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तुलसी साहित्य अकादमी द्वारा हरिशंकर दुबे की कृति “श्रीकृष्णलीलामृतम् ” लोकार्पित।

भोपाल/ मध्यप्रदेश 09 सितंबर।तुलसी साहित्य अकादमी द्वारा आयोजित सृजन श्रंखला 36 के अंतर्गत पंडित हरिशंकर दुबे द्वारा रचित वासुदेव भगवान श्रीकृष्ण के उदात्त चरित्र पर केन्द्रित “श्रीकृष्णलीलामृतम् महाकाव्य” का लोकार्पण एवं विमर्श तत्पश्चात दूसरे सत्र में रचनाकारों द्वारा काव्य पाठ किया गया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्यकार डा.राजेश तिवारी ने की। मुख्य अतिथि वरिष्ठ शिक्षाविद् डा.कृपा शंकर तिवारी विशिष्ट अतिथि मानीय नरेन्द्र तिवारी तथा सारस्वत अतिथि मानस मर्मज्ञ पंडित देवेन्द्र रावत जी रहे।
समीक्षक द्वय वरिष्ठ साहित्यकार गोकुल सोनी एवम सुरेश पटवा भी मनचसीन रहे।
चन्द्रभान सिंह चंदर द्वारा माँ सरस्वती की वंदना उपरांत पंडित हरिशंकर दुबे जी द्वारा सृजित श्रीकृष्णलीलामृतम् महाकाव्य का लोकार्पण किया गया।
डा.मोहन तिवारी आनंद राष्ट्रीय अध्यक्ष तुलसी साहित्य अकादमी ने अपने स्वागत उद्बोधन में श्रीकृष्णलीलामृतम् की पृष्ठभूमि एवं उसमें वर्णित तमाम कथानकों पर प्रकाश डालकर श्रीकृष्णलीलामृतम् के महात्म्य का वर्णन किया।
पंडित हरिशंकर दुबे जी ने कृति सृजन की परिस्थितियों का वर्णन कर श्रीकृष्णलीलामृतम् के अशों का पाठ किया जिनको सुनकर उपस्थित समुदाय भावुक हो उठा।
सुविख्यात समीक्षक गोकुल सोनी ने श्रीकृष्णलीलामृतम् की समीक्षा प्रस्तुत करते हुए कहा कि भगवान श्री कृष्ण के जीवन पर यह पुस्तक लिखकर हरिशंकर दुबे जी ने साहित्य क्षेत्र की एक बहुत बड़ी कमी को पूरा किया है। यह नई पीढ़ी के लिए उपयोगी सिद्ध होगी। प्रबुद्ध साहित्यकार सुरेश पटवा ने विचार रखते हुए कहा कि कृष्ण भारतीय वांग्मय के प्रतिनिधि पुरुष चरित्र हैं। कृष्ण संपूर्ण वांग्मय के प्रतीक हैं। महाभारत महाकाव्य से उनका चरित्र निकाल दिया जाय तो महाकाव्य का ढाँचा ही ढह जाएगा। हरिशंकर दुबे ने ऐसे महान चरित्र पर छंदबद्ध काव्य ग्रंथ लिखकर एक बहुत बड़ा कार्य किया है। नरेन्द्र तिवारी ने अपने उद्बोधन में श्रीकृष्ण जी के उदात्त चरित्र पर प्रकाश डालते हुए दुबे जी के सृजन की सराहना की।
मुख्य अतिथि डा. कृपा शंकर तिवारी जी श्रीकृष्णलीलामृतम् जैसे सार्थक एवं महत्वपूर्ण महाकव्य के सृचन के लिए बधाई देते हुए कहा कि श्रीकृष्ण जी के चरित्र को समझ पाना आसान नहीं है। जहाँ वे एक ओर प्रेम और दया के अगाध सिंधु हैं, भक्त वत्सल हैं, नीतिज्ञ एवं उदारमना हैं वहीं दूसरी ओर वे दुष्ट संहारक भी हैं। श्रीकृष्ण ने कुरुक्षेत्र के मैदान में अर्जुन को कर्मयोग का जो सिद्धांत प्रतिपादित किया उसमें दो बातें उभरकर सामने आती हैं कि वे एक ओर बांसुरी की ध्वनि पर प्रेम का संदेश देते हैं तो दूसरी ओर द्रोणाचार्य, कर्ण और अस्वस्थामा जैसों के वध को नीति नियोजित हैं। वे एक ओर कौरव पाण्डवों के मध्य युद्ध न हो का प्रयास करते हैं तो दूसरी ओर युद्ध भूमि में मोहजनित अर्जुन को युद्ध करने के लिए उकसाते हैं।
कार्यक्रम के अध्यक्ष डा.राजेश तिवारी ने अपने उद्बोधन में श्रीकृष्णलीलामृतम् के अति महत्वपूर्ण घटनाओं पर प्रकाश डाला। उन्होंने मथुरा में हो रहे भीषण नरसंहार तथा जन धन की बर्बादी को रोकने के लिए रणछोड़ जैसे उपमान को स्वीकार किया वहीं दूसरी ओर महाभारत युद्ध में अर्जुन का न केवल मार्गदर्शन किया बल्कि सारथीं की भूमिका निभाई। जब भीष्मपितामह युद्ध में पाण्डव सेना का विनाश करने लगे तो वे अपनी प्रतिज्ञा के विपरीत रथ का पहिया लेकर भीष्म पर प्रहार करने दौड़ पड़ते हैं।
द्वितीय सत्र में 15 कवियों ने अपनी रचनाओं का पाठ किया जिनमें श्री वर्मा राम भरोसे, अशोक व्यग्र, दिनेश भदौरिया, विश्वनाथ शर्मा विमल, अजय श्रीवास्तव, शिवांस सरल, डा.राजेश तिवारी, चन्द्र भान सिंह चंदर,पंडित हरिशंकर दुबे,डा.अशोक तिवारी मन तथा डा.मोहन तिवारी आनंद आदि शामिल थे।
तुलसी साहित्य अकादमी के राष्ट्रीय अध्यक्ष डा.मोहन तिवारी आनंद ने कार्यक्रम में पधारे सभी कवियों एवं साहित्यकारों का आभार व्यक्त किया।

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