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खैरागढ़:प्रतिरोध के मौलिक स्वर : उपनिवेशवाद विरोधी आंदोलन में छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश की जनजातियों के योगदान पर हुआ सार्थक विमर्श

खैरागढ़/छत्तीसगढ़ (रवींद्र पांडेय) 3 अगस्त। इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय, खैरागढ़ में “स्वदेशी प्रतिरोध की आवाजें : स्वतंत्रता आंदोलन में छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश की जनजातियों का योगदान” विषय पर आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का समापन समारोह 2 अगस्त को दरबार हॉल में आयोजित हुआ। संगोष्ठी का आयोजन विश्वविद्यालय के अंग्रेजी विभाग द्वारा किया गया था। समापन सत्र की अध्यक्षता विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. डॉ. लवली शर्मा ने की। प्रो. डॉ. मनीष श्रीवास्तव (गुरु घासीदास विश्वविद्यालय, बिलासपुर) मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। विशिष्ट अतिथि के रूप में डॉ. सत्य प्रकाश प्रसाद (जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नई दिल्ली) और विशेष अतिथि के रूप में प्रो. डॉ. सी. आर. कर (रायपुर) एवं प्रो. मृदुला शुक्ला उपस्थित थे।
कार्यक्रम का संचालन शोधार्थी सुश्री सुष्मिता चौधरी ने किया। सभी अतिथियों का स्वागत पौधे, अंगवस्त्र, स्मृति चिह्न और धन के बैज के साथ किया गया। इस अवसर पर अमिटी विश्वविद्यालय, लखनऊ के प्रतिभागी रोहित यादव ने संगोष्ठी के अनुभव साझा करते हुए आयोजकों के प्रयासों की सराहना की। उन्होंने कहा कि तकनीकी सत्र ज्ञानवर्धक रहे और विद्वानों के विचारों से बहुत कुछ सीखने को मिला।
संयोजक डॉ. कौस्तुभ रंजन ने संगोष्ठी की गतिविधियों का संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत करते हुए कहा कि इस आयोजन का उद्देश्य केवल शैक्षणिक विमर्श नहीं, बल्कि जनजातीय समुदायों की ऐतिहासिक भूमिका को उजागर कर साहित्य के साथ उनका समन्वय स्थापित कर उन्हें सम्मान देना भी था। यह संगोष्ठी बिरसा मुंडा के 150वें जयंती वर्ष पर उनके सम्मान में भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद, नई दिल्ली के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित की गई।
समापन सत्र में वक्ताओं ने अपने विचार साझा किए। कुलपति प्रो. डॉ. लवली शर्मा ने अपने अध्यक्षीय भाषण में छत्तीसगढ़ के जनजातीय जीवन पर प्रकाश डाला और एक कलाकार के रूप में ‘ठुमरी’ के माध्यम से अपने भाव प्रकट किए। उन्होंने आयोजन समिति के परिश्रम की सराहना की और भविष्य में ऐसे आयोजनों को प्रोत्साहित करने का आश्वासन दिया।प्रो. मृदुला शुक्ला ने आयोजन टीम की रचनात्मकता और विषय चयन की प्रशंसा करते हुए खैरागढ़ की सांस्कृतिक विरासत पर प्रकाश डाला। प्रो. कर ने जनजातीय संस्कृति की सांस्कृतिक परंपराओं को साहित्यिक दृष्टि से प्रस्तुत किया और स्वदेशी आवाजों को मुख्यधारा में लाने की आवश्यकता पर बल दिया। डॉ. प्रसाद ने संगोष्ठी की गंभीरता और विषय की समसामयिकता को रेखांकित किया। प्रो. श्रीवास्तव ने अपने वक्तव्य में बिरसा मुंडा, टंट्या भील और रानी दुर्गावती जैसे नायकों के योगदान का स्मरण किया और जनजातीय चेतना की मानवीयता पर बात की। विषय को संपूर्ण भारत के परिप्रेक्ष्य में देखने का बात कही। समारोह के अंत में धन्यवाद ज्ञापन डॉ. कौस्तुभ रंजन ने किया। उन्होंने बताया कि इस संगोष्ठी में देशभर से 100 से अधिक प्रतिभागियों ने पंजीकरण कराया और सभी सत्रों ने अपने उद्देश्यों को पूर्ण किया। अंत में सभी प्रतिभागियों को प्रमाणपत्र वितरित किए गए।

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