
भोपाल/मध्यप्रदेश ( मनोज कुमार प्रसाद)11 अप्रैल।इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय में आज “माह का प्रादर्श” प्रदर्शनी के अंतर्गत “निंगला पा-थोई: एक अनुष्ठानिक परिधान” का उद्घाटन दीप प्रज्वलनं कर कार्यक्रम की मुख्य अतिथि बिंदु शर्मा ,प्रधान मुख्य वन संरक्षक(प्रोडक्शन)वन विभाग,म प्र शासन , द्वारा किया गया।
इस अवसर पर संग्रहालय के प्रशासनिक अधिकारी एच बी एस परिहार द्वारा मुख्य अतिथि बिंदु शर्मा,पीसीसीएफ का स्वागत किया तथा स्वागत भाषण में बोलते हुए माह के प्रादर्श प्रदर्शनी श्रृंखला को, भारतीय लोक परंपराओं के संरक्षण , प्रचार और प्रसार की दिशा में महत्वपूर्ण कार्य बताया। उन्होंने कहा कि , ये आयोजन देश के विभिन्न भागों की संस्कृति और परंपराओं के बारे में जानकारी प्रदान करने के लिए एक महत्वपूर्ण मंच हैं ।
इस प्रदर्श की संयोजक मानव संग्रहालय की म्यूजियम एसोसिएट सुश्री आयशा गराबडू ने विस्तार से माह के प्रदर्श के बारे में जानकारी प्रदान करते हुए बताया कि ,पारंपरिक/स्थानीय नाम: निंगला पा-थोई: एक अनुष्ठानिक परिधान
जनजाति: थंगल नागा
स्थानीयता: थंगल सुरुंग गाँव, इम्फाल पूर्व, मणिपुर
संग्रहण कर्ता: श्रीकांत, सहायक कीपर एवं श्री एन. शकमाचा सिंह, सहायक कीपर “निंगला पा-थोई” एक प्रतिष्ठित पारंपरिक परिधान है, जिसे थंगल नागा समुदाय की महिलाएँ कमर के चारों ओर निचले वस्त्र के रूप में धारण करती हैं।
यह वस्त्र विशेष रूप से विवाह के उपरांत होने वाले “निंगला (नांगला) समारोह” में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, जहाँ इसे दूल्हे की बहन द्वारा दुल्हन को पारिवारिक संबंधों की स्वीकृति और सुदृढ़ता के प्रतीक के रूप में प्रदान किया जाता है। यह परिधान न केवल एक वस्त्र है, बल्कि सम्मान, आदर और पारिवारिक निरंतरता का जीवंत प्रतीक भी है।
यह वस्त्र काले, नारंगी, हरे और सफेद रंगों के आकर्षक संयोजन से निर्मित होता है, जिसमें खड़ी पैनलों और आड़ी पट्टियों का संतुलित विन्यास एक विशिष्ट सौंदर्य उत्पन्न करता है। इसमें प्रयुक्त पारंपरिक आकृतियाँ—जैसे पजाओ, कासिमपोई, रोफाई, ङा और पेंग—प्रत्येक अपने भीतर सांस्कृतिक और प्रतीकात्मक अर्थ समाहित किए हुए हैं। ये आकृतियाँ न केवल प्रकृति, जीव-जंतुओं और पारंपरिक जीवन शैली से प्रेरित हैं, बल्कि विवाह के माध्यम से विभिन्न कुलों के सामंजस्यपूर्ण एकीकरण को भी दर्शाती हैं।
बुनाई तकनीक की दृष्टि से यह परिधान अत्यंत विशिष्ट है। इसे पारंपरिक लोइन लूम पर कपास के धागों से बुना जाता है। इसकी आधार संरचना साधारण बुनाई पर आधारित होती है, जिसमें “स्विवल एक्स्ट्रा-वेफ्ट” तकनीक द्वारा जटिल डिज़ाइन और अलंकरण तैयार किए जाते हैं। इस प्रक्रिया में अतिरिक्त धागों को बुनाई के दौरान ही जोड़ा जाता है, जिससे वस्त्र पर उत्कृष्ट ज्यामितीय पैटर्न उभरते हैं।
थंगल नागा समुदाय की महिलाएँ पारंपरिक रूप से कच्चे कपास को स्वयं एकत्रित कर उसे साफ कर सूत में परिवर्तित करती हैं। वस्त्रों को रंगने के लिए प्राकृतिक स्रोतों जैसे पौधों, पत्तियों, जड़ों और फूलों से प्राप्त रंगों का उपयोग किया जाता है, जो इस परिधान को पर्यावरण के अनुकूल और पारंपरिक बनाता है। भौगोलिक रूप से थंगल नागा जनजाति मणिपुर के सेनापति जिले के पहाड़ी क्षेत्रों में निवास करती है। यह समुदाय अपनी विशिष्ट भाषा, संस्कृति और कुटीर उद्योगों, विशेषकर बुनाई कला के लिए जाना जाता है।
भौगोलिक विवरण
थंगल, उत्तर-पूर्व भारत के मणिपुर राज्य के सेनापति जिले तक सीमित नागा जनजातियों में से एक हैं। मणिपुर की थंगल नागा जनजाति का पूर्व नाम कोईराओ (या खोइराओ) था, जिसे 2012 में आधिकारिक रूप से “थंगल” के रूप में मान्यता दी गई, साथ ही “कोइराओ” शब्द को भी समानार्थी रूप में स्वीकार किया गया। वर्तमान में थंगल के 13 गाँव हैं, जो सेनापति जिले के ग्यारह पहाड़ी गाँवों में स्थित हैं। यह समुदाय थंगल भाषा बोलते हैं, जो मराम और रोंगमेई भाषाओं से मिलती-जुलती है। परंपरागत रूप से थंगल लोग किसान हैं, जबकि महिलाएँ विभिन्न कुटीर उद्योगों, विशेषकर बुनाई में संलग्न रहती हैं।
इस प्रादर्श के उद्घाटन अवसर पर संग्रहालय के अधिकारी राजेंद्र झारिया, डॉ मोहन लाल,दीपक चौधरी, डा पी. अनुराधा , अनुभाग अधिकारी राजीव कुमार जैन, डा प्रीतम चौधरी, डा उमेश झरिया, राजेश गौतम , डा रवीन्द्र गुप्ता, सुनील अलपुरिया, मोनी गुप्ता , नीता कठल , दुर्लभ गुप्ता, शिखर सम्मान प्राप्त जनजातीय कलाकार राम सिंह उर्वेती , आशा बाई , मनोहर मालवीय , सगीर मोहम्मद , सुरेश पटेल,मनोज सिंह बघेल सहित बड़ी संख्या में संग्रहालय कर्मी तथा संग्रहालय पधारे दर्शक एवं पीजीडीएम स्टूडेंट्स उपस्थित रहे ।
मुख्य अतिथि ,पीसीसीएफ , बिंदु शर्मा ने प्रदर्श के उदघाटन के उपरांत मानव संग्रहालय की अंतरंग प्रदर्शनी “वीथि संकुल”एवं मुक्ताकाश प्रदर्शनी “जनजातीय आवास “ का अवलोकन किया और कहा कि मानव संग्रहालय द्वारा , देश की समृद्ध लोक एवं जनजातीय सांस्कृतिक विविधता को संरक्षित करने, प्रदर्शित करने और लोगों तक पहुंचने के लिए, किए जा रहे प्रयास सराहनीय है । म प्र शासन का वन विभाग संग्रहालय के साथ मिलकर, भिन्न भिन्न जिलों में वन प्रोडक्ट से संबंधित कलाकारों के आर्ट एंड क्राफ्ट के संवर्धन के लिए प्रस्ताव तैयार करेगा ।
संग्रहालय के निदेशक प्रो डा अमिताभ पांडे ने माह के प्रादर्श के उद्घाटन के लिए मुख्य अतिथि बिंदु शर्मा,(पीसीसीएफ) ,आयशा तथा सभी संबंधित हेतु ऑनलाइन माध्यम से बधाई प्रेषित की ।
संग्रहालय के जन संपर्क अधिकारी हेमंत बहादुर सिंह परिहार ने बताया कि,यह माह का प्रादर्श आगंतुकों के लिए पूरे माह उपलब्ध रहेगा । संग्रहालय ने सभी कला एवं संस्कृति प्रेमियों को इस अद्वितीय प्रदर्श को देखने के लिए आमंत्रित किया है।
