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मां, उमा, पद्मा’ पर से पर्दा उठते ही सिनेमा, स्मृति और विरासत का संगम।

कामरान की नई किताब ने आईएफएफआई में घटक की सिनेमाई प्रतिभा को फिर से स्थापित किया।

डीपीडी ने भारतीय सिनेमा से संबंधित अपने बढ़ते संग्रह में एक नई किताब का समावेश किया।

RKTV NEWS/ नई दिल्ली 25 नवंबर।आईएफएफआई का प्रेस कॉन्फ्रेंस हॉल सोमवार को सिनेमाई स्मृतियों से भर उठा, जब फिल्म निर्माता और आईआईटी बॉम्बे के प्रोफेसर मजहर कामरान ने अपनी नई पुस्तक, ‘मां, उमा, पद्मा: द एपिक सिनेमा ऑफ ऋत्विक घटक’ का विमोचन किया। इस कार्यक्रम की शुरुआत एक गंभीर माहौल के साथ हुई, जिसमें गणमान्य व्यक्तियों ने दिग्गज अभिनेता धर्मेंद्र के निधन पर शोक व्यक्त किया। इसके बाद भारत के सबसे प्रभावशाली फिल्म निर्माताओं में से एक, ऋत्विक घटक के सम्मान में एक गर्मजोशीपूर्ण और सार्थक बातचीत हुई।
इस किताब का औपचारिक विमोचन सूचना और प्रसारण मंत्रालय के प्रकाशन विभाग निदेशालय (डीपीडी) के प्रधान महानिदेशक भूपेंद्र कैंथोला ने किया। प्रख्यात फिल्म निर्माता राजकुमार हिरानी ने इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में शामिल होकर इस अवसर को सौहार्दपूर्ण और संजीदा बना दिया।
श्री कैंथोला ने डीपीडी द्वारा ‘मां, उमा, पद्मा’ को प्रकाशित करने के निर्णय के बारे में विस्तार से बताया। उन्होंने वेव्स समिट 2025 में की गई उस घोषणा को याद किया, जिसमें इस वर्ष को पांच महान फिल्मी हस्तियों की जन्मशती के प्रति समर्पित किया गया था। इन महान हस्तियों में घटक भी शामिल हैं। उन्होंने बताया, “डीपीडी ऐसी किताबें प्रकाशित करता है जो सभी के लिए सुलभ और किफायती हों। कामरान इस दृष्टिकोण के साथ काम करके खुश थे और सब कुछ इसी के अनुरूप हुआ।” उन्होंने यह भी बताया कि इस किताब का आवरण आईआईटी बॉम्बे के कामरान के अपने विद्यार्थियों द्वारा डिजाइन किया गया था, जोकि एक रचनात्मक सहयोग था जिससे लेखक बेहद खुश हुए।
कामरान ने अपने शब्दों को एक किताब के रूप में आकार लेते देखने के बारे में मर्मस्पर्शी भावनाओं के साथ बात की। उन्होंने कहा कि उन्होंने हर शब्द पूर्ण विश्वास के साथ लिखा है। उन्होंने यह स्वीकार किया कि पाठक कई बार उनकी बातों से सहमत, तो कई बार असहमत भी हो सकते हैं। भारतीय सिनेमा में घटक की स्थिति के बारे में बोलते हुए, कामरान ने कहा कि भले ही आज घटक को सम्मान दिया जाता है, लेकिन वे हाशिये पर ही रहे और अक्सर अपनी बेहतरीन सूझबूझ के बावजूद अपनी फिल्में बनाने के लिए जूझते रहे। कामरान ने कहा, “आने वाले समय में जब भी हम भारतीय सिनेमा के बारे में सोचेंगे, घटक की कोई एक फिल्म हमेशा हमारे सामने रहेगी।”
कामरान ने घटक के पास औपचारिक फिल्म स्कूल प्रशिक्षण नहीं होने के बारे में एक गलत धारणा को भी दूर किया। कामरान ने घटक के शुरुआती लेखन, अपने समय के महान कलाकारों के साथ उनके सहयोग और आइजेंस्टाइन व स्टैनिस्लावस्की की रचनाओं के साथ उनके गहरे जुड़ाव का हवाला देते हुए कहा, “उन्होंने कड़ी मेहनत से सीखा।” उन्होंने याद दिलाया कि घटक ने एफटीआईआई में कुछ समय के लिए पढ़ाया भी था, जो इस बात की याद दिलाता है कि सिनेमाई शिक्षा कई रूपों में होती है।
बातचीत जल्द ही डीपीडी की भारतीय सिनेमा से जुड़ी किताबों को बढ़ावा देने की व्यापक पहल की ओर मुड़ गई। श्री कैंथोला ने बताया कि हाल के वर्षों में 12 किताबें प्रकाशित हुई हैं, जिनमें फाल्के पुरस्कार विजेताओं पर हालिया खंड और एफटीआईआई की लेंसाइट पत्रिका के लेखों का एक आगामी संकलन शामिल है, जिसे अब हिंदी में प्रकाशित किया जा रहा है ताकि इसे अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाया जा सके। उन्होंने लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल और लता मंगेशकर जैसी हस्तियों से जुड़ी पांच और कृतियों की भी घोषणा की।
चर्चा अंततः घटक के कथानकों में बार-बार आने वाली स्त्रीत्व की उपस्थिति – कामरान के शीर्षक की मां, उमा और पद्मा – पर आ गई। उन्होंने घटक की मातृत्व की समझ को स्त्रीत्व का सबसे गहरा प्रतीक बताया, जो पद्मा नदी के साथ गुंथा हुआ है और उनके सिनेमा का एक शाश्वत प्रतीक है।
चिंतन, प्रशंसा और पुनर्खोज से ओतप्रोत यह प्रेस कॉन्फ्रेंस ऋत्विक घटक की कलात्मक विरासत के प्रति श्रद्धांजलि और कामरान के गहन शोधपूर्ण एवं हृदयस्पर्शी रचना के उत्सव के रूप में सामने आया। ‘मां, उमा, पद्मा’ भारतीय सिनेमा से जुड़ी चर्चा को समृद्ध, सुलभ व व्यावहारिक बनाने के साथ-साथ अपने विषय के अनुरूप जुनून से प्रेरित करती है।

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