माँ-बाप को अपना इच्छा व बिचार बच्चो पर नहीं थोपना चाहिए माँ-बाप पंख दे उड़ान दे आकाश दें मगर दिशा न तय करें वो बच्चो को करने दे। केवल मार्गदर्शन दे तो अच्छा होगा।

ऐसी समस्याओ से निपटने का उपाय

सामूहिक तौर पर बिचार विमर्श कर निदान निकालना जा सकता समस्याएँ कभी भी हमारी इच्छा शक्ती से बड़ी नहीं होती।
1)शिक्षा सस्ती व सभी प्रकार के कर मुक्त होनी चाहिए ताकि गरीब से गरीब बच्चो का भी पहुंच आसानी से शिक्षा तक हो सके। आज अवाम जागरुक है सभी गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा प्राप्त करना चाहते है मगर मँहगी करयुक्त शिक्षा रास्ते का बाधा है।

सौ. सोशल मीडिया

2) प्रश्न पत्र अंग्रेजी व एक स्थानीय भाषा में होने चाहिए व ज्यदा उलझाने वाला नहीं होने चाहिए।
3)नीट/ इंजिनियरिंग की सरकारी काँलेजो में कोटे बढ़ाये जाने चाहिए। व जो कुछ सिटे कोटे व्यक्ती संस्थान के नाम पर रिजर्व रखी जाती है वो रिजर्व व्यवस्था खत्म होनी चाहिए।
4)प्रारम्भिक शिक्षा मजबूत व गुणवत्तापूर्ण होने चाहिए।
5)जब हम नीट/इंजिनियरिंग क्षेत्र चुनते है तो अंग्रेजी का समझ अच्छी होनी चाहिए।
6) स्कूली शिक्षा कम्पटेटिव परीक्षाओ के बदलते पैटर्न के अनुसार होने चाहिए।
7)बच्चे अगर मोटी फिस देने के वाबजूद भी पढ़ने में पिछड़ते है तो एजुकेशनल संस्थाओ को जिम्मेवार बनाना चाहिए। यें संस्थाएँ केवल यह कह कर पला नहीं झाड़ सकते की आपका बच्चा पढ़ता नहीं है।
8)स्कूलो की धंटियां 25-30मिनट 70+ बच्चे शिक्षक सभी बच्चो पर परोपर ध्यान नहीं दे पाते। पढ़ाना कॉपियां चेक करना और समय सीमा के अंदर छुट्टियो को कवर करते हुए कोर्स को पुरा करना इतना समय सफिसियेन्ट नहीं 70+ बच्चो के लिए समझा जा सकता है कि 30मीनट 70 बच्चे एक बच्चा पर कितना समय दिया जाता है होमवर्क देना काॅपिया चेक करना पाठ पढ़ाना कुछ असम्भव सा लगता है।
9) सिलेबस छोटा व किताबें कम होने चाहिए।
10)जिन स्कूलो में जरूरत से ज्यदा किताबे चलाए जाते हो उन्हे पहचान कर दंडित की जानी चाहिए।
11) शिक्षक ट्रेन्ड व तेज तरार होने चाहिए पढ़ना एक कला है और उस कला में शिक्षक को माहिर होना चाहिए।
12) बच्चो को अकेला बाहर पढ़ने के लिए भेजते है तो समय समय पर उससे मिलते रहे हौसला व हिम्मत बढाते रहे। असफलता हार नहीं सीख भी है सीखे और आगे बढे। माँ-बाप अपने समस्याओ से अवयस्क बच्चो को अवगत ना कराये तो अच्छा रहेगा।
13)अपनी ईच्छा बच्चो पर ना थोपे पंख दे उड़ान दे आकाश दे मगर दिशा उन्हे तय करने दे।
14)हारना जीवन का अंत नहीं शुरुआत भी हो सकता है।
15)एडिसन साहब बल्ब का अविष्कार कर रहे थे मगर सौ बार वो असफल हो चूँके थे पत्रकार ने पूछा कि आप सौ बार बल्ब बनाने में फेल हुए एक सौ एक बार में सफल हुए। सर जी आप यहाँ एडिसन साहब का जवाब था ! नहीं-नहीं हम फेल नहीं हुए है वो सौ तरीको से हमने सीखा कि इन सौ तरीको से बल्ब नहीं बनाए जा सकते। इसीलिए एक सौ एक्वा रिजल्ट हमारे समाने आया। हाँ तो बच्चो विचार पाॅजिटिव रखो सफलता अवश्य मिलेगी लगे रहो बस ईमानदारी से लगे रहो सफलता अवश्य कदम चुमेंगी आज नहीं तो कल। हताश होना कलम वीरो का काम नहीं है। लक्ष्य बनाओ दिशा दो अर्जुन सा कर्म वीर बनो फिर पुरा दुनिया तुम्हारा है।
16)विश्व गांव में तबदिल होता जा रहा है इसलिए अंग्रेजी को महता को समझे पढ़े आगे बढे लिंगविस्ट बने। दूसरी भाषा जानने से हमारी भाषा छोटी नहीं होती जो हमारी है वो हमारी ही है दूसरी भाषा का भी ज्ञान हो जाए तो हर्ज ही क्या है। विद्यार्थियो के पास गणित, विज्ञान व अंग्रेजी का सार्थक ज्ञान हो तो वो दौलत से कम नहीं।
सरकारी स्कूलो में अंग्रेजी को प्रथमिकता दी जानी चाहिए।
17) पुरे राष्ट्र में एक समान शिक्षा व एक माध्यम से शिक्षा दी जानी चाहिए और प्रत्येक राज्य को एक अपना क्षेत्रीय भाषा पाठयक्रम में रखने का अधिकार होना चाहिए। ऐसे मैं अंग्रेजी भाषा को प्राथमिकता देना चाहुंगा। “एक राष्ट्र एक समान शिक्षा का अधिकार होना चाहिए।”

Related posts

मुज्जफरपुर:02 मार्च से मुख्यमंत्री जन आरोग्य योजना अंतर्गत 5 लाख तक की स्वीकृत स्वास्थ्य सुरक्षा प्रदान की होगी शुरुआत: जिलाधिकारी

rktvnews

विश्वविद्यालयों में ग्रीष्मावकाश की रद्द छुट्टी बहाल हो:अध्यक्ष फुटाब प्रो के बी सिन्हा

rktvnews

दैनिक पञ्चांग: 30 अप्रैल 25

rktvnews

गोपालगंज:मतदाता बनने हेतु छात्राओं को किया गया प्रेरित।

rktvnews

हां, आज़ादी चरखे से आई थी….और ऐसे आई थी !

rktvnews

मध्यप्रदेश:महाविद्यालयों को “पीएम कॉलेज ऑफ एक्सिलेंस “के रूप में उन्नयन किया जाएगा।

rktvnews

Leave a Comment