सम्मेलन में मनायी गयी जयंती, पुस्तक ‘क्यों छात्रों पर चली गोलियाँ?’ का हुआ लोकार्पण, हुई लघुकथा-गोष्ठी
RKTV NEWS/पटना(बिहार)15 अक्टूबर। भारत के जिन महान त्यागियों ने अपना ऐश्वर्यपूर्ण सुखमय जीवन का त्याग कर स्वयं को देश-सेवा के लिए अर्पित का दिया, उनमे सेठ गोविन्द दास का नाम परम श्रद्धेय है। स्वतंत्रता-संग्राम के दौरान और उसके बाद राष्ट्रभाषा हिन्दी और हिन्दी साहित्य के आंदोलन को सेठ गोविंद दास का बहुत बड़ा संबल प्राप्त हुआ। ‘हिन्दी’ के प्रश्न पर वे तत्कालीन प्रधानमंत्री पं जवाहर लाल नेहरू से भी लड़ पड़े, जिसके कारण मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री का सुनिश्चित पद उनके हाथ से निकल गया।
यह बातें गुरुवार को, बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन में आयोजित जयंती-समारोह की अध्यक्षता करते हुए सम्मेलन अध्यक्ष डा अनिल सुलभ ने कही। उन्होंने कहा कि सेठ जी की साहित्यिक प्रतिभा भी उच्च कोटि की थी। वे एक सफल नाटककार और उपन्यासकार थे। उन्होंने दो दर्जन से अधिक पुस्तकें लिखीं। भारत में हुए, प्रथम चुनाव से लेकर १९७४ तक, जबतक जीवित रहे, सेठ जी जबलपुर से भारत के संसद-सदस्य रहे। साहित्य और शिक्षा में उनके अवदान को देखते हुए उन्हें पद्मभूषण के अलंकरण से भी विभूषित किया गया।
इस अवसर पर पिछली सदी के महान कवि पं अवध रत्न मिश्र जी की काव्य-पुस्तक ‘क्यों छात्रों पर चली गोलियाँ’ का लोकार्पण किया गया। कवि के मरणोपरांत इस पुस्तक का प्रकाशन सुख्यात समाजसेवी पद्मश्री विमल कुमार जैन ने किया है। अपने उद्गार में श्री जैन ने कहा कि १९७४ के छात्र-आंदोलन के समय छात्रों पर शासन द्वारा चलायी गयी गोलियों से आहत कवि मिश्र ने अपनी कविताओं से सरकार पर प्रश्नों की बौछार कर दी। उन्हीं कविताओं का यह संकलन जो उनके जीवन-काल में प्रकाश में नहीं आ सका, आज भी अपनी प्रासंगिकता सिद्ध कर रहा है। वरिष्ठ कवि प्रो सुनील कुमार उपाध्याय, डा इन्दु पाण्डेय, डा मनोज गोवर्द्धनपुरी, ज्ञानेश्वर शर्मा, कुमार अनुपम, डा शालिनी पाण्डेय तथा शंकर शरण मधुकर ने भी अपने विचार व्यक्त किए।
लघुकथा गोष्ठी में डा पुष्पा जमुआर ने ‘कैनवास का दर्द’, डा रेणु मिश्र ने ‘परिचय’, सदानन्द प्रसाद ने ‘कला-सृजन’, डा नागेश्वर प्रसाद यादव ने ‘मानसिक सीमाएँ’, इन्दु पाण्डेय ने ‘दिमाग़ कहाँ गया’ तथा इन्दुभूषण सहाय ने ‘मरने के बाद’ शीर्षक से अपनी-अपनी लघुकथा का पाठ किया। मंच का संचालन ब्रह्मानन्द पाण्डेय ने तथा धन्यवाद-ज्ञापन कृष्ण रंजन सिंह ने किया।

