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ऐतिहासिक पन्नों से – पराधीन सपनेहुँ सुख नाही :डा जंग बहादुर पाण्डेय

 

RKTV NEWS/डॉ जे बी पांडे,14 अगस्त।भारत वर्ष में स्वाधीनता दिवस अर्थात् 15 अगस्त 1947 सबके लिए पूज्य तिथि है। भारतीय इतिहास में यह ऐसा अध्याय है, जिसके हर एक शब्द में शहीदों के खून की झलक मिलती है। सत्य और अहिंसा की ज्योति मिलती है और मिलती है हमारे पूर्वजों की अखण्ड साधना की पूर्णाहुति। वर्षों से वंदिनी भारत माँ के हाथों से जंजीर खोलने वाला यह दिन क्या हमारे देशभक्तों की कुर्बानियाँ और ललनाओ के सुहाग त्याग की कथा को भूल पाएगा?
15 अगस्त 1947 का दिन भारतीय इतिहास का स्वर्णिम पृष्ठ है। जहाँ से उन्मुक्त भारत का अभिनव अध्याय खुलता है। इसी 15 अगस्त को विदेशी शासन के काले बादल छँटे थे, विदेशियों के अत्याचारों का कारकापात बंद हुआ था। उनके शोषण का शोणितस्त्राव रुका था। उस दिन की उषा वन्दिनी नहीं थी, उस दिन की सुहावनी किरणों पर दासता की कोई परछाई नहीं थी। उस दिन का सिंदुरी सवेरा पक्षियों की चहचहाहट और देशवासियों की खिलखिलाहट से अनुगुंजित हो रहा था। जन-जीवन ने मुद्दत के बाद नई अंगड़ाई ली थी। एक नई ताजगी का ज्वार सर्वत्र लहरा रहा था।
1192 ई. में ही ताराइन के मैदान में पृथ्वीराज की पराजय के साथ-साथ हमारे स्वातंत्र्य सूर्य को ग्रहण लग गया था ,किन्तु 1757 ई. के पलासी युद्ध में तो उसे अंग्रेज असुर ने पूरी तरह ग्रस लिया। परिणामत: भारत माता पूरी तरह वन्दिनी हो गई और हम उनकी संतान पूर्णत: लौह-श्रृंखलित।स्वतंत्रता यदि स्वर्ग है तो परतंत्रता साक्षात् नरक। परतंत्रता संसार का सबसे घृणित पाप है। महाकवि तुलसी ने ठीक ही कहा है कि कत विधि सृजी नारी जग माहीं।
पराधीन सपनेहुँ सुख नाही।
सुप्रसिद्ध चिंतक सुकरात ने कभी कहा था कि परतंत्रता अत्याचार और डकैती की अमानुषी प्रणाली है। आर. जी. इगरसोल ने कहा था कि नेत्रों के लिए जैसे प्रकाश है, फेफड़ों के लिए जैसे वायु है, हृदय के लिए जैसे प्यार है, उसी प्रकार मनुष्य की आत्मा के लिए स्वतंत्रता है। इस खोई हुई स्वतंत्रता को प्राप्त करने के लिए हमारे अनगिनत नवजवान फांसी के तख़्ते पर हँसते-हँसते झूल गए, कितनी माताओं ने अपने नौनिहालों को ममता की गोद से उछालकर भाले की नोकों पर टंग जाने के लिए हृदय पर पत्थर रख लिया, कितनी बहनों ने अपने माथे में सिंदूर के बदले राख़ का टीका लगाना स्वीकार किया। आजादी का इतिहास लिखने में काली स्याही कभी सक्षम नहीं हो पाती। उसे लिखने के लिए खून की धारा बहानी पड़ती है।
वीर भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, खुदीराम बोस, सुभाषचंद्र बोस जैसे वीर बाँकुरों की शहादत पर, बाल-पाल-लाल(बाल गंगाधर तिलक,विपिनचन्द्र पाल,लाला लाजपत राय) गोपाल कृष्ण गोखले, राष्ट्र पिता महात्मा गाँधी,राजेंद्र प्रसाद, जवाहरलाल नेहरू,डा श्रीकृष्ण सिन्हा की तपस्या पर, वीर सुभाष और सावरकर के दुर्दांत साहस पर, जलियांवाला बाग की रक्त सिंचित भूमि की बयार पर स्वतंत्रता का सूरज चमका था – इसी 15 अगस्त 1947 के दिन। अंग्रेज शासकों ने अपना बोरिया बिस्तर समेटकर भागे थे सात समंदर पार।
राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त के शब्दों में हमारे मनप्राणों में एक रागिनी बज रही थी
नहीं चाहते हम धन वैभव, नहीं चाहते हम अधिकार।*बस स्वतंत्र रहने दो हमको और स्वतंत्र कहे संसार।।*
तब से हर वर्ष यह 15 अगस्त हमारे समक्ष एक राष्ट्रीय पर्व की भांति आता है। इस दिन देश भर में जन अवकाश रहता है। कचहरी कार्यालय, न्यायालय राजकीय भवन, विद्यालय, महाविद्यालय, सब पर तिरंगा झण्डा फहराया जाता है। जन-गण-मन अधिनायक जय हे, भारत भाग्य विधाता। यह राष्ट्रगीत हमारे मन प्राणों को ऊर्जस्वित करता है।*
स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर कार्यालयों में झंडोत्तोलन करके चाहे राजनेता अपने कर्त्तव्य की इतिश्री समझ लें, लेकिन आज के दिन अपनी बात कहते समय हम उन सपूतों को नहीं भूल सकते, जिन्होंने अपनी जान की बाजी लगाकर भारत माता की जंजीरें तोड़ी हैं। 15 अगस्त आनंद और त्याग का मंगल पर्व तो है ही,साथ ही हमारी वंदना और कचोट, हमारे आत्म दर्शन और आत्म परीक्षण का स्मारक दिवस भी है। समय रहते हमने समस्याओं की अंधी घाटियों को पार नहीं किया,तो हमारी स्वतंत्रता का सूरज डूब जाएगा और तब पता नहीं कितनी लंबी रातों के बाद पुनः नया सबेरा दमकेगा।
राष्ट्रकवि दिनकर ने लिखा है कि आजादी तप,त्याग और बलिदान मांगती है –
आंधियाँ नहीं जहां उमंग भरती हैं
छातियाँ जहाँ संगीनों से डरती हैं।
शोणित के बदले जहाँ अश्रु बहता है,
वह देश कभी स्वाधीन नही रहता है।
राष्ट्रकवि दिनकर ने कविता के माध्यम से मातृभूमि के लिए तन,मन धन सबकुछ न्योछावर करने वाले के लिए लिखा
कलम आज उनकी जय बोल
जला अस्थियां बारी बारी,
छिटकाई जिसने चिनगारी
जो चढ़ गये पुण्य वेदी पर,
लिये बिना गरदन का मोल।
हमें स्मरण रखना चाहिए कि शताब्दियों की साधना का यह पौधा अक्षयवट तभी बन सकता है,जब हम अपने स्वार्थों के कुत्सित घेरे मिटा दें,राष्ट्र प्रेम का दिव्य उत्स हमारे रोम रोम में फूटे।आज भारत आजादी का अमृतमहोत्सव मना चुका है।हमने सभी क्षेत्रों में विकास किया है,हम आत्म निर्भर हुए हैं और विश्व में हमारा मान सम्मान बढ़ा है-यह गौरव का संदर्भ है।आज के इस पावन पुनीत अवसर पर हम प्रभु से समस्त प्राणियों के लिए मंगलमय भविष्य की कामना चाहते हैं।
जय हिंद जय भारत वंदेमातरम

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